जानकारी के बावजूद सटोरियों के अड्डों पर छापा मारने से पुलिस का परहेज

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बांदा। थाना पुलिस की मेहरबानी से सटोरियों की बन आई है। एक मायने में देखा जाए तो पुलिस कर्मी हारे से नजर आ रहे हैं। पता नहीं क्यों सटोरियों के खिलाफ कार्रवाई करने में पुलिस कर्मियों के हाथ कांपते नजर आते हैं। मामला क्या है यह तो थाना पुलिस और सटोरिये ही जानें। लेकिन सटोरियें यह बात पूरी दावेदारी के साथ कहते हैं कि उन पर कार्रवाई करना मुकामी पुलिस के बस की बात नहीं है। क्योंकि वह हर माह तयशुदा रकम निश्चित ठिकाने पर पहुंचा देते हैं, उसका हिस्सा थाना पुलिस को भी मिलता है।

सट्टा कारोबारी पूरे जोश के साथ अपने कारोबार को अंजाम दे रहे हैं। नई बाजार हो या फिर सट्टा कारोबारियों के अन्य अड्डे, बेहिचक संचालित किए जा रहे हैं। क्या मजाल है थाना पुलिस की कि सटोरियों के अड्डों पर निगाह टेढ़ी करके देखे। अतर्रा कस्बा सट्टा कारोबार का मेन प्वाइंट है। इस प्वाइंट से निकली तरंगों से जगह-जगह पर तैनात सटोरिया एजेंट एक्टिव हो जाते हैं। मेन प्वाइंट की फीक्वेंसी की अगर बात करें तो सेटेलाइट सरीखी है। मेन प्वाइंट से एक बटन दबाई जाती है और अतर्रा समेत बदौसा क्षेत्र में जगह-जगह पर काम करने वाले सटोरिया ऐसे एक्टिव हो जाते हैं, जैसे बटन ऑन करने पर बिजली लाइन पर करंट दौड़ता है।

नई बाजार इलाके में तो घूमते फिरते सटोरिये हजारों और लाखों की बुकिंग कर ले जाते हैं, लेकिन मुकामी थाना पुलिस को तनिक भी भनक नहीं लगती है। अगर भनक लग भी जाती है तो पुलिस कर्मी सटोरियों को पकडऩे की हिम्मत नहीं जुटा पाते। ऐसा क्यों है, यह समझने की जरूरत है। इसका उदाहरण सटोरियों खुद देते हैं। सटोरियों की मानें तो बदौसा थाने के अलावा अन्य प्वाइंटों पर निर्धारित रकम निश्चित समय पर पहुंचा दी जाती है। यह रकम सट्टा कारोबार में बाधा न डालने के लिए ही पहुंचा जाती है और पुलिस भी सुस्त हो जाने के साथ ही सटोरियों की तरफ निगाह डालना भी मुनासिब नहीं समझती है।

थाना प्रभारी तो कागज के चंद टुकड़े गिनते हैं, लेकिन इसके ऐवज में लोगों की खून-पसीने की कमाई जब नौ गुना करने के चक्कर में उड़ जाती है तो वही लोग आपराधिक घटनाओं को अंजाम देते हैं। थाना पुलिस अपराध रोकने का दावा करती है, लेकिन अपराध को जन्म देने वाले सट्टा कारोबार के खिलाफ कार्रवाई करना उनके बस की बात समझ में नहीं आती है। काफी समय गुजर गया सट्टा कारोबार दिन-दूनी रात चौगुनी रफ्तार से बढ़ता जा रहा है और लोग लुटते जा रहे हैं।

पुलिस सब जानती है लेकिन अफसोस कि उसके हाथ कागज की रस्सी से बंधे हुए हैं। रही बात थाने के पुलिस कर्मियों की तो वह तो वही करेंगे तो थाना प्रभारी यानी कि उनका इंचार्ज आदेश देगा। सट्टा कारोबार में अब तक सैकड़ों लोग अपना घर द्वार तक बर्बाद करते हुए हैं। तमाम लोग तो परदेश में रहकर किसी तरह से सट्टे में खोई गई अपनी घर गृहस्थी को वापस लाने के लिए दिन-रात मेहनत कर रहे हैं। जबकि तमाम लोग तो सटोरियों के जाल में फंसकर बदहवास हालत में हैं।

आधा सैकड़ा से ज्यादा महिलाएं खेल रहीं सट्टा

10 रुपए को 90 रुपए में बदलने के चक्कर में हजारों रुपया गवां चुके सट्टे के शौकीन लोगों की हालत पतली हो चली है। अपने पति से कुछ रुपया लेने के बाद घर की महिलाएं तक सट्टे में आजमा रही हैं। कभी अगर एकाध नंबर फंस गया तो समझो चांदी हो गई, वरना अपने पति देवता की कमाई को महिलाएं भी सट्टे में लुटा रही हैं। एक सटोरिये के मुताबिक बदौसा कस्बा और क्षेत्र की तकरीबन आधा सैकड़ा महिलाएं प्रतिदिन सट्टे में अंक लगाती हैं और अंक खुलने पर उनकी रकम वापस लौटने के बजाय सट्टा कारोबार के समुंदर में डूब जाती है।

सट्टा कारोबार से बेजार कस्बावासी

अतर्रा से संचालित सट्टा कारोबार ने बदौसा क्षेत्र में अपनी मजबूत जड़ें जमा रखी हैं। सटोरियों की चहलकदमी और मोबाइल समेत अन्य साधनों से की जा रही बुकिंग को लेकर कस्बे के प्रबुद्ध लोग खासे खफा हैं। उनका कहना है कि थाना पुलिस को सटोरियों को कस्बे से खदेड़ देना चाहिए, लेकिन अफसोस कि पुलिस सटोरियों पर कोई कार्रवाई नहीं कर रही है। जागरूक लोगों का कहना है कि शाम होने के बाद सट्टे में हारे लोग शराब के नशे में टुन्न होकर ओछी हरकतें करते नजर आते हैं। थाना पुलिस को सट्टा कारोबार करने वालों के खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए, लेकिन अफसोस कि मुकामी पुलिस कार्रवाई नहीं कर रही है।

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