फूलपुर में केशव ही नहीं इस केन्द्रीय मंत्री की भी साख दांव पर, हारे तो अगली सरकार में कुर्सी दांव पर

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इलाहाबाद। यूपी के इलाहाबाद की फूलपुर सीट लोकसभा पर होने वाले उपचुनाव में केशव प्रसाद और बीजेपी के लिए प्रतिष्ठा का सवाल तो है। लेकिन साथ में मोदी मंत्रिमंडल के मंत्री को अपनी साख बचाने के की भी चुनौती है। हम बात कर रहे हैं, केन्द्रीय मंत्री अनुप्रिया पटेल की यह उनका गृह क्षेत्र है। यहां पर पटेलों का दबदबा शुरुआत से रहा है। वहीं कहा ये भी जाता है कि अनुप्रिया के समर्थन के बाद ही बीजेपी अपना यहां पर वर्चस्व कायम करने में कामयाब रही थी। लेकिन बीते कुछ वर्षों से यहां पर पटेलों के लिए कुछ ख़ास विकास न होने के कारण यहां पटेल मोदी सरकार से काफी नाराज है। अगर यहां पर बीजेपी की हार होती है तो ये अनुप्रिया पटेल के लिए अपनी साख बचाने की चुनौती बन जायेगा।

फूलपुर में बीजेपी हारी तो अगली सरकार में अनुप्रिया पटेल का पत्ता कट 

फूलपुर में अनुप्रिया पटेल के समर्थन के बाद ही साल 2014 में बीजेपी पहली बार फूलपुर में कमल खिलाने में कामयाब हो पायी थी। यहां पर हमेशा से पटेल वोटों का दबदबा रहा है। वहीं पटेलों के नेता कहे जाने वाले स्व. सोने लाल पटेल को हमेशा से यहां के वोटर्स का समर्थन प्राप्त रहा है। वहीं उनकी मृत्यु के बाद उनकी बेटी अनुप्रिया ने अपने पिता की पार्टी अपना दल की कमान संभाली थी। पिता को प्राप्त जन समर्थन का लाभ उन्हें भी प्राप्त हुआ था।

जिसके बाद यहां पर बीजेपी उम्मीदवार केशव प्रसाद मौर्या को पटेलों का समर्थन प्राप्त हुआ था। वहीं वे पहली बार फूलपुर में कमल खिलाने में कामयाब हो पाए थे अब दोबारा यहां पर अनुप्रिया पटेल के लिए कमल खिलाने में जन समर्थन जुटाने की चुनौती है। अगर वह यहां पर एक बार फिर कमल खिलाने में कामयाब होती हैं तो वह मोदी सरकार के लिए और भी विश्वसनीय हो जायेंगी। लेकिन अगर हार मिलती है तो अगली सरकार में गठबंधन पर असर पड़ सकता है। कहा ये भी जा रहा है कि अगली सरकार में शायद अनुप्रिया को दोबारा मंत्रिमंडल में जगह न मिल पाए।

फूलपुर का जातीय समीकरण 

अगर फूलपुर में जातीय समीकरण की बात की जाए तो यहां पर पटेल वोटर्स की संख्या सबसे ज्यादा लगभग साढ़े 3 लाख है जोकि निर्णायक वोटर्स की भूमिका में हैं। वहीँ यादव और मुस्लिम वोटर्स की बात की जाए तो करीब 2 लाख है और जाटों और दलितों की बात की जाए तो यहां पर करीब सवा लाख वोटर्स हैं।

इस जातीय समीकरण को देखते हुए सपा और बीजेपी का सबसे ज्यादा दबदबा दिखाई पड़ रहा है। सपा ने यहां पटेल कार्ड खेलते हुए नागेन्द्र पटेल को अपना उम्मीदवार घोषित किया है वहीं बीजेपी कौशलेंद्र पटेल को अपना उम्मीदवार बनाया है।

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