तो ऐसे होगी, नारी सम्मान की सुरक्षा

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लखनऊ।  स्वामी विवेकानन्द ने स्त्रियों पर एक पंक्ति को बहुत सुन्दर रूप से सामने लाये थे। स्त्रियों की अवस्था में सुधार, बिना विश्व के कल्याण का कोई दूसरा मार्ग नहीं है वैदिक काल में स्त्री को वही सम्मान प्राप्त था, जो पुरूष को था। आचार्य के मुख से निकले हुए मंत्र श्रवण मंत्र से उन्हें कंठस्थ हो जाते हैं। वैदित काल में स्त्री और पुरूष दोनों को ये अधिकार प्राप्त था।
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आप की जानकारी के लिए बता दें कि, 600 वर्ष के ईसा पूर्व से 300 वर्ष के बाद का काल उत्तर वैदिक काल के नाम से जाना जाता है। महाभारत की रचना में भीष्म पितामा ने संकेत किया है कि स्त्री को सदैव पूज्य मानकर उससे स्नेह का व्यवहार किया जाना चाहिए उस समय स्वयंबर की प्रथा थी।
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बता दें, इसी काल में जैनियों, बौद्ध का उदय हुआ, धर्म के पतन के साथ स्त्रियों का पतन भी शुरू हो गया। मनुस्मृति एक ऐसा ग्रन्थ है जिसमें मनु महाराज ने स्त्रियों पर अनेक प्रतिबन्ध लगाये उन्होनें नारी को शुद्र वंश कहा और उसे वेद पढ़ने और यज्ञ करने तथा विधवा विवाह पर रोक लगाई। बाल विवाह की भी यहीं से शुरूआत हुई थी।
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मुगलों का प्रसाशन मध्य काल में हावी हुआ था, और आय्याषी पुतले मुगल सम्राट सौन्दर्य का अपहरण करने लगे। खिलजी ने 1300 रूपवती नारियों का संकलन किया जिसमें उसने 1600 रानियों का लक्ष्य बना रखा था। अतः महिलाएं घर की चार दिवारों में कैद होने लगीं थी। इसलिए माता पिता लाज शर्म के कारण से बाल विवाह करने लगे थे। इस काल की नारियां पैर की जूती बन गयीं थी
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अगर हम पुराने रश्मों से चले आ रहे चक्र को वर्तमान में जोड़ देते हैं तो, क्या आज भी पुरानी प्रथा निभायी जा रही है। वर्तमान काल में नारी का स्थान तो है लेकिन कहीं न कहीं नारी को पराया धन भी कहा जाता है, ऐसा क्यों?  वह आज भी पुरुष से आगे है। आज भी लक्ष्मीबाई नारी के रूप में कहीं न कहीं जरूर है
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जब किसी से संघर्ष करनें की बात आती है तो, लक्ष्मीबाई की बात आती है। अपनी भावनाओं को दबा देना मीराबाई का प्रेम है। जब बेटियां पैदा होती हैं तो वह परिवार पर एक बोझ हैं, पिता कहने सुननें पर ही सर पर हाथ रख लेता है। बेटियों को खिलने से पहले ही उसे वह माली और बगीचा नहीं मिलता, उसे हर स्थानों पर टोकना ये कहाँ की रीत है ? बहुत से लोग भाषण देते हैं वह कितने रष्मों को निभाते हैं।
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बेटियाँ धीरे-धीरे वह एक घर छोड़कर दूसरे घर कीरश्मों को निभाती है। फिर वहीं काम-काज अपनी भावना को पूरा भी नहीं कर पाती और उसे किसी दर्द की दवा भी नहीं मिलती है। तभी अचानक से ये सुनने में आता है, कि वह दफन हो गयी या फिर अपनी भावनाओं के साथ जल गयी।
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भारत सरकार इस अषिक्षा को सेकनें में अपनी भूमिका निभा रहा है। नारी की एक पहचान बन जाए इससे ये देश कल्याण हो सके। नारी सशक्तिकरण, नारी उत्थान में सहयोग करेगा। नारी अब किसी भी क्षेत्र में पुरूशों से पीछे नहीं है। घर के चूल्हे-चौके से लेकर सेना के फाइटर विमान उड़ाने तक तथा देश जनजाति में भागीदारी तक सबसे आगे रहतीं है।
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