आखिर क्यों मनाई जाती है रूप चौदस, जानिए कथा

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आप सभी को बता दें कि दीपावली पर्व के ठीक एक दिन पहले मनाई जाने वाली नरक चतुर्दशी को छोटी दीवाली, रूप चौदस और काली चतुर्दशी के नाम से भी जाना जाता है. ऐसे में मान्यता है कि कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी के विधि-विधान से पूजा करने वाले व्यक्ति को सभी पापों से मुक्ति मिलती है. ऐसे में कहा जाता है कि इसी दिन शाम को दीपदान की प्रथा है जिसे यमराज के लिए करते है. वहीं इस पर्व का जो महत्व है उस दृष्टि से भी यह काफी महत्वपूर्ण माना जाता है और यह पांच पर्वों की श्रृंखला के मध्य में रहने वाला त्यौहार होता है. आप सभी को बता दें कि कल यानी 6 नवम्बर को दिवाली का त्यौहार मनाया जाने वाला है और उससे पहले आज धनतेरस मनाया जा रहा है. ऐसे में आइए आज जानते हैं नरक चतुर्दशी की कथा.

कथा – आप सभी को बता दें कि इस रात दीये जलाने की प्रथा के संदर्भ में कई पौराणिक कथाएं और लोकमान्यताएं हैं. आज हम आपको वहीं बताने जा रहे हैं. एक कथा के अनुसार आज के दिन ही भगवान श्रीकृष्ण ने अत्याचारी और दुराचारी दु्र्दांत असुर नरकासुर का वध किया था और सोलह हजार एक सौ कन्याओं को नरकासुर के बंदी गृह से मुक्त कर उन्हें सम्मान प्रदान किया था. इस उपलक्ष्य में दीयों की बारात सजाई जाती है. इस दिन के व्रत और पूजा के संदर्भ में एक दूसरी कथा यह है कि रंति देव नामक एक पुण्यात्मा और धर्मात्मा राजा थे. उन्होंने अनजाने में भी कोई पाप नहीं किया था लेकिन जब मृत्यु का समय आया तो उनके समक्ष यमदूत आ खड़े हुए.

यमदूत को सामने देख राजा अचंभित हुए और बोले मैंने तो कभी कोई पाप कर्म नहीं किया फिर आप लोग मुझे लेने क्यों आए हो क्योंकि आपके यहां आने का मतलब है कि मुझे नर्क जाना होगा. आप मुझ पर कृपा करें और बताएं कि मेरे किस अपराध के कारण मुझे नरक जाना पड़ रहा है. यह सुनकर यमदूत ने कहा कि हे राजन् एक बार आपके द्वार से एक बार एक ब्राह्मण भूखा लौट गया था,यह उसी पापकर्म का फल है. इसके बाद राजा ने यमदूत से एक वर्ष समय मांगा. तब यमदूतों ने राजा को एक वर्ष की मोहलत दे दी.

राजा अपनी परेशानी लेकर ऋषियों के पास पहुंचे और उन्हें अपनी सारी कहानी सुनाकर उनसे इस पाप से मुक्ति का क्या उपाय पूछा. तब ऋषि ने उन्हें बताया कि कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी का व्रत करें और ब्राह्मणों को भोजन करवा कर उनके प्रति हुए अपने अपराधों के लिए क्षमा याचना करें. राजा ने वैसा ही किया जैसा ऋषियों ने उन्हें बताया. इस प्रकार राजा पाप मुक्त हुए और उन्हें विष्णु लोक में स्थान प्राप्त हुआ. उस दिन से पाप और नर्क से मुक्ति हेतु भूलोक में कार्तिक चतुर्दशी के दिन का व्रत प्रचलित है.

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