छठ पर्व की 4 महत्वपूर्ण परंपराएं

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आप सभी को बता दें कि छठ देवी को सूर्य देव की बहन बताया जाता है लेकिन छठ व्रत कथा के अनुसार छठ देवी ईश्वर की पुत्री देवसेना बताई गई हैं. आप सभी को को बता दें कि देवसेना अपने परिचय में कहती हैं कि ‘वह प्रकृति की मूल प्रवृति के छठवें अंश से उत्पन्न हुई हैं यही कारण है कि मुझे षष्ठी कहा जाता है.’ वहीं देवी कहती हैं ‘यदि आप संतान प्राप्ति की कामना करते हैं तो मेरी विधिवत पूजा करें. आप सभी जानते ही हैं कि यह पूजा कार्तिक शुक्ल षष्ठी को करने का विधान बताया गया है.’

वहीं पौराणिक ग्रंथों में इस रामायण काल में भगवान श्री राम के अयोध्या आने के पश्चात माता सीता के साथ मिलकर कार्तिक शुक्ल षष्ठी को सूर्योपासना करने से भी जोड़ा जाता है, महाभारत काल में कुंती द्वारा विवाह से पूर्व सूर्योपासना से पुत्र की प्राप्ति से भी इसे जोड़ते हैं. वहीं सूर्यदेव के अनुष्ठान से उत्पन्न कर्ण जिन्हें अविवाहित कुंती ने जन्म देने के बाद नदी में प्रवाहित कर दिया था वह भी सूर्यदेव के उपासक थे और वह घंटों जल में रहकर सूर्य की पूजा करते. इसी के साथ यह मान्यता है कि कर्ण पर सूर्य की असीम कृपा हमेशा बनी रही.

 इसी कारण लोग सूर्यदेव की कृपा पाने के लिये भी कार्तिक शुक्ल षष्ठी को सूर्योपासना करते हैं. आप सभी को बता दें कि छठ पूजा का पर्व चार दिनों तक चलता है और छठ पूजा का पहला दिन नहाय खाय होता है वहीं छठ पूजा का दूसरा दिन खरना होता है वहीं षष्ठी के दिन छठ पूजा का प्रसाद बनाया जाता है और सप्तमी को सुबह सूर्योदय के समय भी सूर्यास्त वाली उपासना की प्रक्रिया को दोहराया जाता है.

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