जाना न भूलें ‘शिवसागर’, अगर आप भी बना रहे हैं छुट्टियों में नॉथ-ईस्‍ट जानें का प्‍लान तो…

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करीबन छह सौ वर्षों तक यहां राज करने वाले अहोम वंश के राजाओं की कहानियों को करीब से महसूस करना चाहते हैं तो शिवसागर सबसे उपयुक्त स्थान है।

कितना अच्छा हो कि आप इतिहास को किताबों में पढ़ने की बजाय उसे अपनी आंखों के सामने चलता-फिरता देख सकें। चौंकिए नहीं, ऐतिहासिक स्थलों पर पहुंचकर इतिहास आपकी आंखों के आगे जीवंत हो उठता है। बात हो रही है असम की राजधानी गुवाहाटी से करीब 360 किलोमीटर दूर स्थित शिवसागर की, जहां अहोम राजाओं की निशानियां हर ओर बिखरी हुई नजर आ जाती हैं। ब्रह्मपुत्र की सहायक नदी दिखू के किनारे स्थित इस स्थान की कुदरती खूबसूरती भी अनछुई है यानी यहां पर्यटकों की भीड़ उतनी नहीं पहुंचती, जितनी किसी आम चर्चित पर्यटन स्थलों पर पहुंचती है। बहरहाल, यदि आपकी रुचि अपने देश से जुड़ी विरासतों व संस्कृति को जानने-समझने में है, तो असम का शिवसागर जिला आपको खूब भाएगा। साफ-सुथरी और प्राकृतिक सुंदरता से सजी यहां की अनमोल विरासतों की ठंडी छांव में देर तक रुककर इस स्थान को देखने का आनंद ही कुछ और है।

शिवसागर जलाशय : इसी जलाशय के नाम पर शिवसागर जिले का नाम पड़ा है। यह 129 एकड़ भूभाग में फैला हुआ है। जाहिर है यहां आने के बाद आप इस जलाशय को देखने जरूर जाना चाहेंगे। प्राचीन होने की वजह से भी यह आकर्षण का केंद्र है। आप नौका विहार यानी बोटिंग का भी आनंद ले सकते हैं। सर्दियों में आने की योजना बने तो यहां प्रवासी पक्षियों के जमावड़े को देखना सुखद है। कुदरती सौंदर्य को कैमरे में कैद करना चाहते हैं तो यह जलाशय और इसके आसपास का क्षेत्र आपको फोटोग्राफी के लिहाज से भी सुंदर लगेगा।

जयसागर-सबसे बड़ा कृत्रिम सरोवर : यह अहोम राजा स्वर्गदेव रुद्र सिंह द्वारा तैयार कराया गया असम का सबसे बड़ा कृत्रिम सरोवर है। रुद्र सिंह ने अपनी माता जयमती की याद में इसे तैयार करवाया था। राजा ने सरोवर के उत्तरी छोर पर तीन मंदिर भी बनवाए, जिनमें जयदोल या केशवनारायण विष्णु दोल की खासी चर्चा

होती है। इस मंदिर में भगवान विष्णु के अनेक अवतारों की प्रतिमाएं स्थापित हैं। मुख्य मंदिर के पीछे भगवान सूर्य देव तथा भगवान गणेश के मंदिर भी बने हुए हैं। यदि आप देश की कुछ खूबसूरत वास्तुकलाओं को देखना चाहते हैं तो आपको यहां आकर अपार खुशी होगी। यकीनन आप अहोम युग की इस उत्कृष्ट कला की प्रशंसा करने से खुद को नहीं रोक पाएंगे।

शिवदोल-शिवप्रेमियों का गढ़ : शिवसागर में स्थित शिवदोल भारत के पवित्र तीर्थस्थलों में से एक माना जाता है। इसे पूर्वोत्तर भारत का प्रमुख शिव मंदिर माना जाता है। इसकी ऊंचाई 104 फीट तथा परिसीमा 195 फीट है। इस भव्य मंदिर से सटे दो अन्य मंदिर भी हैं- देवी दोल और विष्णु दोल, जिनमें देवी दुर्गा और भगवान विष्णु की प्रतिमाएं हैं। मंदिर की दीवारों और खंभों पर अनेक हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियां खुदी हुई हैं। यहां का प्रमुख उत्सव महाशिवरात्रि है। विश्वभर के पर्यटक बड़ी संख्या में इस पुण्य स्थल की यात्रा पर आते हैं।

एक पत्थर से बना ‘नामदांग स्टोन ब्रिज’: जोरहाट से शिवसागर की ओर जाते समय आपको रास्ते में नामदांग नदी पर बना 300 साल से भी अधिक पुराना एक छोटा-सा पुल मिलेगा, जिसे ‘नामदांग स्टोन ब्रिज’ के नाम से जाना जाता है। यह जानना रोचक है कि पूरे पुल को एक ही पत्थर से बनाया गया है। इस स्टोन ब्रिज के पास से राष्ट्रीय राजमार्ग 37 गुजरता है। साथ ही, शिवसागर से 12 किलोमीटर दूर गौरी सागर और जय सागर के बीच नामदांग नदी पर बांध भी बना हुआ है, जिसका निर्माण राजा रुद्रसिंह ने साल 1703 में करवाया था।

रंग घर: एशिया की प्राचीन रंगशाला यह दुमंजिला इमारत शिवसागर जिले के जयसागर इलाके में स्थित तलातल घर से उत्तर-पूर्व की ओर है। इसे अहोम राजा स्वर्गदेव प्रमत्त सिंह ने बनवाया था। अहोम काल में यह राजघराने के सदस्यों के लिए आमोद-प्रमोद और खेल-कूद का प्रिय स्थल हुआ करता था। इसमें बैठकर वे भैंसा युद्ध, सांड़ युद्ध आदि खेलों का आनंद लिया करते थे। आपको इसकी बनावट खूब लुभाएगी। ऐसा लगता है, जैसे कोई नाव उलट कर रख दी गई हो। इसे एशिया की सबसे पुरानी रंगशाला भी माना जाता है।

केंद्रीय बैप्टिस्ट चर्च

केंद्रीय बैप्टिस्ट चर्च शिवसागर जिले के बीचोबीच शिवसागर सरोवर के तट पर स्थित है। इसका निर्माण सन् 1845 में रिव नाथन ब्राउन ने करवाया था। कहते हैं कि जब असम की भाषा असमिया से बदलकर बांग्ला कर दी गई थी, तब ब्राउन ने असमिया भाषा को फिर से मान्यता दिलवाने की जोरदार वकालत की थी।

ताई अहोम संग्रहालय

ताई संग्रहालय में आप अहोम वंश से जुड़े इतिहास के साथ-साथ उनकी संस्कृति व शासन के दौरान लोगों के दैनिक जीवन की गतिविधियों को भी देख-जान सकते हैं। यह संग्रहालय शिवसागर सरोवर के पश्चिमी तट पर शहर के बीचोबीच स्थित है। इस संग्रहालय की स्थापना वर्ष 1972 में की गई थी और उसी साल इसे आगंतुकों के लिए खोला गया था। यहां 13वीं और 18वीं सदी के बीच शासन करने वाले अहोम वंशीय राजाओं के समय के आभूषणों का सबसे बड़ा संग्रह मिलता है। संग्रहालय के अन्य प्रमुख आकर्षण हैं- प्राचीन पांडुलिपियां, कपड़े और लकड़ी, धातु, बेंत, तलवारें, ढाल, थाली, बांस की वस्तुएं।

कारेंग घर और तलातल घर

शिवसागर शहर से 4 किलोमीटर दक्षिण में स्थित है सात मंजिला कारेंग घर और तलातल घर। इस भवन की ऊपरी चार मंजिलों को ‘कारेंग घर’ तथा तल में बनी तीन मंजिलों को ‘तलातल घर’ कहा जाता है। दरअसल, यह भवन अहोम राजाओं द्वारा सैनिक मुख्यालय के रूप में प्रयुक्त किया जाता था। तलातल घर से होकर बनी दो सुरंगें डिखू नदी के तट पर बने गरगांव महल से जुड़ी हुई थीं, जिनका प्रयोग युद्धकालीन आकस्मिक संकट के समय गुप्त निकास-द्वार के रूप में होता था। यहां आनेवालों को इस भवन की कुछ मंजिलों को देखने की अनुमति दी जाती है। भूमिगत मंजिलों को पूर्ण रूप से बंद कर दिया गया है। दुनियाभर के पर्यटक इस भव्य इमारत को देखने और इसकी वास्तुकला पर अनुसंधान करने के लिए आते हैं। यह भवन असम की सांस्कृतिक विरासत का एक उत्कृष्ट नमूना है।

आसपास की रौनक

चराइदेव: मिस्न के पिरामिडों जैसी समाधियां यह स्थान अहोम राजा-रानियों की समाधियों के कारण विख्यात है। शिवसागर से लगभग एक घंटे ड्राइव कर आप यहां पहुंच सकते हैं। यहां कुल 42 समाधियां हैं। इनका आकार-प्रकार मिस्न के पिरामिडों से काफी मिलता-जुलता है। यहां के स्तंभ और अन्य स्मारकों को देखकर मध्यकालीन असम के वास्तुकारों के कला-कौशल पर आपको भी गर्व होगा।

200 साल पुराना गौरीसागर सरोवर

यह सरोवर लगभग 200 साल पुराना है, जो शिवसागर शहर से 12 किलोमीटर दूर है। इनका निर्माण अहोम रानी फुलेश्वरी देवी ने करवाया था। यहां कई मंदिर बने हुए हैं। यहां भी काफी पर्यटक आते हैं।

रुद्रसागर सरोवर

रुद्रसागर सरोवर का निर्माण अहोम राजा लक्ष्मी सिंह ने सन् 1773 में अपने पिता रुद्र सिंह की याद में करवाया था। शिवसागर शहर से 8 किलोमीटर दूर रुद्रसागर सरोवर के किनारे भगवान शिव का एक भव्य मंदिर भी है।

अजान पीर की दरगाह

यह दरगाह संत हजरत शाह मिलान की याद में बनवाई गई थी। उन्हें अजान पीर के नाम से भी जाना जाता है। यह दरगाह शिवसागर से 22 किलोमीटर दूर सराईगुरी चापोरी इलाके में दिखऊ नदी के तट पर स्थित है। यहां हर साल लगने वाले ‘उर्स’ में पूरे असम के मुसलमान एकत्रित होकर अजान पीर के प्रति श्रद्धा प्रकट करते हैं।

लोस कोरा और पीठा का स्वाद

शिवसागर इलाके का खानपान आपको जाना-पहचाना लगेगा यानी जिसका स्वाद आपने पहले कभी चखा हो। बस, इसे बनाने की विधि अलग होती है, इसलिए स्थानीयता का पुट आ जाता है और इस कारण स्वाद भी अलग लगता है। जैसे पीठा का स्वाद आप जानते हैं। यहां यह खूब खाया जाता है। यहां यह मीठे व्यंजनों में शामिल है जो गुड़ और चावल से बनता है। यहां इसे कई प्रकार से खाया जाता है, जैसे- तिल पीठा, गीला पीठा, सुंकरी पीठा आदि। मीठे में एक और मिठाई है लोस कोरा। इसे नारियल और चीनी मिलाकर तैयार किया जाता है। यह बिल्कुल नारियल लड्डू की तरह है। नमकीन में आलू पिटिका पसंद किया जाता है। खार नाम का व्यंजन मांस से बनता है, जिसमें पपीते का भी प्रयोग किया जाता है। टेंगी मछली की करी और बत्तख का मांस यहां के लोकप्रिय मांसाहारी भोजन हैं। यहां खानपान के लोकप्रिय अड्डों की तलाश में समय गंवाने से अच्छा है कि आप यहां सेपिया बेकरी और कन्हाइज बेकरी को एक बार जरूर आजमाएं।

खरीदारी हस्तशिल्प की

गमछा यहां के लोगों का प्रिय वस्त्र है, जिसे यहां दुपट्टे की तरह इस्तेमाल किया जाता है। इन रंग-बिरंगे दुपट्टों को आप यहां के स्थानीय बाजार में उचित दामों में खरीद सकते हैं। इसके अलावा, आपको असमी साड़ियों के साथ-साथ यहां मूंगा सिल्क, पटमूंगा और अबानीपट सिल्क की साड़ियां भी खूब पसंद आएंगी। दरअसल, यहां जो चीज सबसे अधिक लुभाती है, वह है यहां का हस्तशिल्प। हस्तशिल्प वस्तुओं में असमिया गमछे के साथसाथ बांस और लकड़ी से बनी वस्तुएं खरीदी जा सकती हैं। खरीदारी के लिए आप यहां के सेंट्रल मार्केट, रेडक्रॉस रोड, मुक्तिनाथ चौराहा तथा हॉस्पिटल रोड पर बनी दुकानों का रुख कर सकते हैं। ये बाजार बड़े लुभावने दिखते हैं। खासतौर पर यहां स्ट्रीट यानी गली शॉपिंग का जवाब नहीं। यहां बिखरी हुई हस्तकलाएं आंखों को लुभाती हैं।

पाणिदिहिंग अभयारण्य

यह अभयारण्य शिवसागर जिले में ब्रह्मपुत्र नद के दक्षिणी तट पर स्थित है, जो शिवसागर शहर से करीब 22 किलोमीटर दूर है। स्थानीय और प्रवासी पक्षियों को मिलाकर यहां लगभग 165 प्रजाति के पक्षी दिख जाते हैं। इनमें स्पॉट बिल डक, एडजुटेंट स्टॉर्क, ओपन बिल स्टॉर्क, ह्वाइट नेक्ड स्टॉर्क इत्यादि उल्लेखनीय हैं। यहां विभिन्न प्रजातियों के सांप, मेढक, मछलियां तथा अन्य प्रकार के उभयचर और जलीय जीव भी पाए जाते हैं।

कैसे और कब जाएं?

निकटतम हवाई अड्डा जोरहाट यहां से 75 किलोमीटर तथा डिब्रूगढ़ हवाई अड्डा 95 किलोमीटर दूर है। सिमलगुरी निकटतम रेलवे स्टेशन है, जो शिवसागर से तकरीबन 17 किमी. दूर है। वैसे तो यहां आने का आदर्श मौसम जाड़ों में माना जाता है, लेकिन गर्मियों के मौसम में भी यहां पर्यटकों की भीड़ देखी जा सकती है।

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