जानिए पूजन का विधान

- in धर्म

वर्षभर आने वाले व्रतों में कार्तिक शुक्ल नवमी का विशेष महत्व है। इस व्रत को आंवला नवमी, धात्री नवमी, कुष्मांड नवमी तथा अक्षय नवमी भी कहते हैं। इस दिन स्नान, पूजन, तर्पण तथा अन्न के दान से अनंत फल मिलता है। पद्यपुराण में वर्णन है कि आंवला वृक्ष साक्षात विष्णु का ही स्वरूप है। आंवले का वृक्ष साक्षात भगवान विष्णु का स्वरूप है।

यह विष्णु भगवान को प्रिय है और इसके स्मरण मात्र से गोदान के बराबर फल मिलता है। यह सदा ही सेवन के योग्य है। कहा गया है कि इस वृक्ष के मूल में विष्णु, ऊपर ब्रह्मा, स्कंद में रुद्र, शाखाओं में मुनिगण, टहनियों में देवता, पत्तों में वसु, फूलों में मरुद्रण तथा फलों में प्रजापति विद्यमान होते हैं। कार्तिक महात्म्य में आई कथा बताती है कि पार्वतीजी के श्राप के कारण भगवान विष्णु आंवला वृक्ष के रूप में परिणत हुए। आंवले को अमृतफल भी कहा जाता है। यह वैज्ञानिक रूप से भी आंवला स्वास्थ्यवर्द्धक है।

इस दिन किए गए व्रत, दान से संतान प्राप्ति होती है। पुराणों के अनुसार अक्षय या आंवला नवमी को आंवले की पूजा से बहुत फल प्राप्त होते हैं। इस दिन गाय, सुवर्ण, पृथ्वी, कुष्मांड और वस्त्रादि का दान करने से उच्च पद की प्राप्ति होती है और महापापों से मुक्ति मिलती है।

पितृदोष के निवारण तथा पितरों के उद्धार के निमित्त भी कुम्हड़े का दान ही श्रेष्ठ है। यदि घर में बीमारी का प्रकोप हो तो धर्मस्थल में पके हुए कुष्मांड का दान करना चाहिए। अक्षय नवमी को ही विष्णु भगवान ने कुष्माण्डक दैत्य को मारा था और उसके रोम से कुष्माण्ड की बेल हुई। इसी कारण कुष्माण्डका दान करने से उत्तम फल मिलता है। इसमें गन्ध, पुष्प और अक्षतों से कुष्माण्ड का पूजन करना चाहिए।

विधि विधान से तुलसी का विवाह कराने से कन्यादान तुल्य फल मिलता है। अक्षय नवमी को आंवला पूजन स्त्री जाति के लिए अखंड सौभाग्य और पेठा पूजन से घर में शांति, आयु एवं संतान वृद्धि होती है। पुराणाचार्य कहते हैं कि आंवला त्योहारों पर खाए गरिष्ठ भोजन को पचाने और पति-पत्नी के मधुर सबंध बनाने वाली औषधि है।

आंवला नवमी या अक्षय नवमी के दिन द्वापर युग का प्रारंभ हुआ था। आंवले के वृक्ष में समस्त देवी-देवताओं का निवास होता है। आंवला नवमी की पूजा का विधान इस तरह है-

नवमी के दिन महिलाएं सुबह से ही स्नान ध्यान कर आंवला के वृक्ष के नीचे पूर्व दिशा में मुंह करके बैठती हैं।

– इसके बाद वृक्ष की जड़ों को दूध से सींच कर उसके तने पर कच्चे सूत का धागा का धागा लपेटा जाता है।

तत्पश्चात रोली, चावल, धूप दीप से वृक्ष की पूजा की जाती है।

– महिलाएं आंवले के वृक्ष की सात परिक्रमाएं करके ही भोजन करती हैं। जिसके प्रभाव से मनुष्य रोगमुक्त होकर दीर्घायु बनता है।

loading...
Loading...

You may also like

गुरुवार को भूलकर भी न करें ये काम, हो सकती है बड़ी अनहोनी

ऐसे तो हिंदू धर्म में हर दिन का