ब्रह्माजी,की पूजा क्यों नही होती..जानिए

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 हिंदू ग्रंथों और पुराणों के अनुसार ब्रह्मा, विष्णु और महेश को सृष्टि का निर्माता, पालनकर्ता और संहारक माना जाता हैं। लेकिन आप के मन में ये सवाल कई बार आता होगा कि विष्णु और महेश (शिव जी) के तो दुनियाभर में कई मंदिर हैं और लोग घर में भी इनकी स्थापना कर इनकी पूजा करते हैं। लेकिन ब्रह्मा की पूजा कभी नहीं की जाती। और उनका केवल एक ही मंदिर है, जो पुष्कर में है। इसका एक प्रसंग ब्रम्हा जी और सरस्वती के विवाह से जुड़ा हुआ है। इस प्रसंग का उल्लेख सरस्वती पुराण में किया गया है। 

प्रसंग के अनुसार

  1. क्या है प्रसंग?प्रसंग के अनुसार सरस्वती जी ब्रह्मा जी की बेटी थीं। ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना के बाद सरस्वती जी को अपने तेज से उत्पन्न किया था। इसीलिए यह कहा जाता है कि सरस्वती जी की कोई मां नहीं थी। सरस्वती जी को विद्या की देवी कहा जाता है। प्रसंग के अनुसार सरस्वती मरता बहुत ही खूबसूरत और आकर्षक थीं इस कारण स्वयं ब्रम्हा जी भी उनकी ओर आकर्षित हो गए और उनके मन में सरस्वती माता से विवाह करने का विचार आ गया।
  2. सरस्वती जी जान गई थीं ब्रम्हा जी की इच्छासरस्वती माता ब्रम्हा जी की इच्छा को जान गई थीं। वो अपने पिता से विवाह नहीं करना चाहती थीं। वह ब्रम्हा जी की नजरों से बचने का प्रयास करने लगीं। लेकिन उनके ये सभी प्रयास असफल रहे। अंत में सरस्वती जी को ब्रह्मा से विवाह करना पड़ा। ऐसा माना जाता है कि इसकी देवलोक में बहुत आलोचना हुई और यही कारण है कि ब्रह्मा जी की पूजा नहीं की जाती।
  3. 100 सालों तक किया जंगलों में निवाससरस्वती पुराण में कहा गया है कि ब्रम्हा और सरस्वती ने 100 साल तक जंगल में पति-पत्नी के रूप में बिताया। इस दौरान ब्रम्हा और सरस्वती में प्रेम बना रहा। इन दोनों का एक पुत्र भी हुआ। इस पुत्र को स्वयंभू मनु के नाम से जाना गया। बता दें कि ब्रम्हा और सरस्वती के विवाह को लेकर कुछ और भी प्रसंग प्रचलित हैं। लोग अन्य प्रसंगों को भी कहते-सुनते रहते हैं। साथ ही अलग-अलग प्रसंगों की सत्यता को लेकर अलग-अलग दावे भी हैं।




इनके अमर होने के बारे में एक कथा है कि बचपन में लोमश मुनि को मृत्यु से बड़ा भय लगता था। इससे बचने के लिए उन्होंने भगवान शंकर की घोर तपस्या की। जब भगवान आशुतोष प्रसन्न हुए और उनसे वर मांगने को कहा तो उन्होंने कहा – “देवाधिदेव! यदि आप मुझसे प्रसन्न हैं तो मेरा यह नर तन अजर-अमर कर दीजिऐ क्योंकि मुझे मृत्यु से बड़ा भय लगता है। तब भगवान शंकर ने कहा – “लोमश! यह नहीं हो सकता। इस मृत्युलोक की सारी चीजें नश्वर हैं और आज नहीं तो कल सभी विनाश को प्राप्त होंगी। यह अटूट ईश्वरीय विधान है जिसको कोई भी नहीं बदल सकता। अतः तुम्हारे इस भौतिक शरीर को मैं अजर-अमर नहीं कर सकता किन्तु तुमने मुझे प्रसन्न किया है इसीलिए लम्बी आयु का वरदान माँग लो। तब लोमश ऋषि ने चालाँकि से कहा – “अच्छा! तो मैं यह मांगता हूँ कि एक कल्प के बाद मेरा एक रोम गिरे और इस प्रकार जब मेरे शरीर के सारे के सारे रोम गिर जाऐं तभी मेरी मृत्यु हो।” भगवान शंकर मुस्कुराये और ‘एवमस्तु’ कहकर तुरन्त अंर्त्ध्यान हो गऐ। आरम्भ में तो वे बड़े प्रसन्न हुए किन्तु जल्द ही अपने इस जीवन को जीते-जीते वे थक गए। उन्होंने मृत्यु की कामना भी की किन्तु वो संभव नहीं था क्यूंकि महादेव के वरदान के कारण उनके रोम की संख्या तक कल्प बीतने के बाद ही उनकी मृत्यु संभव थी। अपनी इसी वेदना को ऋषि लोमश श्रीराम के पिता महाराज दशरथ को कहते हैं। एक बार वे अयोध्या पहुँचे और देखा कि महाराज दशरथ अपने किले की मरम्मत करा रहे हैं। तब उन्होंने दशरथ से पूछा – “हे राजन! इतनी सुरक्षा की क्या आवश्यकता? क्या तुम भी चिरकाल तक जीना चाहते हो? अरे अधिक से अधिक तुम कई हजार साल जी लोगे लेकिन यहाँ देखो कि मैं मरना भी चाहूँ तो मर नहीं सकता।” तब उन्होंने दशरथ को महादेव द्वारा दिये गए वरदान की बात बताई और कहा – “हे राजन! आज अगर कोई मुझे मृत्यु दे सके तो मैं उसे अपनी सारी आयु और अपना समस्त पुण्य दे दूँ। लेकिन अभी तो मेरे बाएं पैर के घुटने तक ही रोम झड़े हैं। अभी पता नहीं मुझे और कितना जीना पड़े। मैंने महारुद्र को छलना चाहा और उसी का ये परिणाम है कि उनके ये वरदान भी मेरे लिए श्राप बन गया। इसीलिए हे राजन! ये जान लो कि किसी को भी ईश्वर से अपनी शक्ति के बाहर कुछ माँगना नहीं चाहिए।”बिहार में गया के पास जहानाबाद में लोमश ऋषि की मानव निर्मित गुफा है जिसका निर्माण मौर्य काल में अशोक के शासनकाल में बनाया गया था। हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले में स्थित रेवाल्सर शहर में लोमश ऋषि का मंदिर स्थित है। 

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