20 हजार करोड़ खर्च, फिर भी बीते तीन सालों में गंगा हुई और मैली : रिपोर्ट

गंगागंगा

नई दिल्ली। पीएम नरेंद्र मोदी ने बीते लोकसभा चुनाव में गंगा नदी की सफाई का संकल्प लिया था। प्रधानमंत्री की कुर्सी संभालने के बाद 2015 में ‘नमामि गंगे’ परियोजना शुरू की । इसके तहत उनकी सरकार अब तक 20,000 करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं, लेकिन बीते तीन सालों में गंगा का साफ होना तो दूर, उसकी हालत और ज्यादा खराब हुई है।

गंगा के पानी में कॉलिफॉर्म बैक्टीरिया और जैव रासायनिक ऑक्सीजन मांग में जबर्दस्त बढ़ोतरी

इसका खुलासा वाराणसी स्थित संकट मोचन फाउंडेशन (एसएमएफ) नामक संस्था ने अपनी एक रिपोर्ट में किया है। रिपोर्ट में कहा है कि गंगा के पानी में कॉलिफॉर्म बैक्टीरिया और जैव रासायनिक ऑक्सीजन मांग (बीओडी) में जबर्दस्त बढ़ोतरी हुई है।

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एसएमएफ 1986 से गंगा के पानी की गुणवत्ता पर  रख रहा है नजर

बता दें कि एसएमएफ 1986 से गंगा के पानी की गुणवत्ता पर नजर रख रहा है। इसके लिए इस गैर-सरकारी संस्थान ने अपनी खुद की प्रयोगशाला बनाई हुई है। संस्था नियमित तौर पर नदी के पानी की जांच करती रहती है। रिपोर्ट के मुताबिक एसएमएफ ने गंगा नदी से जुड़ा जो डेटा इकट्ठा किया है, वह नदी के पानी में फैल चुके भयानक प्रदूषण की गवाही देता है।

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एसएमएफ के आंकड़ों के मुताबिक जनवरी, 2016 में गंगा नदी के पानी में प्रदूषित कॉलिफॉर्म की संख्या 4.5 लाख से 5.2 करोड़ तक पाई

रिपोर्ट के मुताबिक 100 मिलीलीटर या उससे कम पीने योग्य पानी में 50 एमपीएन (मोस्ट प्रोबेबल नंबर) कॉलिफॉर्म होना चाहिए। वहीं, नहाने वाले पानी की इतनी ही मात्रा में 500 एमपीएन कॉलिफॉर्म चल जाता है। इसके अलावा गंगा के एक लीटर पानी में बीओडी की मात्रा तीन मिलीग्राम से कम होनी चाहिए। एसएमएफ के आंकड़ों के मुताबिक जनवरी, 2016 में गंगा नदी के पानी में प्रदूषित कॉलिफॉर्म की संख्या 4.5 लाख से 5.2 करोड़ तक पाई गई थी, लेकिन फरवरी, 2019 आते-आते यह संख्या 3.8 से 14.4 करोड़ तक पहुंच गई।

गंगा के पानी में कॉलिफॉर्म का भारी मात्रा में होना मानवीय स्वास्थ्य के लिए खतरे की घंटी : प्रोफेसर वीएन मिश्रा

संस्था के अध्यक्ष आईआईटी-बीएचयू के प्रोफेसर वीएन मिश्रा कहते हैं कि इसी तरह बीओडी का स्तर जनवरी, 2016 से फरवरी 2019 के बीच 46.5-54 मिलीग्राम प्रति लीटर से बढ़कर 66-78 मिलीग्राम प्रति लीटर हो गया है। इसके अलावा पानी में ऑक्सीजन की मात्रा प्रति लीटर छह मिलीग्राम होनी चाहिए जो इस अवधि के दौरान घट कर 2.4 से 1.4 मिलीग्राम रह गई है। प्रोफेसर मिश्रा ने बताया कि गंगा के पानी में कॉलिफॉर्म का भारी मात्रा में होना मानवीय स्वास्थ्य के लिए खतरे की घंटी है।

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