लखनऊ विश्वविद्यालय में अखिल भारतीय दर्शन परिषद के 63वें अधिवेशन का शुभारम्भ

- in उत्तर प्रदेश, लखनऊ
लखनऊ विश्वविद्यालयलखनऊ विश्वविद्यालय

लखनऊ। लखनऊ विश्वविद्यालय के मालवीय सभागार में रविवार को अखिल भारतीय दर्शन परिषद के तीन दिवसीय 63वें अधिवेशन का शुभारम्भ हुआ। विश्वविद्यालय के दर्शनशास्त्र विभाग द्वारा आयोजित कार्यक्रम के मुख्य अतिथि राज्यसभा सदस्य अशोक वाजपेयी ने कहा कि धर्म, नैतिकता व संस्कृति इन तीनों को अलग-अलग नहीं किया जा सकता। ये तीनों मनुष्यता के लिये अनिवार्य है। भारतीय संस्कृति में खुलापन है और सभी कल्याणकारी विचारों को आत्मसात कर लेती है। तो वहीं  भारतीय विचारों पर पाश्चात्य संस्कृतियों ने खूब हमला किया।

वाजपेयी ने कहा कि राष्ट्र की धरोहरों को संरक्षित करना ही राष्ट्रभक्ति है। गैर भारतियों की संस्कृति सुख-सुविधा पर आधारित है।  उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति का आधार आध्यात्म है और धर्म के मार्ग पर आदर्श मानव का निर्माण होगा। तभी भारत का विचार परोपकार का है।

विशिष्ट अतिथि इंडियन काउंसिल ऑफ फिलॉसॉफिकल रिसर्च के सेक्रेटरी सदस्य प्रो. रजनीश शुक्ला ने कहा कि वर्तमान भारत में शिक्षा के क्षेत्र में तेजी से परिवर्तन हुआ है, लेकिन दर्शनशास्त्र के क्षेत्र में कुछ कमी है। वैचारिक भूमिका का निर्वहन न होने से देश की संस्कृति व विकास में ह्रास हुआ। उन्होंने कहा कि भारतीय नागरिकों को तय करना होगा कि”हमारी वैचारिक चेतना क्या है, हमारे कल्याणकारी विचार क्या हैं, हमारा दर्शन क्या है?

ये भी पढ़े : बड़ी खुशखबरी: झारखण्ड PSC में सरकारी नौकरी का अच्छा मौका, सैलरी 1 लाख 66 हजार रु 

प्रो. शुक्ला ने कहा कि हमारे यहां भूमि के पुत्र होने की बात कही गयी है। पाश्चात्य दार्शनिकों ने मनुष्य को जानवर से तुलना करके परिभाषित किया, जो कि हमेशा विवादित रहा है। वहीं, भारत में मनुष्य की आवधारणा के संदर्भ में स्पष्ट है कि अपने नैतिक विचारों व संस्कृति के आधार पर धर्म के मार्ग पर चलने से मनुष्य का निर्माण होता है। यह एक सतत् प्रक्रिया है।

प्रो. रजनीश ने कहा कि भारतीय समुदाय अपने धरातल पर खड़ा हो गया है। वे दिन बीत गये, जब प्रतिउत्तर देने पड़ते थे। आज पूरी दुनिया अपने अस्तित्व को बचाये रखने के लिये भारत की ओर देख रही है। भारत का युवा समाज मूल्यांकन कर रहा है। सांस्कृतिक मूल्यों का सृजन कर रहा है। यह बात विश्व ने स्वीकार कर लिया है।

प्रो. शुक्ला ने कहा कि वैचारिक श्रेष्ठता से बदलाव नहीं आएगा। वैचारिक श्रेष्ठता के अनुसार ही आचरण व क्रिया होना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि पूरे भारत में भारतीय भाषाओं के माध्यम से दर्शन की शिक्षा का आंदोलन दिखायी दे रहा है। उन्होंने कहा कि भारतीय इतिहास में ‘संस्कृति गैप’  है। इतिहास व चर्चा गलत हुई है। अब उन गैप को भरा जा रहा है। चर्चा शुरु हो गयी है। उन्होंने बीजिंग में आयोजित एक कार्यक्रम का जिक्र करते हुए कहा कि वहां दर्शन का एक पूरा सत्र केवल हिन्दी में चलाया गया। यह भारत के लिये एक उपलब्धि है।

लखनऊ विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. एसपी सिंह ने कहा कि दर्शन व्यक्ति के जीवन की यात्रा को निर्धारित करता है। मनुष्य के आंतरिक स्वरुप का निर्धारण करता है। दर्शन बिगड़ता है तो विध्वंस होता है। उन्होंने कहा कि उन विचारों का सृजन हो, जिससे रचनात्मकता की शुरूआत हो।

इस अवसर पर युवा दार्शनिकों व दर्शनशास्त्र के क्षेत्र में कार्य करने वाले आठ विभूतियों को प्रशस्ति पत्र, स्मृत चिन्ह व नकद राशि देकर सम्मानित किया गया। वहीं, कई लेखकों के पुस्तकों का विमोचन भी हुआ।

ये भी पढ़े : सरकारी नौकरी का बेहद स्वर्णिम मौका, NRHM में 365 पद खाली 

इन्हें मिला पुरस्कार

प्रो. राजेन्द्र स्वरूप भटनागर को अखिल भारतीय दर्शन परिषद आजीवन परिलब्धि पुरस्कार

प्रो. नरेन्द्रनाथ पांडेय को आचार्य रामप्रसाद त्रिपाठी स्मृति पुरस्कार

प्रो. सत्यपाल गौतम को स्वामी प्रणवानन्द दर्शन पुरस्कार

डॉ. श्रीकांत मिश्र को श्री खचेन्द्र सिंह नागर स्मृति पुरस्कार

डॉ. रमशचन्द्र वर्मा को प्रो. सोहनराज तातेड़ दर्शन पुरस्कार

डॉ. रेणुबाला को वैद्य गणपतराम जानी गुजरात पुरस्कार

मनोज कुमार मिश्र को स्वामी दयानन्द निबंध पुरस्कार

डॉ. आलोक को कमलादेवी जैन स्मृति सर्वश्रेष्ठ शोध-पत्र पुरस्कार

डॉ. पवन कुमार यादव को अखिल भारतीय युवा दार्शनिक पुरस्कार

loading...
Loading...

You may also like

अल्पसंख्यकों का उत्पीडऩ किसी भी सूरत में नहीं किया जाएगा बर्दाश्त- शिवपाल

लखनऊ। समाजवादी पार्टी से अलग होकर प्रगतिशील सपा