• About us
  • Privacy Policy
  • Disclaimer
  • Terms & Conditions
  • Child Safety Policy
  • Contact
24 Ghante Latest Hindi News
  • होम
  • राष्ट्रीय
    • उत्तराखंड
    • उत्तर प्रदेश
    • पंजाब
    • हरियाणा
    • छत्तीसगढ़
    • राजस्थान
    • हिमाचल प्रदेश
  • राजनीति
  • अंतर्राष्ट्रीय
  • क्राइम
  • मनोरंजन
  • शिक्षा
  • स्वास्थ्य
  • धर्म
  • होम
  • राष्ट्रीय
    • उत्तराखंड
    • उत्तर प्रदेश
    • पंजाब
    • हरियाणा
    • छत्तीसगढ़
    • राजस्थान
    • हिमाचल प्रदेश
  • राजनीति
  • अंतर्राष्ट्रीय
  • क्राइम
  • मनोरंजन
  • शिक्षा
  • स्वास्थ्य
  • धर्म
No Result
View All Result

ऐसे तो सदियों तक चलती रहेगी आरक्षण व्यवस्था

Writer D by Writer D
11/08/2021
in Main Slider, ख़ास खबर, नई दिल्ली, राजनीति, राष्ट्रीय, शिक्षा
0
14
SHARES
176
VIEWS
Share on FacebookShare on TwitterShare on Whatsapp

सियाराम पांडेय ‘शांत’

डॉ. भीमराव अंबेडकर दलितों के लिए केवल दस साल का आरक्षण चाहते थे ताकि उनकी सामाजिक और आर्थिक स्थिति में बदलाव लाया जा सके।

दस साल बाद वे आरक्षण का लाभ पाने वाले दलितों की स्थिति की समीक्षा के तो पक्षधर थे ही, वे यह भी चाहते थे कि जिन लोगों को एक बार आरक्षण का लाभ मिल गया हो, उनके परिजनों को आरक्षण लाभ न दिया जाए लेकिन भारत में ठीक इसके विपरीत हुआ। जिसे पहली बार आरक्षण का लाभ मिला, वे और उनके परिजन बार-बार आरक्षण का लाभ पाते रहे और दलितों का एक बड़ा तबका नौकरियों में आरक्षण के लाभ से निरंतर वंचित रहा। यही हालत रहे तो भविष्य में भी वह कभी आरक्षण लाभ पा सकेगा, इसकी संभावना नहीं के बराबर है। राजनीतिक दल अपने वोट का समीकरण बिठाने के लिए आरक्षण की सीमा दस—दस साल आगे बढ़ाते रहे। अब तो यह तर्क भी दिए जाने लगे हैं कि जब तक समाज का एक भी व्यक्ति विकास की दौड़ में पीछे है, तब तक आरक्षण का समर्थन किया जाएगा लेकिन देश में यह आदर्श स्थिति कब आएगी, इस सवाल का जवाब न तो सत्तारूढ़ दल के पास है और न ही विपक्ष व किसी स्वयंसेवी संगठन के।

अंबेडकर ने कहा था कि आरक्षण सहारा बनना चाहिए न कि बैसाखी, जिसके सहारे पूरी जिंदगी काट दी जाए। पता नहीं, उनकी भावनाओं पर इस देश में कभी गौर किया भी जाएगा या नहीं। आरक्षण का लाभ दलितों और पिछड़ों में लाभान्वित परिवारों को संविधान निर्माण की तिथि और मंडल कमीशन लागू होने के बाद से आज तक होता आ रहा है और अगर इसी तरह चलता रहा तो कई सदियों बाद भी दलितों और पिछड़ों की माली हालत सुधरेगी नहीं। उनमें से एक वर्ग धनाढ्यों की जमात में खड़ा नजर आएगा और दूसरा याचक की मुद्रा में। अब यह तो इस देश के नेतृवर्ग को ही तय करना है कि वे सामाजिक, आर्थिक विषमता की इस खाई को दूर करने के प्रति कितने गंभीर हैं।

हंगामे की भेंट चढ़ा मानसून सत्र, लोकसभा की कार्यवाही अनिश्चितकाल के लिए स्थगित

रांची में हुए लोकमंथन कार्यक्रम में पूर्व लोकसभा अध्यक्ष ने बहुत ही सामयिक प्रश्न पूछा था कि क्या नौकरी और शिक्षा व्यवस्था में आरक्षण को स्थायी कर देने से देश की प्रगति हो जाएगी। यह और बात है कि उस सभा में एक भी जवाब के स्वर नहीं उभरे थे। यह और बात है कि उस सभा में मौजूदा उपराष्ट्रपति और राज्यसभा के अध्यक्ष एम. वेंकैया नायडू भी मौजूद थे और उन्होंने भी आरक्षण की प्रासंगिकता पर चिंतन की बात कही थी।लोकसभा में अन्य पिछड़ा वर्ग की सूची तय करने का राज्यो को अधिकार देने का विधेयक पास हो गया। राज्यसभा में भी यह विधेयक पारित हो जाएगा। मानसून सत्र को किसान कानून, महंगाई और पेगासस  मुद्दे पर चलने नहीं दिया था लेकिन जब बात वोट की आई तो उनके स्वर एक हो गए। अब सवाल यह है कि वोट की राजनीति के लिए हम कब तक आरक्षण—आरक्षण खेलते रहेंगे।

देश में लगभग 40 प्रतिशत मतदाता अन्य पिछड़ा वर्ग के हैं। इसलिए कोई भी दल इस विधेयक का विरोध कर अन्य पिछड़ा वर्ग की नाराजगी मोल नहीं लेना चाहेगा। लोकसभा में नेता विरोधी दल अधीर रंजन चौधरी की मांग बेहद प्रासंगिक है। उनकी मांग है कि सरकारी नौकरियों और शिक्षा क्षेत्र में आरक्षण का प्रतिशत 50 से अधिक होना चाहिए।कुछ इसी तरह की मांग अन्य विपक्षी दल भी कर रहे हैं। इसकी बिना इस विधेयक के पास हो जाने पर भी बात तो वहीं की वहीं रहेगी।

केन्द्रीय मंत्री व सचिवों से CM योगी नाराज, जानें पूरा मामला

राज्य सरकारें और केंद्र शासित प्रदेश अपनी जरूरतों के हिसाब से अन्य पिछड़ा वर्ग की सूची तैयार करने का हक पा भी जाएं तो वह किस मतलब का है? वे कुछ जातियों को तो आरक्षण सूची में शामिल कर सकती हैं लेकिन आरक्षण तो उन्हें निर्धारित 50 प्रतिशत की सीमा के तहत ही देना है। यदि ऐसा होता है तो जिन जातियों को आरक्षण का लाभ मिलेगा वे तो खुश होंगी लेकिन जिनके हिस्से से कटकर आरक्षण ओबीसी में शामिल नई जातियों को मिलेगा, उनकी नाराजगी और तिलमिलाहट का दंश भी राज्य सरकारों को भुगतना पड़ सकता है।

दरअसल सर्वोच्च न्यायालय ने इसी वर्ष 5 मई को संविधान के 102वें संशोधन के हवाले से आदेश दिया था कि राज्यों को सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े लोगों को नौकरी और एडमिशन में आरक्षण देने का अधिकार नहीं है। अपने इसी फैसले में देश की शीर्ष अदालत ने महाराष्ट्र में मराठों को  अन्य पिछड़ा वर्ग में शामिल कर आरक्षण देने के उद्धव ठाकरे सरकार फैसले पर भी रोक लगा दी थी।

गौरतलब है कि वर्ष 2018 में हुए इस 102वें संविधान संशोधन में पिछड़ा वर्ग आयोग की शक्तियों और जिम्मेदारियों को परिभाषित किया गया था। साथ ही, यह भी बताया गया था कि संविधान की धारा 342ए संसद को पिछड़ी जातियों की  सूची बनाने का अधिकार देती है। इस संशोधन के बाद विपक्षी पार्टियां यह आरोप लगाती  रहीं कि केंद्र संघीय ढांचे को बिगाड़ रहा है। 127 वां संविधान संशोधन बिल संसद में पेश कर केंद्र सरकार ने विपक्ष के उन आरोपों की जड़ में ही मट्ठा डाल दिया है।  यह और बात है कि 5 मई को आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले का केंद्र ने भी विरोध किया था। इसी के बाद 2018 के संविधान संशोधन में बदलाव की कवायद शुरू हुई। इस बिल के पास होने के बाद एक बार फिर राज्यों को पिछड़ी जातियों की लिस्टिंग का अधिकार मिल जाएगा। वैसे भी 1993 से ही केंद्र और राज्य/केंद्रशासित प्रदेश दोनों ही  ओबीसी की अलग-अलग लिस्ट बनाते रहे हैं। 2018 के संविधान संशोधन के बाद ऐसा नहीं हो पा रहा था। इस बिल के पास होने के बाद दोबारा से पुरानी व्यवस्था लागू हो जाएगी। इसके लिए संविधान के आर्टिकल 342 ए में संशोधन किया गया है। इसके साथ ही आर्टिकल 338बी और 366 में भी संशोधन किए गए हैं।

हंगामे के बीच भावुक हुए नायडू, बोले- संसद में जो हुआ, उससे बहुत दुखी हूं

इस बिल के पास होते ही राज्य सरकारें अपने राज्य के हिसाब से अलग-अलग जातियों को अन्य पिछड़ा वर्ग के कोटे में डाल और निकाल सकेंगी। इससे हरियाणा में जाट, राजस्थान में गुर्जर, महाराष्ट्र में मराठा, गुजरात में पटेल, कर्नाटक में लिंगायत आरक्षण का मार्ग प्रशस्त हो सकता है। ये जातियां लंबे समय से आरक्षण मांग भी रही हैं। इंदिरा साहनी केस के फैसले के मुताबिक अगर कोई 50 प्रतिशत की सीमा के बाहर जाकर आरक्षण देता है तो सुप्रीम कोर्ट उस पर रोक लगा सकता है। इसी वजह से कई राज्य इस सीमा को खत्म करने की मांग कर रहे हैं।

वर्ष 1991 में पीवी नरसिम्हा राव सरकार ने आर्थिक आधार पर सामान्य श्रेणी के लिए 10फीसद आरक्षण दिया था। राव सरकार के फैसले के खिलाफ पत्रकार इंदिरा साहनी ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। साहनी केस में नौ जजों की बेंच ने कहा था कि आरक्षण का कोटा 50 फीसद से ज्यादा नहीं होना चाहिए। इसी फैसले के बाद से कानून बना कि 50प्रतिशत से ज्यादा आरक्षण नहीं दिया जाएगा। यही कारण है कि राजस्थान में गुर्जर, हरियाणा में जाट, महाराष्ट्र में मराठा, गुजरात में पटेल जब भी आरक्षण मांगते हैं तो सुप्रीम कोर्ट का ये फैसला आड़े आ जाता है। इसके बाद भी कई राज्यों ने इस फैसले की काट निकाल ली है। देश के कई राज्यों छत्तीसगढ़, तमिलनाडु, हरियाणा, बिहार, गुजरात, केरल, राजस्थान आदि में कुल आरक्षण 50प्रतिशत से ज्यादा है। विपक्ष लंबे समय से जातिगत जनगणना की मांग कर रहा है। इस विधेयक के जरिए केंद्र सरकार ने पिछड़ी जातियों को साधने की कोशिश की है। बिल पास होने के बाद हरियाणा, गुजरात, कर्नाटक जैसे राज्यों की भाजपा सरकारें जाट, पटेल और लिंगायत जातियों को ओबीसी में शामिल कर चुनावी फायदा उठाना चाहेंगी।

हरियाणा में जाट हों या गुजरात के पटेल, कर्नाटक के लिंगायत हों या महाराष्ट्र के मराठा ये सभी अपने-अपने राज्य में निर्णायक भूमिका में हैं। इसलिए राजनीतिक पार्टियां इन जातियों को साधने की तरह-तरह की कोशिश करती रहती हैं। आरक्षण भी उसमें से एक है।

देश में आरक्षण का इतिहास लगभग 136 साल पुराना है। भारत में आरक्षण की शुरुआत वर्ष 1882 में हंटर आयोग के गठन के साथ हुई थी। तब समाज सुधारक महात्मा ज्योतिराव फुले ने सभी के लिए निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा, साथ ही अंग्रेज सरकार की नौकरियों में आनुपातिक आरक्षण की मांग की थी। 1908 में अंग्रेजों ने पहली बार आरक्षण लागू करते हुए प्रशासन में हिस्सेदारी निभाने वाली जातियों और समुदायों की हिस्सेदारी तय की।

राजनीतिक दलों को यह भी विचार करना चाहिए कि 1949 में  आरक्षण के मुद्दे पर बनी कमेटी भी इस व्यवस्था के खिलाफ थी। कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर जब दिसंबर 1949 में धारा 292 और 294 के तहत मतदान कराया गया तो उस वक्त सात में से पांच वोट आरक्षण के खिलाफ पड़े थे। दरअसल इन्होंने आरक्षण के दूरगामी नतीजों और भविष्य की राजनीतिक चालबाजियों की गंध सूंघ ली थी।  डॉ. भीमराव आंबेडकर ने खुद संविधान में अगर आरक्षण की स्थायी व्यवस्था नहीं की थी तो इस देश के राजनीतिक दल आरक्षण की सीमा और दायरा बढ़ाने पर क्यों तुले हैं। क्या सभी जातीय आरक्षण व्यवस्था खत्म कर सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक प्रवेश के मामले में महिलाओं और पुरुषों को चाहे वे जिस किसी भी जाति और धर्म के हों,50-50 प्रतिशत आरक्षण दिया जा सकता है। जातीय आरक्षण से तस्वीर बदले या न बदले लेकिन महिलाओं और पुरुषों को समान आरक्षण देने से इस देश का कायाकल्प जरूर हो जाएगा।क्या इस देश की संसद इसके लिए तैयार है?

Tags: loksabha newsMonsoon SessionNational newsOBC reservationRajhyasabha newsreservation
Previous Post

केन्द्रीय मंत्री व सचिवों से CM योगी नाराज, जानें पूरा मामला

Next Post

किन्नौर में भीषण भूस्खलन, यात्रियों से भरी बस मलबे में दबी

Writer D

Writer D

Related Posts

Former CM Koshyari released Prof. Sudhir Singh's book
राजनीति

संविधान हत्या दिवस: उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री कोश्यारी ने डीयू के प्रो. सुधीर सिंह की पुस्तक का किया लोकार्पण

26/06/2026
LPG gas cylinder
Main Slider

आम आदमी को बड़ी रहत, LPG सप्लाई पर सभी प्रतिबंध खत्म

26/06/2026
Shivraj Singh Chouhan reached Uttarakhand
राजनीति

शिवराज सिंह चौहान पहुंचे उत्तराखंड, सीएम धामी ने किया स्वागत

26/06/2026
hair
फैशन/शैली

लंबे बालों के लिए अप्लाई करें ये जेल, आजमाते ही दिखेगा असर

26/06/2026
Prickly Heat
फैशन/शैली

गर्मियों में घमौरियां से हैं परेशान, छुटकारा दिलाएंगे ये उपाय

26/06/2026
Next Post
Kinnaur accident

किन्नौर में भीषण भूस्खलन, यात्रियों से भरी बस मलबे में दबी

यह भी पढ़ें

उरी में संघर्ष विराम का उल्लंघन

पाक की नापाक हरकतें, उरी में फिर किया संघर्ष विराम का उल्लंघन

09/10/2020

अमरनाथ यात्रा 56 दिन की होगी, जानें कब शुरू हो रही है यात्रा?

13/03/2021
wearing this Magnet Card

क्या इस मैग्नेट कार्ड को पहनने से खत्म हो जाएगा कोरोना? जानिए सच

19/08/2020
Facebook Twitter Youtube

© 2022 24घंटेऑनलाइन

  • होम
  • राष्ट्रीय
    • उत्तराखंड
    • उत्तर प्रदेश
    • पंजाब
    • हरियाणा
    • छत्तीसगढ़
    • राजस्थान
    • हिमाचल प्रदेश
  • राजनीति
  • अंतर्राष्ट्रीय
  • क्राइम
  • मनोरंजन
  • शिक्षा
  • स्वास्थ्य
  • धर्म

© 2022 24घंटेऑनलाइन

Go to mobile version