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… तो 300 साल पहले ही सुलझ जाता अयोध्या विवाद

लखनऊ। 491 साल पुराने राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक लिहाज से अति संवेदनशील अयोध्या विवाद पर सर्वोच्च न्यायालय का ऐतिहासिक फैसला आ गया है और इसे लेकर देश भर से सकारात्मक प्रतिक्रया भी आ रही है लेकिन बहुत कम लोगों को पता है कि आज से 300 साल पहले ही इस विवाद के समाधान की कोशिश की गई थी और मुगल इस पर सहमत भी हो गए थे और इसके लिए उन्होंने हिंदू राजा जय सिंह द्वितीय को जमीन भी दे दी थी।

1717 में राम मंदिर निर्माण के लिए मिली थी मुगलों से जमीन

यह वह समय था जब औरंगजेब की मौत के बाद मुगल कमजोर हो रहे थे और अपनी सत्ता बचाने के लिए राजपूत राजाओं की मदद पर आश्रित थे। अगर अचानक मुगलकाल का काला अध्याय आरंभ न हुआ होता तो अयोध्या के रामजन्मभूमि- बाबरी मस्जिद विवाद उसी समय हो जाता। अगर 1717 में इस मामले का हल निकल गया होता तो भारत को यह समस्या विरासत के तौर पर नहीं मिलती। भारत के सामाजिक ताने-बाने का इतना नुकसान न होता।

मुगलों और राजपूत राजाओं के बीच अयोध्या में भव्य राम मंदिर बनाने के जो समझौते हुए थे, उनके ढेर सारे सबूत आज भी जयपुर राजघराने के कपड़ म्यूजियम में रखे हुए हैं। इनमें अयोध्या के राम मंदिर के 8 नक्शे भी शामिल हैं। इनमें राम मंदिर की जगह दर्शायी गयी और दिखाया गया है कि मंदिर कैसा बनेगा। नक्शे में एक चबूतरा भी बना हुआ है।

गौरतलब है कि उस वक्त भारत में सबसे बड़े हिंदू राजा जयपुर रियासत के सवाई जयसिंह द्वितीय थे। औरंगजेब ने जयपुर रियासत के महाराजा और उनके पिता बिशन सिंह को अफगानिस्तान संभालने के लिए भेज दिया, जहां पर ठंड से उनकी मौत हो गई और महज 7 साल की उम्र में जयसिंह द्वितीय को जयपुर की गद्दी संभालनी पड़ी।

जयपुर के राजा सवाई जयसिंह द्वितीय के साथ बहादुर शाह प्रथम का व्यवहार ठीक नहीं था। ऐसे में जय सिंह ने दिल्ली की सत्ता की असली चाबी संभाल रहे सैयद बंधुओं से अपनी नजदीकी बढ़ाई और फिर मुगल शासक बहादुर शाह प्रथम का दिल जीता।

जाटों और मराठों से बचाने के एवज में मुगलों ने दिया था इनाम

जहांदार शाह के दिल्ली की गद्दी पर बैठने तक जयसिंह की हैसियत काफी मजबूत हो गयी थी मगर जयसिंह सबसे ज्यादा तब मजबूत हुए जब सैयद बंधुओं ने दिल्ली के मुगल शासक जहांदार शाह को कैद कर फार्रूखसियार को दिल्ली के तख्त पर बैठाया। सवाई जयसिंह ने 1714 से लेकर 1717 तक मराठों के मालवा को मुगलों के अधीन शांति से रखा और मराठों को बाहर भगा दिया। 1716 में मुगलों को जब जाटों से चुनौती मिलना शुरू हुई तो उन्होंने पैसे लेकर भरतपुर के जाट राजा चुरहट को हराकर थूण का किला मुगलों को सौंपा। आगरा से जाटों को खदेड़ा ।

जयपुर राजघराने के अंदर रखे दस्तावेज बताते हैं कि मालवा को जीतने के बाद 1717 में मुगल शासक फार्रूखसियार के शासन के दौरान जयपुर के राजा जयसिंह द्वितीय को अयोध्या में राम मंदिर बनाने के लिए जमीन दी थी। यानी 1716 में मुगलों को जाटों से बचाने और 1717 में मराठों से बचाने की कीमत जय सिंह ने मुगलों से अयोध्या में राम मंदिर के लिए जमीन के रूप में वसूली थी। तब मुगल शासक के कहने पर अवध के नवाब ने अयोध्या में भव्य राम मंदिर बनाने के लिए जयसिंह पुरा बसाने के लिए जमीन का एक हिस्सा जय सिंह को देने के निर्देश दिए थे।

जयपुर के सिटी पैलेस में एक चकनामा रखा हुआ है। यह एक जून 1717 को लिखा गया है जिसमें 938 स्क्वायर यार्ड जमीन को महाराजा सवाई जयसिंह को अयोध्या में हवेली, कटला और पुरा बनाने के लिए दिया गया था। इसमें यह भी लिखा हुआ है कि इस जमीन को नायब नाजिम सुबह अवध कल्याण राय ने चौधरियों, कानूनगो और जमींदारों के साथ मिलकर नापा है।

एक तरह से यह जमीन का टुकड़ा मुगल शासन के तरफ से इनाम में दिया गया था, जहां पर मौजूद दस्तावेज के अनुसार 1717 से लेकर 1725 तक निर्माण होना था। सिटी पैलेस के म्यूजियम में राजा सवाई जयसिंह द्वितीय के एक गुमास्ता त्रिलोकचंद का लिखा पत्र भी मौजूद है। 1723 में लिखे पत्र में त्रिलोकचंद ने जयपुर राजदरबार को लिखा है कि आपकी वजह से हमें अयोध्या के सरयू तट पर अब स्नान करने में कोई दिक्कत नहीं होती है।

फार्रूक सियार मारा न गया होता तो कुछ और होती मामले की तस्वीर

1719 में सैयद बंधुओं को दिल्ली के मुगल शासक फार्रूखसियार पर गद्दारी का शक हुआ और सैयद बंधुओं ने उसे गिरफ्तार कर दिल्ली के लालकिला में मौत के घाट उतार दिया। 1719 में फार्रूक सियार की मौत के बाद रफीउद्दीन दरजात दिल्ली की गद्दी पर बैठा। 4 महीने के बाद उसकी भी मौत हो गयी। फिर रफीउद्दीन दौला दिल्ली की सल्तनत पर बैठा मगर उसकी भी 5 महीने बाद मौत हो गयीऔर तब मोहम्मद शाह दिल्ली के सल्तनत पर काबिज हुए।

यह सारे मुगल शासक सैयद बंधुओं ने ही बनाए थे मगर मोहम्मद शाह समझ गया था कि अगर दिल्ली की सल्तनत पर लंबे समय तक राज करना है तो सैयद बंधुओं को ठिकाने लगाना होगा । सैयद बंधुओं को 1722 में मार दिया गया। सैयद बंधुओं के खास रहे जय सिंह उनके मरने के बाद 1723 से 1727 तक मुहम्मद शाह की नजरों में अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा हासिल करने में लगे रहे और अयोध्या में राममंदिर निर्माण का मामला दिल्ली दरबार ने ठंडे बस्ते में डाल दिया और इस दौरान 1723 में राजा जयसिंह द्वितीय अपनी राजधानी आमेर से हटाकर नया शहर जयपुर बसाने में लग गए।

हालांकि कुछ इतिहासकारों का कहना है कि सवाई जय सिंह ने अयोध्या में कुछ निर्माण करवाए थे। 25 सितंबर 1976 को अवध के नवाब ने भवानी सिंह को जमीन पर कब्जे के परवाना सौंपने का दस्तावेज भी यहां मौजूद है। 27 जून 1985 का अवध के नवाब वजीर आसिफउद्दौला का जयपुर के राजा पृथ्वी सिंह के नाम भी लिखा हुआ दूसरा परवाना भी जयपुर राजघराने के पास मौजूद है। 24 अप्रैल 1799 को सदाअल अली खान का लिखा हुआ एक तीसरा परनामा है जिसमें लिखा हुआ है कि अयोध्या के जयसिंह पुरा में राम मंदिर के लिए जमीन सुरक्षित है। इस पर काजी सैयद नबी बख्श की सील लगी हुई है।

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