Ayodhya Verdict: इलाहाबाद उच्च न्यायालय का फैसला नहीं था ‘कानूनी रूप से टिकाऊ’- सुप्रीम कोर्ट

अयोध्या
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उत्तर प्रदेश। जैसा कि अयोध्या में दशकों से चल रहे विवाद का ऐतिहासिक फैसला उच्चतम न्यायालय ने कल शनिवार को कर दिया। अयोध्या मामले की कानूनी लड़ाई पर पर्दा गिराते इस ऐतिहासिक फैसले के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने बहुत सारी बाते भी कहीं हैं। सुप्रीम कोर्ट ने में ऐतिहासिक फैसले के दौरान यह कहा कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय के 2010 का फैसला ‘कानूनी रूप से टिकाऊ’ नहीं था।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 2010 में विवादित 2.77 एकड़ जमीन को सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा और रामलला के बीच तीन हिस्सों में बांट दिया था। शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि जमीन के बंटवारे से किसी का हित नहीं सधेगा और ना ही स्थाई शांति और स्थिरता आएगी।

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उच्च न्यायालय ने फैसले में चुना ऐसा रास्ता

सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने कहा कि 30 सितंबर, 2010 के अपने फैसले में उच्च न्यायालय ने ऐसा रास्ता चुना जो खुला हुआ नहीं था। और ऐसी राहत दी जिसकी मांग उनके समक्ष दायर मुकदमों में नहीं की गई थी।

हाईकोर्ट का फैसला नहीं था सही

सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के अन्य सदस्यों में न्यायमूर्ति एस ए बोबडे, न्यायमूर्ति धनन्जय वाई. चन्द्रचूड, न्यायमूर्ति अशोक भूषण और न्यायमूर्ति एस अब्दुल नजीर शामिल हैं।

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पीठ ने कहा, हम पहले ही इस नतीजे पर पहुंच चुके थे कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा विवादित जमीन को तीन हिस्सों में बांटा जाना कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं था। यहां तक कि शांति और स्थिरता बनाए रखने के लिहाज से भी वह सही नहीं था।

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