Ayodhya Verdict: ऐतिहासिक फैसले को रामलला के पक्ष में देने का बूटा सिंह ने दिया सुझाव, कोर्ट पहुंचे रामलला

अयोध्या
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नई दिल्ली। जैसा आप सब जानते होंगे की अयोध्या में मंदिर और बाबरी मस्जिद को लेकर दशकों से विवाद चल रहा था। लेकिन अब इस विवादित जमीन का मामला ख़त्म हो चुका हैं। क्यूंकि 9 नवम्बर यानि बीते शनिवार को सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में अपना फैसला सुना दिया हैं। यह एक ऐतिहासिक फैसला था। बता दें कि इस फैसले में सुझाव किसी भाजपा या विश्व हिंदू परिषद के नेता का नहीं था। यह फैसले का सुझाव तत्कालीन गृहमंत्री बूटा सिंह ने दिया है।

बताया जा रहा है कि 1989 से पहले बाबरी मस्जिद और राम जन्मभूमि को लेकर तीन मामले अदालत के सामने आये थे। 1951 में गोपाल सिंह विशारद ने याचिका दायर किया और रामलला की पूजा करने का अधिकार मांगा था। जबकि 1959 में निर्मोही अखाड़ा ने मंदिर के प्रबंधन के अधिकार उन्हें दिए जाने की मांग की थी। देखा जाए तो दोनों में से किसी ने जन्मभूमि पर अधिकार की बात नहीं की थी। 1961 में सुन्नी वक्फ बोर्ड की याचिका में मस्जिद की भूमि के स्वामित्व की मांग भी की गई है।

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1988-89 में जब राम जन्मभूमि आंदोलन अपने चरम सीमा पर था, उस दौरान तुरंत ही गृहमंत्री बूटा सिंह ने विहिप नेताओं को समझाया कि आंदोलन से मंदिर नहीं बन पाएगा। तो संसद द्वारा कानून बनाना चाहिए। अदालत से मुकदमा जीतने से उनका कहना है अदालत में किसी ने भी मंदिर की भूमि के स्वामित्व की मांग नहीं की है, इसलिए अदालत से जब भी फैसला होगा, वह सुन्नी वक्फ बोर्ड के हक में ही होगा।

सिविल मामलों के विशेषज्ञ से मिलने की दी सलाह

विहिप के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष चंपत राय के मुताबिक बूटा सिंह ने ही पटना में सिविल मामलों के विशेषज्ञ पूर्व वकील जनरल लाल नारायण सिन्हा से मिलने की सलाह दी। सिन्हा ने ही उन्हें रामलला विराजमान की ओर से याचिका दायर करने की सलाह दी। जस्टिस देवकीनंदन अग्रवाल ने इसके बाद 1989 में रामलला विराजमान और जन्म स्थान के बतौर विधिक अभिभावक इलाहाबाद हाईकोर्ट में एक याचिका दायर कर राम जन्म भूमि पर स्वामित्व उन्हें सौंपे जाने की मांग की।

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अस्थायी मंदिर बनाने का दिया अवसर

वि्व हिंदू परिषद ने पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव को भी धन्यवाद दिया। चंपत राय का कहना था कि छह दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद ध्वंस के बाद अगले ढाई दिनों तक उन्होंने राम जन्मभूमि स्थल पर सुरक्षा बल न भेजकर अस्थायी मंदिर बनाने का अवसर दिया। जबकि कुछ समय पहले प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगाया जा चुका था।

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