धर्म

भोलेनाथ सुनेंगे हर भक्त की पुकार

सत्य ही शिव हैं और शिव ही सुंदर है। तभी तो भगवान आशुतोष को सत्यम शिवम सुंदर कहा जाता है। उनकी महिमा अपरंपार है, जो एक लोटा जल में ही प्रसन्न हो जाते हैं। हर महीने की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मास शिवरात्रि कहा जाता है। इन शिवरात्रियों में सबसे प्रमुख है फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी, जिसे महाशिवरात्रि के नाम से जाना जाता है। महाशिवरात्रि पर्व की विशेषता है कि सनातन धर्म के सभी प्रेमी इस त्योहार को मनाते हैं। महाशिवरात्रि के दिन भक्त जप, तप और व्रत रखते हैं। इस दिन भगवान के शिवलिंग रूप के दर्शन करते हैं। इस पवित्र दिन पर देश के हर हिस्सों में शिवालयों में बेलपत्र, धतूरा, दूध, दही, शर्करा आदि से शिव जी का अभिषेक किया जाता है।
देश भर में महाशिवरात्रि को एक महोत्सव के रुप में मनाया जाता है क्योंकि इस दिन देवों के देव महादेव का विवाह हुआ था। इसलिए यह शिवरात्रि वर्ष भर की शिवरात्रि से उत्तम है। शिवरात्रि शिव और शक्ति के अभिसरण का विशेष पर्व है। इस त्योहार में श्रद्धालु पूरी रात जागकर भगवान शिव की आराधना में भजन गाते हैं। कुछ लोग पूरे दिन और रात उपवास भी करते हैं। शिव लिंग को पानी और बेलपत्र चढ़ाने के बाद ही वे अपना उपवास तोड़ते हैं। कहते हैं महाशिवरात्रि का व्रत शिव की कृपा प्राप्त करने का सबसे सुगम साधन है। शिव को प्रसन्न कर कोई भी व्यक्ति कठिन समय तथा संकटों से उबरकर सभी प्रकार के पारिवारिक एवं सांसारिक सुख आदि प्राप्त कर सकता है।
भारत ही नहीं विश्व के अन्य अनेक देशों में भी प्राचीन काल से शिव की पूजा होती रही है। इसके अनेक प्रमाण समय समय पर प्राप्त हुए हैं। हड़प्पा और मोहनजोदड़ो की खुदाई में भी ऐसे अवशेष प्राप्त हुए हैं जो शिव पूजा के प्रमाण प्रस्तुत करते हैं। हमारे समस्त प्राचीन धार्मिक ग्रंथों में भी शिव जी की पूजा की विधियां विस्तार से उल्लिखित हैं। ईशान संहिता के अनुसार महाशिवरात्रि को ही ज्योतिर्लिंग का प्रादुर्भाव हुआ। शिव पुराण में ब्रह्मा जी ने कहा है कि संपूर्ण जगत के स्वामी सर्वज्ञ महेश्वर के कान से गुण श्रवण, वाणी से कीर्तन, मन से मनन करना महान साधना माना गया है। इसी लिए महाशिवरात्रि के दिन उपवास, ध्यान, जप, स्नान, दान, कथा श्रवण, प्रसाद एवं अन्य धार्मिक कृत्य करना महाफलदायक होता है।
महाशिवरात्रि पर्व, भगवान शिव-पार्वती के विवाह के उपलक्ष्य में मनाया जाने वाला महापर्व है। पौराणिक काल में हुई शिव-पार्वती की शादी देवताओं के लिए यादगार मानी जाती है। क्योंकि यह शादी काफी भव्य, रोमांचक और हैरान कर देने वाली थी। वह इसलिए कि भोलेनाथ की बारात में कई तरह के लोग हिमालय के यहां पहुंचे थे। पार्वती की मां, मैना शिव बारात को देख हैरान हो गई थीं। माता पार्वती के पिता हिमालय पर्वतराज थे।
उन्होंने अपनी पुत्री के विवाह में कई सारे उच्च कुलों के राजा-महाराजा और शाही रिश्तेदारों को शिव विवाह में आमंत्रित किया था। लेकिन, आलम यह था कि भगवान शिव के परिवार की ओर से कोई रिश्तेदार नहीं था, क्योंकि वे किसी भी परिवार से ताल्लुक नहीं रखते हैं। महाशिवरात्रि व्रत प्राप्त काल से चतुर्दशी तिथि रहते रात्रि पर्यन्त करना चाहिए। रात्रि के चारों प्रहरों में भगवान शंकर की पूजा-अर्चना करने से जागरण, पूजा और उपवास तीनों पुण्य कर्मों का एक साथ पालन हो जाता है, साथ ही भगवान शिव की विशेष अनुकम्पा और मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है।
शास्त्रों के अनुसार, शुद्धि एवं मुक्ति के लिए रात्रि के निशीथ काल में की गई साधना सवाज़्धिक फलदायक होती है। अत: इस दिन रात्रि जागरण करके निशीथ काल में भगवान शिव कि साधना एवं पूजा करने का अत्यधिक महत्व है। इसी दिन महादेव ने कालकूट नाम का विष पान कर अपने कंठ में रख लिया था। कहा जाता है कि यह विष सागर मंथन में निकला था। शिवरात्रि के ही दिन बहुत समय पहले एक शिकारी को दर्शन देकर उसे पापों से मुक्त किया था। भगवान शिव सब देवों में वृहद हैं, सर्वत्र समरूप में स्थित एवं व्यापक हैं। इस कारण वे ही सबकी आत्मा हैं। भगवान शिव निष्काल एवं निराकार हैं।
भगवान शिव साक्षात ब्रह्म का प्रतीक है तथा शिवलिंग भगवान शंकर के ब्रह्म तत्व का बोध करता है। इसलिए भगवान शिव की पूजा में निष्काल लिंग का प्रयोग किया जाता है। सारा चराचर जगत बिन्दु नाद स्वरूप है। बिन्दु देव है एवं नाद शिव इन दोनों का संयुक्त रूप ही शिवलिंग है। बिन्दु रूपी उमा देवी माता है तथा नाद स्वरूप भगवान शिव पिता हैं। जो इनकी पूजा सेवा करता है उस पुत्र पर इन दोनों माता-पिता की अधिकाधिक कृपा बढ़ती रहती है। वह पूजक पर कृपा करके उसे अतिरिक्त ऐश्वर्य प्रदान करते हैं। आंतरिक आनंद की प्राप्ति के लिए शिवलिंग को माता-पिता के स्वरूप मानकर उसकी सदैव पूजा करनी चाहिए। भगवान शिव प्रत्येक मनुष्य के अंत:करण में स्थित अव्यक्त आंतरिक अधिष्ठान तथा प्रकृति मनुष्य की सुव्यक्त आंतरिक अधिष्ठान है।
कभी करते हैं विनाश तो कभी कृपा 
पौराणिक धर्म ग्रंथों के अनुसार भगवान भोलेनाथ ने 19 अवतार लिए हैं। यह अवतार उन्होंने तब लिए, जब धरती या देवताओं पर संकट आया। इन अवतारों में उन्होंने कई मायावी लीलाएं कीं। जो वैदिक ग्रंथो में विशेषतौर पर शिवमहापुराण में विस्तार से उल्लेखित हैं।
वीरभद्र अवतार: शिव का यह अवतार माता सती के देह त्याग करने के बाद लिया था। वह काफी दुखी और क्रोधित थे। और उन्होंने सती के पिता दक्ष का सिर शरीर से अलग कर दिया था।
भैरव अवतार: शिव महापुराण में वर्णित है कि भगवान शंकर ने कालभैरव के अवतार में अपनी अंगुली के नाखून से ब्रह्मा जी के पांचवें सिर को काट दिया था। ब्रह्मा का पांचवां सिर काटने के कारण भैरव को ब्रह्महत्या का दोष लगा। काशी में भैरव को ब्रह्महत्या के पाप से मुक्ति मिली थी। यही कारण है कि शास्त्रों में काशीवासियों के लिए भैरव की भक्ति अनिवार्य बताई गई है।
हनुमान: भगवान शिव का हनुमान अवतार सभी अवतारों में श्रेष्ठ माना गया है। इस अवतार में भगवान शंकर ने एक वानर का रूप लिया था। इस रुप में शिव यानी हनुमानजी भगवान श्रीराम के अनन्य भक्त हैं।
वृषभ अवतार: इस अवतार में शिव ने विष्णु पुत्रों का संहार किया था।
पिप्पलाद अवतार: शनि पीड़ा का निवारण पिप्पलाद की कृपा से ही संभव हो सका। शिव महापुराण के अनुसार एक बार पिप्पलाद ने देवताओं से पूछा, क्या कारण है कि मेरे पिता दधीचि जन्म से पूर्व ही मुझे छोड़कर चले गए। देवताओं ने बताया शनिग्रह की दृष्टि के कारण ही ऐसा कुयोग बना। पिप्पलाद यह सुनकर बड़े क्रोधित हुए। उन्होंने शनि को नक्षत्र मंडल से गिरने का श्राप दे दिया। श्राप के प्रभाव से शनि उसी समय आकाश से गिरने लगे। देवताओं की प्रार्थना पर पिप्पलाद ने शनि को इस बात पर क्षमा किया कि शनि जन्म से लेकर 16 साल तक की आयु तक किसी को कष्ट नहीं देंगे। तभी से पिप्पलाद का स्मरण करने मात्र से शनि की पीड़ा दूर हो जाती है। इस अवतार के बारे में स्वयं ब्रह्माजी ने बताया था कि पिप्लाद भगवान शिव के ही अवतार हैं।
शिव शक्ति की साधना ही है शिवरात्रि
जब भीष्म शरशैरया पर सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा कर रहे थे तो पांडवों ने उनसे शिव महिमा के विषय में जानने की जिज्ञासा की तो उन्होंने उत्तर दिया कि कोई भी देहधारी मानव शिव महिमा बताने में सर्वथा असमर्थ है। भारतीय मनीषियों के अनुसार शिव अव्यक्त हैं और जो कुछ व्यक्त है, वह उसी की शक्ति है, वही उसका व्यक्त रूप है। शिव ही निराकार ब्रह्म हैं। मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार, पांचों ज्ञानेंद्रियों और पांचों कर्मेंद्रियों पर विजय प्राप्त कर शिव शक्ति की साधना करना ही शिवरात्रि व्रत करना है। शिवरात्रि के जागरण के संदर्भ में वही भावना है जो गीता में जागरण के विषय में व्यक्त की गई है।
सामान्य प्राणियों की रात्रि में जोगी जागता है और उनके दिन में जोगी सोता है। इस प्रकार जो पाशबद्ध है उसे मनीषियों ने पशु कहा है। अपने परम स्वरूप शिव के अधिक से अधिक निकट पहुंचना ही पशुपति शिव की उपासना का लक्ष्य है। यही जागरण का महत्व है। रात्रि में जागृत जीवन का कोलाहल नहीं रहता। प्रकृति शांत रहती है। यह अवस्था साधना, मनन और चिंतन के लिए अधिक अनुकूल होती है। उपवास का भी एक अर्थ है किसी के समीप रहना।
वराह उपनिषद के अनुसार उपवास का अर्थ है जीवात्मा का परमात्मा के समीप रहना। महाशिवरात्रि पर जागरण और उपवास का यही लक्ष्य है। शिवलिंग पूजा यानी समस्त विकारों और वासनाओं से रहित रह कर मन को निर्मल बनाना। वायु पुराण के अनुसार प्रलयकाल में समस्त सृष्टि जिसमें लीन हो जाती है और पुन: सृष्टिकाल में जिससे प्रकट होती है, उसे लिंग कहते हैं। इस प्रकार विश्व की संपूर्ण ऊर्जा ही लिंग की प्रतीक है।
शिव पुराण में भगवान स्वयं कहते हैं, प्रलय काल आने पर जब चराचर जगत नष्ट हो जाता है और समस्त प्रपंच प्रकृति में विलीन हो जाता है, तब मैं अकेला ही स्थित रहता हूं। दूसरा कोई नहीं रहता। सभी देवता और शास्त्र पंचाक्षर मंत्र में स्थित होते हैं। अत: मेरे से पालित होने के कारण वे नष्ट नहीं होते। तदनंतर मुझसे प्रकृति और पुरुष के भेद से युक्त सृष्टि होती है, वस्तुत: यह संपूर्ण सृष्टि बिंदुनाद स्वरूप है।
बिंदु शक्ति है और नाद शिव। इस तरह यह विश्व शक्ति स्वरूप ही है। शिव तनिक-सी सेवा से ही प्रसन्न होकर बड़े से बड़े पापियों का उद्धार करने वाले महादेव हैं। कभी केवल जल चढ़ा देने मात्र से प्रसन्न हो जाते हैं तो कभी बेल पत्र से ही। भले ही पूजा अनजाने में ही हो गई हो वह व्यर्थ नहीं जाती। किसी भी जाति अथवा वर्ण का व्यक्ति उनका भक्त हो सकता है। देव, गंधर्व, राक्षस, किन्नर, नाग, मानव सभी तो उनके आराधक है। हिंदू-अहिंदू में महादेव कोई भेद भाव नहीं करते।
शिवलिंग पर तीन पत्ती वाले बेलपत्र और बूंद-बूंद जल का चढ़ाया जाना भी प्रतीकात्मक है। सत, रज और तम तीनों गुणों के रूप में शिव को अर्पित करना उनकी अर्चना है। बूंद-बूंद जल जीवन के एक-एक कण का प्रतीक है। इसका अभिप्राय है कि जीवन का क्षण-क्षण शिव की उपासना को समर्पित होना चाहिए।
अनंत के साथ एकाकार होना ही शिवयोग
शिव योग का गहरा अर्थ है। शिव का मतलब केवल भगवान शिव नहीं हैं, बल्कि शिव नाम किसी नाम या रूप की सीमाओं से मुक्त है। शिव का अर्थ है अनंत, जिसे ईश्वर, सर्वशक्तिमान, सार्वभौम चेतना आदि के नाम से भी जाना जाता है। योग का अर्थ है एकीकृत होना या विलीन करना। इस तरह शिव योग का अर्थ हुआ अनंत के साथ एकाकार होना या ईश्वर के साथ एकीकृत हो जाना। लेकिन अनंत क्या है, क्या है एकीकृत होना? बाबा जी कहते हैं, यह कहना गलत होगा कि ईश्वर की अनुभूति केवल आत्मदमन से ही संभव है। निश्चित ही यह भी रास्ता है, लेकिन दूसरे रास्ते भी हैं, जिसे विलक्षण संतों ने समझा और जो आज के युग में सर्वाधिक उपयुक्त है। यह रास्ता है दुनियावी कर्तव्यों आंतरिक दायित्वों के बीच खुद में संतुलन बनाने का। किसी भी एक की सिद्धि दूसरे की कीमत पर नहीं की जा सकती।
व्यवहार का यह विकास खुद भगवान शिव में दिखता है, जो कम प्रयास से अधिक लाभ सुनिश्चित करता है। गृहस्थ के पास अपने आध्यात्मिक विकास को मापने का बेहतर यंत्र होता है। पहाड़ों पर अकेले रहकर कोई भी कह सकता है कि उसने ईष्र्या-द्वेष पर विजय पा ली। इसकी सही पहचान तभी होती है, जब विभिन्न तरह की स्थितियों में इसे मापा जाए। शिव योग स्वयं को जगाना सिखाता है, जो निश्चित रूप से अकेलापन नहीं है। शिव योग यह समझना है कि धैर्य की अनंत ऊर्जा कहीं बाहर नहीं, बल्कि हमारे भीतर है।
योग से होता है शिव का साक्षात्कार 
योग परंपरा में शिव की पूजा ईश्वर के रूप में नहीं की जाती बल्कि उन्हें आदि गुरु माना जाता है। वे प्रथम गुरु हैं जिनसे ज्ञान की उत्पति हुई थी। कई हजार वर्षों तक ध्यान में रहने के पश्चात एक दिन वे पूर्णत: शांत हो गए। वह दिन महाशिवरात्रि का है। उनके अन्दर कोई गति नहीं रह गई और वे पूर्णत: निश्चल हो गए। इसलिए तपस्वी महाशिवरात्रि को निश्चलता के दिन के रूप में मनाते हैं। पौराणिक कथाओं के अलावा योग परंपरा में इस दिन और इस रात को बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि महाशिवरात्रि एक तपस्वी व जिज्ञासु के समक्ष कई संभावनाएं प्रस्तुत करती है।
आधुनिक विज्ञान कई अवस्थाओं से गुजरने के बाद आज एक ऐसे बिन्दु पर पहुंचा है जहां वे यह सिद्ध कर रहे हैं कि हर चीज जिसे आप जीवन के रूप में जानते हैं, वह सिर्फ ऊर्जा है, जो स्वयं को लाखों करोड़ों रूप में व्यक्त करती है। योगी यानी जो अस्तित्व की एकरूपता को जान चुका है। असीम, अस्तीत्व व एकरुपता को जानने की सभी चेष्टाएं चेष्टाएं योग हैं। महाशिवरात्रि की रात हमें इसे अनुभव करने का एक अवसर प्रदान करती है।
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