अपने राजनैतिक अंत की ओर बढ़ रही बसपा सुप्रीमो मायावती

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उपेन्द्र प्रसाद

उत्तर प्रदेश में कांग्रेस सपा-बसपा गठबंधन का हिस्सा नहीं है, क्योंकि मायावती नहीं चाहती थीं कि कांग्रेस उनके गठबंधन के साथ आए। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव अपने साथ कांग्रेस को भी रखना चाहते थे और इसके लिए त्याग करने को भी तैयार थे। त्याग से उनका मतलब समाजवादी पार्टी का कम सीटों पर लडऩे से था। वैसे उन्होंने त्याग तो मायावती की बसपा के साथ गठबंधन करके भी किया। समाजवादी पार्टी बसपा से बड़ी पार्टी है। चुनाव में उसे बसपा से ज्यादा वोट भी मिले हैं और ज्यादा सीटें भी। लोकसभा चुनाव में बसपा का एक उम्मीदवार भी नहीं जीत पाया था, जबकि समाजवादी पार्टी के पांच उम्मीदवार जीत गए। उसके बाद दो उपचुनावों में भी सपा की जीत हुई। विधानसभा के आम चुनाव में बसपा के मात्र 19 विधायक विधानसभा मे आए, तो समाजवादी पार्टी 47 विधायक सदन के सदस्य बने। यानी समाजवादी पार्टी सभी मायनों में बसपा पर भारी है, लेकिन भाजपा को हराने की ललक में अखिलेश ने मायावती का जूनियर पार्टनर बनना मंजूर कर लिया। गठबंधन में बसपा को 38 सीटें दे दी गईं और समाजवादी पार्टी मात्र 37 सीटें पाकर ही संतुष्ट हो गई। 37 सीटों में भी 7 सीटें ऐसी हैं, जिन पर सपा की जीत की संभावना लगभग शून्य है।

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यानी अखिलेश ने न केवल मायावती को ज्यादा सीटें दीं, बल्कि सीटों की पसंद के मामले में भी पहला अधिकार बसपा सुप्रीमो को ही दे दिया। यह सब उन्होंने इसलिए किया, ताकि ज्यादा से ज्यादा भाजपा उम्मीदवारों को हराया जा सके और नरेन्द्र मोदी की सरकार बनने की संभावना को धूमिल की दी जाए। अपने इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए वे कांग्रेस को भी अपने साथ गठबंधन में लाना चाहते थे और देश की सबसे पुरानी पार्टी को सम्मानजनक सीटें देने के लिए कुछ और त्याग करना चाहते थे। लेकिन मायावती ने अखिलेश को त्याग का सुख नहीं लेने दिया। कांग्रेस उत्तर प्रदेश के उस गठबंधन से बाहर रह गई। प्रियंका के कांग्रेस की राजनीति में सक्रिय होने के बाद एक बार फिर कयास लगाए जाने लगे कि कांग्रेस को भी शामिल कर अखिलेश अपने गठबंधन को महागठबंधन बना सकते हैं। उधर महाराष्ट्र से खबर आने लगी कि वहां कांग्रेस और एनसीपी समाजवादी पार्टी को एक सीट और बसपा को दो सीटें दे सकती हैं। वह पहल कांग्रेस की ओर से था और उसके बाद इस अटकल को हवा मिली कि कांग्रेस को उत्तर प्रदेश के गठबंधन में भी जगह मिल सकती है। और इस तरह की अटकल के बीच ही मायावती ने बयान देकर यह स्पष्ट कर दिया कि उनकी पार्टी उत्तर प्रदेश में ही नहीं, बल्कि देश के किसी भी राज्य में कांग्रेस के साथ कोई गठबंधन नहीं करने जा रही है। सवाल उठता है कि मायावती कांग्रेस की इतनी विरोधी कैसे हो गईं। अभी हाल ही में उन्होंने समर्थन देकर कांग्रेस की मध्य प्रदेश सरकार के गठन में भूमिका अदा की थी।

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छत्तीसगढ़ और राजस्थान में कांग्रेस को उनके समर्थन की जरूरत नहीं थी, फिर भी उन्होंने बिना समर्थन मांगे ही उन दोनों राज्यों में भी सरकार गठन में कांग्रेस के समर्थन की घोषणा कर दी थी। मध्यप्रदेश में भी कांग्रेस द्वारा समर्थन मांगने के पहले ही मायावती ने समर्थन दे डाला था।  सबसे दिलचस्प बात तो यह है कि अभी भी मायावती की पार्टी का समर्थन उन तीनों राज्यों में कांग्रेस की सरकारों को प्राप्त है। इन तीनों हिन्दी राज्यों की बात तो अपनी जगह है, दक्षिण के कर्नाटक में भी जनता-दल(एस) और कांग्रेस की गठबंधन सरकार को बसपा का समर्थन हासिल है। वहां बसपा के एक विधायक हैं, जिन्हें मंत्री भी बनाया गया था। यूपीए की सरकार के कार्यकाल में भी मायावती ने उसका समर्थन किया था। राज्य सभा के चुनावों के समय भी बसपा के सरप्लस विधायकों के वोट भी कांग्रेस उम्मीदवारों के पक्ष में ही पड़ते थे। एक बार उत्तराखंड में कांग्रेस की हरीश रावत सरकार के सामने बहुत बड़ा संकट खड़ा हुआ था। वह सरकार बर्खास्त भी कर दी गई थी, जो बाद में बहाल भी हो गई। उसकी बहाली में बसपा के विधायकों की बहुत बड़ी भूमिका थी और मायावती ने यह सुनिश्चित किया था कि उनके विधायक न तो भाजपा खेमे में जाय और न ही वोटिंग के दौरान अनुपस्थित रहकर हरीश रावत सरकार को गिराने का काम करे। यानी कांग्रेस के साथ मायावती के जुडऩे के अनेक उदाहरण मिल जाएंगे, लेकिन अब वह कह रही हैं कि कांग्रेस के साथ कहीं भी उन्हें गठबंधन नहीं करना है। आखिर इसका क्या कारण हो सकता हैं? तो इसका एकमात्र कारण यही है कि मायावती अपने राजनैतिक अंत की ओर बढ़ रही है। उनका जनाधार लगातार क्षीण होता जा रहा है। कांशीराम ने देश की आबादी के 85 फीसदी को बहुजन शब्द के द्वारा एक करने की कोशिश की थी। बहुजन समाज की उनकी कल्पना में दलित, आदिवासी, ओबीसी और धार्मिक अल्पसंख्यक शामिल थे और यह समाज देश की कुल आबादी का 85 फीसदी है, हालांकि इसे समाज कहना गलत है।

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85 फीसदी के नेता कांशीराम तो बन नहीं पाए, लेकिन उत्तर प्रदेश में दलितों के साथ साथ कमजोर ओबीसी जातियों को उन्होंने जरूर अपने साथ कर रखा था, लेकिन वे मायावती के अगड़ी जाति के लोगों को टिकट बेचने की प्रवृति के कारण अलग हो गए। आदिवासी तो कभी उनसे जुड़ा ही नहीं और ओबीसी के साथ छोडऩे के बाद बहुजन का मतलब दलित रह गया। पर मायावती सभी दलितों को भी अपने साथ नहीं रख पाईं और सिर्फ  अपनी जाति की नेता बनकर रह गईं। अपनी जाति के लोगों का राजनैतिकरण उन्होंने अगड़ी जातियों को गाली देकर किया था, लेकिन अब उनकी राजनीति दलित और ब्राह्मण गठजोड़ बनाने का है, जिससे उनकी अपनी जाति के लोग भी धीरे धीरे नाखुश हो रहे हैं। इसके कारण अपनी जाति पर भी उनकी पकड़ कमजोर हो रही है।ऐसे माहौल में यदि कांग्रेस का उभार हुआ, तो दलित मायावती को छोडक़र अपनी पुरानी पार्टी यानी कांग्रेस में एक बार फिर जा सकते हैं। मायावती इस खतरे को समझ रही है। यही कारण है कि चुनाव के स्तर पर वह कांग्रेस से बच रही है, क्योंकि एक बार उन्होंने गठबंधन बनाकर दलितों से कांग्रेस को वोट देने को कहा तो जो दलित आज उनके साथ हैं, वे हमेशा के लिए कांग्रेस के हो सकते हैं। और तब मायावती की राजनैतिक मौत हो जाएगी।

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