चुनाव आयोग को अपनी साख बचाने की चुनौती

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डॉ.सुमन गुप्ता

लोकसभा चुनाव के पहले चरण में जब सुप्रीम कोर्ट के निर्देश से निर्वाचन आयोग ने पूरे देश में वीवीपैट के साथ ईवीएम का इस्तेमाल कर रहा है फिर भी ईवीएम को लेकर शिकायतें दूर नहीं हो रही हैं। उत्तर प्रदेश में 2017 से ही ईवीएम केा लेकर हंगामा मचा हुआ है। ईवीएम ने मतदाताओं के दिल और दिमाग पर सन्देह पैदा कर दिया है। वे हमेशा सब कुछ करने के बाद भी एक बात जरूर कहते हैं कि यदि ईवीएम में गड़बड़ी नहीं की गयी तो …जो उन्होंने किया है वही रिजल्ट आयेगा। अब सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर मतदाताओं का भरोसा कायम रखने के लिए आयोग को वीवीपैट से निकली पर्चियों का प्रत्येक विधानसभा के पांच बूथों की पर्चियों का भी मिलान कराना होगा।

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अब तो सवाल आयोग की साख का है। पहले चरण के चुनाव में जिस प्रकार कई स्थानों पर मॉक पोल के दौरान ही मशीने खराब पायी गयीं जिन्हें आयोग ने बदल दिया।उन्हीं मशीनों में मॉक पोल के समय ही किसी दूसरी पाटी को दिया गया वोट दूसरी पार्टी के सामने जाता हुआ दिखा तो निश्चित रूप से यह सवाल उठना लाजिमी ही है कि आखिर यह सत्तारूढ़ दल को ही जाता हुआ क्यों दिखा। यदि मशीन खराब थी तो कमल के लिए ही क्यों?

वह कहीं और भी जा सकता था या वोट रजिस्टर ही नहीं हो सकता था। आखिर यह किसी तीसरी पार्टी या निर्दल को जाता क्यों नहीं दिखा। कांग्रेस और बसपा ने इस पर सवाल उठाया है। चुनाव आयोग चुनाव के लिए मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए विभिन्न प्रयत्न करता है उस पर अच्छा खासा बजट भी खर्च करता है। मतदाता सुविधाएं न होने के कारण वोट देने के लिए नहीं आता है ऐसा नहीं है मतदाता का पहला सवाल करता है कि ऐसा करने से उसे क्या फायदा? जहां सुविधाएं नहीं है वहां भी वोटर लाइनों में लगकर धूप में खड़े रखकर मतदान करता ही है। हमें यह जरूर सोचना होगा कि ग्राम पंचायतों के चुनाव में 100 प्रतिशत भी पोलिंग हो सकती है लोकसभा और विधानसभा में अस्सी फीसदी हो जाये तो बड़ी बात है क्योंकि जैसे-जैसे निर्वाचन क्षेत्र का विस्तार होता जाता है मतदाता का लगाव और महत्व कम होता जाता है।

चुनाव आयोग मतदाताओं को रिझाने के लिए तमाम सरकारी तौर प्रयत्न करता है लेकिन मतदाता हैं कि उस पर ध्यान नहीं देते हैं। चुनाव आयोग ने श्नोटाश् का प्रावधान तो कर दिया है लेकिन जब तक मतदान अनिवार्य न हो इस नोटा का प्रयोग लोकतंत्र को कमजोर करने के ही काम में आ रहा है। क्योंकि जिसे प्रत्याशी नहीं पसन्द है या उसकी अपनी पार्टी से नाराजगी है तो वह अपने घर भी बैठ सकता है, नोटा इसका हल नहीं हैं। जब तक मतदाताओं को अपना हित समझ में नहीं आता है वे मतदान के लिए प्रेरित नहीं हो पाते है। सरकारी आयोजन और कार्यक्रम महज रस्मी और मीडिया में छपने के लिए ही रहते हैं।

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क्या कारण है कि पढ़े-लिखे कथित सभ्य जागरूक समाज को ही निर्वाचन आयेाग ज्यादातर लुभाता है और उन्हीं का वोट प्रतिशत घट जाता है। मतदाता के लिए निर्वाचन आयोग पलक पांवड़े भी बिछा देगा तो वह नहीं आयेगा जब तक वह अपनी किसी प्रकार का हित न समझे। यही कारण है कि जहां जीत और हार में कांटे की टक्कर होती है वहां मतदान का प्रतिशत अधिक होता है और जहां हराने का कोई खतरा नहीं होता है वहां मतदान कम होता है। बड़े नेताओं की सीटों पर भी यही नजारा होता है। वे कहते हैं कि यदि वोट न भी डाला तो कौन हार जायेंगे? राजीव गांधी और अटल बिहारी वाजपेयी के निर्वाचन क्षेत्रों के उदाहरण देखे जा सकते हैं। इन नेताओं के समर्थकों और चहेते मतदाताओं की कोई कमी नहीं थी।निर्वाचन आयोग के सामने जब भी ईवीएम में गड़बड़ी छेड़छाड़ का सवाल उठता है आयोग अपने दावे के साथ यही कहता है कि ईवीएम में कोई छेड़छाड़ नहीं की जा सकती है। न ही इसे हैक किया जा सकता है, लेकिन फिर सभी मतदाता इस पर भरोसा पूरी तौर पर नहीं कर पा रहे हैं।

आयोग ने सभी पर्चियों के मिलान पर यह कहकर मना कर दिया था कि यदि ऐसा हुआ तो चुनाव परिणाम हफते भर में आयेंगे। अब सवाल यह है कि लोकतंत्र और उसकी प्रक्रियाओं को कैसे फूल पू्रफ  बनाया जाये। ईवीएम को लेकर जो तर्क दिये गये उनमें यह भी कहा गया कि यदि बैलेट पेपर होगा तो बूथकैप्चरिंग की सम्भावना बढ़ जाती है।

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भारतीय जनमानस ईवीएम पर सन्देह इसलिए व्यक्त कर रहा है क्योंकि जब भी सवाल उठता है तो बैलेट पेपर की लूट और बूथ कैप्चरिंग तो लोगों को दिखायी दे जाती है लेकिन साइलेंट तकनीक के जरिये सबकुछ बदल दिया जाये तो वह क्या कर सकता है? यही अविश्वास उसे पूरी तौर पर ईवीएम को स्वीकारने नहीं देता है। जिस प्रकार 2018 में गोरखपुर, फूलपुर के चुनाव परिणाम तथा कैराना की पोलिंग के समय कुछ खास क्षेत्रों में ही मशीनों की खराबी, प्रशासनिक मशीनरी, पुलिस फोर्स का उपयेाग किया गया। बताया गया कि मशीनों केा सुबह ही लू लग गयी। सम्भवतरू उपचुनाव में यह रिकार्ड रहा होगा कि 73 पोलिंग बूथों पर पुनर्मतदान कराये गये। वोटों की गणना सही न करने पर एक आईएएस अधिकारी तक हो आयोग को हटाना पड़ा।

यह सब चूक नहीं, जानबूझकर किये गये कार्य थे, जो जनता में यहीं सन्देश देते हैं कि आयोग कुछ भी कहें लेकिन सबकुछ ठीक है ऐसा नहीं है। देश की जनता सब कुछ जानती है वह थोड़ी देर चुप भले ही रहे उसकी समझ में सब कुछ आ जाता है कि ऐसा क्यों हो रहा है। नही ंतो पुलिस की मार खाकर भी कोई अपने मताधिकार का प्रयोग करने के लिए दोबारा क्यों आता? यह सब लोकतंत्र की प्रक्रिया और आयोग पर भी उठते सवालिया निशान हैं जिन पर आयोग को बिना किसी पूर्वाग्रह के भलीभांति विचार करना ही चाहिए।

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जिससे लोगों में चुनावी प्रक्रिया के प्रति भरोसा बना रहे। 2014 के लोकसभा चुनाव और 2017 में उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव के बाद जो परिणाम आये उससे लोगों में अविश्वास भी जन्मा और ईवीएम और आयोग की कार्यशैली को लेकर सवाल भी उठे। सवाल आयोग का नहीं उस लोकतंत्र और लोकतांत्रिक प्रक्रिया का है जिसका प्रावधान संविधान में किया गया और यह उम्मीद की गयी कि यह लोगों में लोकतंत्र के प्रति विश्वास को कायम रखेगा। यदि आयोग की साख ही चली गयी तो मतदाताओं के लिए पानी, छांव, व्यवस्थाओं और जलपान से लोकतंत्र की रक्षा नहीं हो सकेगी। सवाल यह नहीं है कि न्याय हुआ है बल्कि यह भी लगना चाहिए कि न्याय किया गया है।

 

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