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आइये जानें इस साल भारत में कब मनाई जाएगी ईद-उल-फितर?

लाइफस्टाइल डेस्क। रमज़ान का पाक महीना बस अलविदा कहने को तैयार है।  रमज़ान के ख़त्म होते ही जो ईद मनाई जाती है, उसे ईद-उल-फितर कहा जाता है। इस्लाम समुदाय में इस त्योहार को बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। मस्जिदों को सजाया जाता है, लोग नए कपड़े पहनते हैं, घरों में एक से बढ़कर एक पकवान बनते हैं, छोटों को ईदी दी जाती है और एक-दूसरे से गले लगकर ईद की मुबारकबाद दी जाती है।

हालांकि, इस साल लॉकडाउन के चलते, सभी लोग अपने-अपने घरों में ही ईद मनाएंगे।  इस्लामिक कैलेंडर के अनुसार, रमज़ान के बाद 10वें शव्वाल की पहली तारीख को ईद-उल-फितर का त्योहार मनाया जाता है। ईद कब मनाई जाएगी यह चांद के दीदार से तय होता है।

कब है ईद-उल-फितर?

ईद का त्योहार चांद को देखकर तय किया जाता है। ऐसी संभावना है कि चांद के दीदार के बाद ईद-उल-फितर का त्योहार 25 मई को मनाया जा सकता है। लेकिन अगर चांद 23 को दिख गया तो देशभर में 24 मई को भी ईद मनाई जा सकती है।

ऐसे मनाया जाता है ये त्योहार

ईद-उल-फितर के दिन मुस्लिम समुदाय के लोग घरों में मीठे पकवान, खासतौर पर सेंवईं बनाते हैं, जिसे शूर-क़ोरमा कहा जाता है। आपस में गले मिलकर सभी शिकवे दूर करते हैं। इस्लाम धर्म का यह त्योहार भाईचारे का संदेश देता है, लेकिन इस हार कोरोना महामारी की वजह से सोशल डिस्टेंसिंग का भी ध्यान रखना ज़रूरी है। यही वजह है कि इस बार लोग आपस ज़्यादा मिलेंगे नहीं और अपने-अपने घरों में ही ईद की खुशियां मनाएंगे।

इस दिन लोग सुबह जल्दी उठकर नहा-धोकर नए कपड़े पहनकर ईद की नमाज़ पढ़ते हैं। इस दिन पढ़े जाने वाली पहली नमाज़ को सलात अल फज़्र कहते हैं। ईद से पहले रमज़ानों में हर मुस्लमान के लिए ज़क़ात देना फर्ज़ है। इसके तहत हर इंसान पौने दो किलो अनाज या उसकी कीमत ग़रीबों को देना होता है।

ईद-उल-फितर का इतिहास

इस्लाम की तारीख के मुताबिक ईद उल फितर की शुरुआत जंग-ए-बद्र के बाद हुई थी। दरअसल, इस जंग में मुसलमानों की फतह हुई थी जिसका नेतृत्व ख़ुद पैग़ंबर मुहम्मद साहब ने किया था। युद्ध फतह के बाद लोगों ने ईद मनाकर अपनी खुशी ज़ाहिर की थी।

ईद के दिन करते हैं अल्लाह का शुक्रिया

ईद उल फितर के मौके पर लोग खुदा का शुक्रिया करते हैं, क्योंकि अल्लाह उन्हें महीने भर उपवास पर रहने की ताकत देते हैं। कुछ लोगों का मानना है कि रमज़ान के पाक़ महीने में दान करने से उसका फल दोगुना मिलता है। इसलिए लोग ग़रीब और ज़रूरतमंदों के लिए अपनी आमदनी से कुछ रक़म दान कर देते हैं।

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