राजनीति में घनघोर कंफ्यूजन का दौर

- in Main Slider, ख़ास खबर, विचार
आपकी पूरी लड़ाई किस विषय पर केंद्रित है? किसी खांटी भाजपाई से पूछिये, तो बोलेगा, धर्मयुद्ध! कांग्रेस ने इस समय न्याय को हॉट केक मान लिया है। सपा-बसपा वाले बोलेंगे, सार्वभौमिक न्याय की लड़ाई लड़ रहे हैं। देवेगौड़ा का जनता दल सेक्युलर हो, या लालू प्रसाद का राजद, लक्ष्य पारिवारिक वर्चस्व को बनाये रखना है।आपकी पूरी लड़ाई किस विषय पर केंद्रित है? किसी खांटी भाजपाई से पूछिये, तो बोलेगा, धर्मयुद्ध! कांग्रेस ने इस समय न्याय को हॉट केक मान लिया है। सपा-बसपा वाले बोलेंगे, सार्वभौमिक न्याय की लड़ाई लड़ रहे हैं। देवेगौड़ा का जनता दल सेक्युलर हो, या लालू प्रसाद का राजद, लक्ष्य पारिवारिक वर्चस्व को बनाये रखना है।

 

दुनिया के सबसे बड़े गणतंत्र में राजनीति में घनघोर कंफ्यूजन का दौर

पुष्परंजन

आपकी पूरी लड़ाई किस विषय पर केंद्रित है? किसी खांटी भाजपाई से पूछिये, तो बोलेगा, धर्मयुद्ध! कांग्रेस ने इस समय न्याय को हॉट केक मान लिया है। सपा-बसपा वाले बोलेंगे, सार्वभौमिक न्याय की लड़ाई लड़ रहे हैं। देवेगौड़ा का जनता दल सेक्युलर हो, या लालू प्रसाद का राजद, लक्ष्य पारिवारिक वर्चस्व को बनाये रखना है। शिवसेना राममंदिर बनवा रही थी, अपने कूजे में सरक गई। मां-माटी-मानुष की लड़ाई लडऩे वाली टीएमसी का मौजूदा मकसद पुरानी लोकसभा की 36 सीटें बचाते हुए शाह-मोदी जोड़ी पर हल्ला बोलना है। द्रविड राजनीति करने वाली पार्टियां एआईएडीएमके और डीएमके ने लोकसभा में अस्तित्व बचाने के वास्ते अपने गोलपोस्ट में कितना बदलाव किया है? एनडीए खेमे में जो 41 पार्टियां रही हैं, क्या उनके बीच कोई कॉमन अजेंडा है? मोर जैसे अपने पांव नहीं देखता, पीएम मोदी अपने भानुमति के कुनबे को महामिलावट वाला गठबंधन नहीं कहते हैं। उन्हें यूपीए खेमे की 27 पार्टियों के गठबंधन को महामिलावट बोलना है। नित नये शब्द। चुनाव तक इतने हो जाएंगे, कि एक नये थिसारस का निर्माण हो जाए। एक अरब 35 करोड़ की आबादी को क्रास कर चुके दुनिया के सबसे बड़े गणतंत्र में ऐसा चुनावी धमासान, किंकर्तव्यविमूढ़ता और कंफ्यूजन शायद ही कभी देखने को मिला है।

खबरों को फिल्टर करना और सही साबित करना एक चुनौती

सूचना प्रसारण मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार जनवरी 2016 में 857 के आसपास टीवी चैनलों की संख्या थी। अब यह हजार पार कर चुकी है। मोबाइल टीवी पूरे देश में कितने हैं, सरकार ने अब तक कोई आधिकारिक आंकड़ा जारी नहीं किया है। भारत में 27 करोड़ से अधिक सोशल मीडिया यूजर्स हैं। इनमें हर रोज लाखों झूठी खबरें इंस्टाग्राम, ट्विटर, फेसबुक और छोटे-छोटे खोखेनुमा कमरों में चल रहे तथाकथित टीवी चैनलों के माध्यम से परोसी जा रही हैं। इन्हें फिल्टर करना, और सही साबित करना भी एक चुनौती बन चुकी है।

बड़ी पार्टियों का मीडिया सेल जनमत को मोडऩे के वास्ते हर तरह के अपना रहा है हथकंडे

लगभग-लगभग हर टीवी चैनलों ने सच्ची खबर-झूठी खबर का स्लॉट बना रखा है। देश में जितनी बड़ी पार्टियां हैं, उनका मीडिया सेल जनमत को अपनी तरफ मोडऩे के वास्ते हर तरह के हथकंडे अपना रहा है। सूचना का महाकाय दानव देखते-देखते इतना विकराल हो जाएगा, किसी ने कल्पना नहीं की थी।  इसे कौन रोके? क्या किसी सरकार के

वश में है? अब तो नये नियम के बाद ही यह बीच बहस का विषय हो सकता है। मुझे तो यही लगता है, सूचना के इस अनियंत्रित महादानव को जानबूझ कर खड़ा किया गया, ताकि हंगामा, कोलाहल के साथ कन्फ्यूजन की स्थिति बनी रहे।

 

बीजेपी लोगों को कन्फ्यूज करती-करती खुद हो गई इसका शिकार

 

बीजेपी लोगों को कन्फ्यूज करती-करती खुद इसका शिकार हो गई। बालाकोट सर्जिकल स्ट्राइक का गुब्बारा इतना फुलाया कि वोटरों के एक बड़े हिस्से ने मान लिया था कि पांच सौ ना सही, तीन सौ आतंकी तो मारे गये थे। लंतरानी की पराकाष्ठा यह थी कि योगी आदित्यनाथ से लेकर मुख्तार अब्बास नकवी तक भारतीय सेना पर श्मोदी की सेना का ठप्पा लगा गये। मंच पर ताल ठोकते प्रधानमंत्री की चुनावी बानगी हैरान करने वाली होती, पाकिस्तान ने सोचा न था, मोदी घुसकर मारेगा। मोदी, मंच पर ऐसा मरीचिका उपस्थित कर देते, जैसे वो स्वयं पाक सीमा में घुसकर सर्जिकल स्ट्राइक कर रहे थे, और वहां आतंकियों की लाशें बिछा आये। मगर, विदेशमंत्री सुषमा स्वराज ने तो इस गुब्बारे की हवा ही निकाल दी। गुरुवार को अहमदाबाद की सभा में सुषमा स्वराज ने कहा कि बालाकोट के उस हमले में एक भी पाक सैनिक, या पाक नागरिक नहीं मरा। विदेश मंत्री बोलीं, हमने सेना को खुली छूट दे रखी थी, मगर दो निर्देशों को ध्यान में रखने को कहा था। एक टेरर कैंप पर हमला करना है, दूसरा किसी पाक सैनिक या वहां के नागरिक को नुकसान नहीं पहुंचाना है।

सुषमा स्वराज ने अपने इस बयान से मोदी सरकार की गुब्बारा फुलाओ मंडली से असहमत लोगों को ऐसा हथियार दे दिया, जिसके बिना पर वो बालाकोट सर्जिकल स्ट्राइक के सच पर सवाल खड़े कर रहे थे। इसका दूसरा मतलब यह भी कि सरकार में टॉप लेबल पर जो नेता हैं, उनमें आपस में ही तालमेल नहीं है। ये ऐसे संवेदनशील विषय हैं, जो सरकार की नाक का सवाल बनते रहे। किसे क्या कहना है, सरकार के भीतर ही तालमेल का घनघोर अभाव दिखता है। यानी, दांये हाथ को बांये हाथ के मूवमेंट का पता नहीं। विदेशमंत्री सुषमा स्वराज के इस बयान की मियाद टीवी पर कितने घंटे रहती है, यह भी देखने वाली बात होगी। मगर, बालाकोट का सच एक्सपोज होता है, तो यह पार्टी के वास्ते कहीं न कहीं नुकसान का कारण तो बनेगा। बालाकोट पर पार्टी के भीतर ही कंफ्यूजन का सृजन तो हो चुका है। इस संदर्भ में फ्रांस के पत्रकार थेरी मेयसन की किताब, 9। 11 द बिग लाई की थोड़ी चर्चा मैं उचित समझता हूं।

28 भाषाओं में अनुदित इस किताब ने 9/11 हमले की पोल खोली थी। पत्रकार थेरी मेयसन ने लिखा कि उस आतंकी हमले को क्रिएट करने में अमेरिकी सेना व शासन के कुछ लोग शामिल थे। लेखक के अनुसार, श्पेंटागन पर हमले के लिए बोइंग 757 नहीं, बल्कि इसके लिए मिसाइल का इस्तेमाल किया गया था।श् पत्रकार थेरी मेयसन की किताब श्9ध्11 द बिग लाई्य बेस्ट सेलर में शुमार हुई थी। 2006 में उसकी तीन लाख प्रतियां हाथों-हाथ बिक गई थीं। क्या कुछ ऐसा ही बालाकोट के संदर्भ में होना है? मगर, चुनाव बाद ऐसी कोई किताब आ भी जाती है, तो क्या र्फ$क पड़ता है?

लेकिन जो कुछ इस देश की बहुसंख्यक आबादी को दिखाया जा रहा है, क्या वही आम चुनाव की ऽामीनी हकी$कत है? अमेरिकी मीडिया आइकॉन और राजनीतिक टिप्पणीकार जेम्स कारविल को मालूम नहीं यहां कितने लोग जानते हैं। वे बिल क्लिंटन के चुनावी रणनीतिकार भी रहे हैं।

1992 के राष्ट्रपति चुनाव में जार्ज एच.डब्ल्यू बुश ने राष्ट्रवाद का जो गुब्बारा फुलाया था, एक शब्द श्इट्स द इकोनॉमी स्टूपिड!श् बोलकर जेम्स कारविल ने उसकी हवा निकाल दी थी। अमेरिकी मतदाताओं ने इस शब्द को पकड़ लिया, और जार्ज एच.डब्ल्यू बुश चुनाव हार चुके थे। अफसोस कि भारतीय मतदाता अमेरिकी माइंडसेट के नहीं हो सकते। चाहे, यहां जेम्स कारविल जैसे रणनीतिकार आ भी जाएं। बहुसंख्यक बकलोल उस अर्थशास्त्र को नहीं समझना चाहेंगे, जो अरसे से अमत्र्य सेन, रघुराम राजन, अरविंद सुब्रमणियम, अरविंद पनगढिय़ा जैसे लोग समझाना चाह रहे हैं। सरकार का प्रचारतंत्र इतना जबरदस्त है कि न्यूयार्क में बैठी डाटा रेटिंग कंपनी मूडी यदि 2017 में सरकार को हाइएस्ट क्रेडिट रेटिंग का श्रेय देती है, तो गांव में बैठा अनपढ़-गंवार भी मान लेता है कि चारों तरफ हरियाली है। दरअसल, पूरा देश गणेश जी की प्रतिमा को दुग्धपान कराने वाली प्रचार थ्योरी पर चल रहा है। आप देश के ज्यादातर चुनाव क्षेत्रों में टीवी कैमरे के साथ चले जाइये। व्यापार ठप है, काम-धंधा नहीं है, लोग बैठे ठाले हैं, किसी भी रोड शो-तमाशे में भीड़ का हिस्सा बन जाते हैं। पूछिये,श्श्वोट किसे देंगे? मोदी-मोदी की आवाज जरूर निकलेगी।

वहां भी निकलती दिखेगी, जो स्कल टोपी और लंबी दाढ़ी के साथ नमूदार हैं। अब ये आवाजा भय से निकल रही हैं, या प्रीत से, इस सच का पता तो 23 मई के बाद ही चलेगा। एक बात तो है कि ऐसे लोगों से बीजेपी का हौसला भी बुलंद हुआ और हर दूसरे दिन अजेंडा बदलते रहे। आप ध्यान से देखें कि चुनाव से ठीक पहले सरकार किस अजेंडे को लेकर आगे बढ़ रही थी। मतदान के दौ दौर गुजर चुके, आज का विषय देख लीजिए। पिछले साल बीजेपी सरकार 26/11 के दस साल पूरे होने पर वीरों की शहादत को याद कर रही थी। उस समय प्रधानमंत्री समेत जिन महानुभावों ने करकरे जैसे कर्तव्यनिष्ठ अफसरों की कुर्बानी को याद किया था, आज उन्हीं की पार्टी की एक साध्वी ने पानी फेर दिया। मालेगांव ब्लास्ट की अभियुक्त प्रज्ञा सिंह ठाकुर के हौसले इतने बुलंद हैं कि उसके जरिये यह कहलवाना कि करकरे उसके श्राप और अपने कर्मों से मरे हैं, निहायत ही निंदनीय है।

लेकिन क्या यह सब कुछ एक सोची-समझी योजना के तहत हो रहा है?सरकार बार-बार चार तरह के इश्यू में फंसती रही है। एक राफेल का इश्यू, जो सुप्रीम कोर्ट के पुनर्विचार परिधि में है। दूसरा, किसानों की कर्ज माफी और उनके उपज की $कीमत, तीसरा देश की बिगड़ चुकी अर्थव्यवस्था और चौथा रोजागार। इन चार विषयों को किस चक्रव्यूह से उलझा देना है, उसका तोड़ इन्होंने बहुत तरी$के से ढूंढ लिया है। पहले हम $िफल्मों में देखते थे कि किसी को मरवाने के लिये जेल में पड़े खूंखार $कैदी को निकालते थे। मगर, अब यह राजनीति में होने लगा है।

क्या संयोग है कि महाराष्ट्र इस तरह की गतिविधियों का अधिकेंद्र बन गया?

क्या संयोग है कि महाराष्ट्र इस तरह की गतिविधियों का अधिकेंद्र बन गया। जस्टिस लोया की मौत से इतर, कई एक केस ऐसे मिलेंगे, जिनके तार सत्ता के गलियारे तक हैं। हमें हैरानी तो उस निर्णय को देखकर होती है, जिसने हेल्थ के हवाले से प्रज्ञा सिंह ठाकुर को बेल दिया। पहले खबर यह चलाई गई कि उन्हें ब्रेस्ट कैंसर है। उसके बाद यह कि यातना की वजह से यह महिला अपंग हो गई और चल-फिर नहीं सकती। लेकिन चुनाव क्षेत्र में उनकी गतिविधियों को लेकर ऐसा लगता है, जैसे यह सब सहानुभूति प्राप्त करने के वास्ते किया गया। एटीएस पहले से तैयार पटकथा पर काम कर रहा है। साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर तो बस एक मोहरा है, पर्दे के पीछे से चाल कोई और चल रहा है।  चलते-चलते इटली में नव फासीवाद को याद कर लेते हैं। 1970 में श्नियो फासीजम की जड़ें जमाने के वास्ते सबसे अधिक आतंकवाद का डर दिखाया गया था। आतंक का विरोध और फर्जा राष्ट्रवाद का भौकाल उन दिनों क्रिश्चिन डेमोक्रेट ने खड़ा किया। ये लोग 1980 तक सत्ता में रहे। नव फासीवाद का वायरस तुर्की, पुर्तगाल, ग्रीस, सर्बिया, स्लोवाकिया तक फैला!

Loading...
loading...

You may also like

चुनाव परिणाम से पहले सेबी ने शेयर बाजारों की निगरानी व्यवस्था चाक-चौबंद की

🔊 Listen This News नयी दिल्ली।  नियामक सेबी