आर्थिक असमानता ख़त्म करने से होगा विकास : प्रोफेसर बीएल मूनगेकर

लखनऊ । बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय में ‘भारत के लिए विशेष संदर्भ के साथ एशिया में आर्थिक विकास और विकास की गतिशीलता’ पर तीन दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया गया। विश्वविद्यालय के अटल बिहार वाजपेयी के सभागार में सम्मेलन को सम्बोधित करते हुए प्रोफेसर बीएल मूनगेकर ने भारतीय आर्थिक विकास की वर्तमान परिस्थिति और कैसे हमारी सरकार और आर्थिक नीति आलोचक के योगदान पर बात करते हुए कहा कि आर्थिक विकास हर स्तर के व्यक्ति के विकास के लिए अहम है।  बिना आर्थिक विकास किसी देश के नागरिकों का विकास संभव नहीं है।

प्रोफेसर मूनगेकर ने कहा की हमारे सर्वांगीण आर्थिक विकास में धन का आसमान वितरण सबसे बड़ी समस्या है जिसकी वजह से समाज का एक वर्ग बहुत अधिक धनी और एक वर्ग गरीबी की चपेट में है।  अगर हमे सम्पूर्ण आर्थिक विकास चाहिए तो हमे इस असमानता को ख़त्म करना होगा।  आर्थिक विकास के लिए न सिर्फ विदेशी निवेश, न सिर्फ उदार नीतियां बल्कि आय का समान वितरण भी अत्यंत आवश्यक है।  उन्होंने कहा की हमारे देश में न सिर्फ आय के वितरण में असमानता है बल्कि यहां जातिवाद, क्षेत्रवाद, धर्म, लिंग का भी भेदभाव व्याप्त है जो की हमारे  की हमारे सर्वांगीण विकास में बाधक है। इसलिए सरकार और आर्थिक नीति आलोचकों को चाहिए की वह एक ऐसी व्यवस्था लाए जिससे यह भेदभाव और असमानता समाप्त हो सके।

1980 के दशक में भारत की जीडीपी चीन की तुलना में थी बेहतर

मुख्य वक्ता  के तौर पर मौजूद प्रो. उदय रचेरला ने कहा की नवाचार और रचनात्मक दृष्टिकोण तेज़ आर्थिक विकास में काफी कारगर साबित हो सकता है। उन्होंने कहा कि भारत में आर्थिक विकास 1947 की तुलना में काफी बेहतर है। इसमें और तेज़ी लाई जा सकती है अगर हम अपने नए और रचनात्मक विचार के साथ इस क्षेत्र में काम करें । अगर बात करें चीन की तो 1980 के दौर में भारत की जीडीपी चीन की तुलना में तुलनात्मक तौर पर बेहतर थी, मगर 1980 से लेकर 2010 के बीच में भारत चीन से काफी पीछे हो गया उसके कई कारण है जिसमें  व्यापार की स्वतंत्रता एक मुख्य कारण रहा है। चीन ने अपनी बेहतर व्यापर नीतियों और बेहतर बुनियादी ढांचे को मजबूत कर आर्थिक विकास की गति को प्राप्त किया है। मगर हम इस दौरान थोड़े पीछे रह गए जिसका मुख्य कारण  प्रतिकूल कारोबारी माहौल, कम निवेश और अकुशल जनशक्ति है। हम दोस्ताना कारोबारी माहौल प्रदान करके, विदेशी निवेश को आकर्षित करना, सरकार, शिक्षाविदों, वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं के समन्वय से दुबारा अपनी अर्थव्यवस्था को पटरी पर ला सकते हैं।

कृषि पर ध्यान देने से आर्थिक विकास को मिलेगी गति

बीबीएयू के पूर्व वाईस चांसलर प्रोफेसर जी नानचिरैया  ने आर्थिक विकास को प्राप्त करने के लिए देश के विभिन्न दलों द्वारा उठाए गए कदमों के बारे में बात की।  उन्होंने कहा कि उदारीकरण की अवधि से पहले आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले राज्य थे, लेकिन उस समय उनकी कोई विदेशी व्यापार नीति नहीं थी और उस वजह से हम विदेशी मुद्रा संकट का सामना करते हैं और उस संकट से उबरने के लिए कई कदम उठाए गए हैं,  लेकिन फिर भी हम कई बिंदुओं पर मात खा गए और उसके बाद हम पुनः 1991 में उदारीकरण की नीति के साथ आए, इसमें कोई शक नहीं कि विकास दर में वृद्धि हुई, मगर  फिर भी कई अन्य समस्याएं सामने आयी। कृषि के क्षेत्र में गिरावट,  बेरोजगारी, गरीबी जैसी कई समस्याए आज हमारे सामने हैं। जिसका मुख्य कारण कृषि क्षेत्र में अनदेखी, ख़राब बुनियादी ढांचे और अधिक आयात, कम निर्यात है। इन समस्याओं से मुकाबला करने के लिए हमें अपने बुनियादी ढांचे  पर ज्यादा खर्च करना चाहिए और निवेश में वृद्धि करनी चाहिए ताकि अधिक उत्पादन कर सके और नए रोजगार के अवसर उत्पन्न हो।  कृषि के क्षेत्र में भी अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है तभी हम आर्थिक विकास में गति प्राप्त कर सकेंगे।

 

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