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बुंदेलखंड से शुरू हुई गजमहालक्ष्मी पटचित्र पूजन प्रथा, जानिये क्या है इतिहास

Desk by Desk
14/11/2020
in Main Slider, उत्तर प्रदेश, ख़ास खबर, झाँसी, राष्ट्रीय
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लगभग पूरे उत्तर भारत में दीपावली के शुभ अवसर पर जिस गजमहालक्ष्मी पटचित्र की लोग भक्तिभाव से पूजा अर्चना करते हैं , इस पूजन प्रथा का आरंभ बुंदेलखंड की धरती से ही हुआ ,झांसी मंडल के ललितपुर स्थित दशावतार मंदिर ही गजमहालक्ष्मी पटचित्र पूजन का जन्मस्थल है।

हिंदू संस्कृति में देवी लक्ष्मी का वर्णन उपनिषद, पौराणिक गाथाओं में किया गया है और बुंदेलखंड में महालक्ष्मी की आराधना प्राचीन काल से होती आ रही है। धन और ऐश्वर्य की देवी लक्ष्मी की प्राचीन छवि गजलक्ष्मी के रूप में सर्वाधिक प्रचलित है। घरों में दीपावाली पर पट के रूप में देवी लक्ष्मी के गजलक्ष्मी रूप की पूजा की जाती है जिसमें देवी लक्ष्मी कमल पुष्प के आसन पर विराजमान होती हैं और उनके दाएं-बाएं दो गज अपनी सूढ़ में कलश लिये होते हैं।

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गज इन कलशों में भरे जल से देवी लक्ष्मी का जलाभिषेक कर रहे होते हैं। बुन्देलखंड समेत पूरे उत्तर भारत में इसका चलन बुन्देलखंड के ललितपुर स्थित दशावतार मंदिर से बताया जाता है। यह शायद ही कोई जानता हो कि बुन्देलखंड की धरती ही वह स्थान है जहां से इस पटचित्र का चलन शुरु हुआ। इसका प्रमाण दशावतार मंदिर के स्तंभ पर उत्कीर्ण गजमहालक्ष्मी का चित्र है।

इतिहासकार डॉ चित्रगुप्त ने बताया कि बुंदेलखंड में प्राचीन गजलक्ष्मी की प्रतिमा पायी गयी है। यह प्रतिमा बुन्देलखंड की हृदयस्थली वीरांगना भूमि झांसी से करीब 100 किलोमीटर दूरी पर स्थित ललितपुर जिले में देवगढ़ के विश्व प्रसिद्ध दशावतार मंदिर के एक स्तंभ पर उत्कीर्ण है। इतिहासकारों के अनुसार इस मंदिर का निर्माण 5वीं-6वीं शताब्दी में हुआ था।

भगवान विष्णु के विभिन्न अवतारों को यहां की भित्तियों में मूर्ति के रूप में उत्कीर्ण किया गया है। इन्ही मूर्तियों के बीच एक स्तंभ पर देवी लक्ष्मी का गजलक्ष्मी स्वरूप भी उत्कीर्ण है, जो मंदिर निर्माण के समय अर्थात 5वीं-6वीं सदी का है। संभवतः कालांतर में बुंदेलखंड में इसी मूर्ति से प्रेरित होकर ही पूरे उत्तर भारत में इस शैली में देवी लक्ष्मी की मूर्तियों को उत्कीर्ण किया गया होगा। वह बताते हैं कि संभवतः पूरे देश में इसी पटचित्र की पूजा की जाती है। डॉ चित्रगुप्त ने इस पर शोध करते हुए इसका प्रमाण भी दिया है।

डा. चित्रगुप्त बताते हैं कि मध्यकाल में रंग से चित्रकारी में इस स्वरूप को चित्रित किया जाने लगा। आधुनिक समय में जब प्रिंटिंग का समय आया तो गजलक्ष्मी के इस स्वरूप को छापा जाने लगा है। आज भी हम देवी के इस स्वरूप के चित्र की पूजा दीपावली के दिन करते हैं। देवगढ़ में ही शांतिनाथ जैन मंदिर में 11 वीं सदी की एक प्राचीन मूर्ति भी मौजूद जो बहुत मनोहारी है। इसके अलावा देवी लक्ष्मी के मंदिर बुंदेलखण्ड के विभिन्न स्थलों पर मौजूद हैं। झांसी स्थित लक्ष्मी मंदिर मध्यकालीन है। इसके अलावा ओरछा, महोबा आदि स्थलों पर भी देवी लक्ष्मी के मंदिर हैं।

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