बेहतर होता कि प्रधानमंत्री इस राग से परहेज करते

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शीतला सिंह

संवैधानिक सर्वोच्चता की शपथ लेकर प्रधानमंत्री पद पर आसीन हुए और उसके दायित्व निभाते आ रहे नरेन्द्र मोदी ने केरल पहुंचकर हिन्दुओं की संतुष्टि के लिए सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सबरीमाला के सम्बन्ध में दिये गये सर्वसम्मत निर्णय को लेकर जो बातें कहीं, उन पर सम्यक विचार बहुत जरूरी है। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने उक्त फैसले में सभी महिलाओं को समान रूप से सबरीमाला मन्दिर में प्रवेश की अनुुमति दी थी तो भाजपा ने भी आवश्यक बताकर उसका स्वागत किया था। लेकिन अब राजनीतिक लाभ के लिए उसका और साथ ही प्रधानमंत्री का भी स्वर बदल गया है। वे वादा कर रहे हैं कि फिर सत्ता में आये तो धार्मिक भावनाओं की रक्षा के संविधान के प्रावधान के अनुसार इस निर्णय को बदल दिया जायेगा।विडम्बना देखिये कि इससे पहले अल्पसंख्यक समुदाय के लोग अपनी वैयक्तिक आस्थाओं और दीनी भावनाओं के अनुरूप बताकर यह तर्क देते थे कि सरकार को विवाह जैसे मामले में उनके समुदाय में चल रहे प्रावधानों में परिवर्तन नहीं करना चाहिए तो प्रधानमंत्री और उनकी सरकार उनसे सहमत नहीं थे।

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अल्पसंख्यकों का कहना था कि हमारे यहां विवाह एक संविदा के तौर पर होता है, जिसको तोडऩे के लिए मेहर नाम का जुर्माना भी तय किया गया है। यह जुर्माना विवाह के समय ही निर्धारित हो जाता है चूंकि कोई भी विवाह पुरुष और स्त्री की सहमति के वगैर संभव नहीं होता, इसलिए इस प्रावधान में उनकी इच्छाओं को शामिल मानकर इनमें दखल नहीं देना चाहिए।लेकिन तब खासकर तीन तलाक के प्रश्न पर सरकार का कहना था कि जराति व धर्म का भेद किये बिना सारी महिलाओं के समान संवैधानिक अधिकारों के नाम पर तलाक की यह पद्धति अन्यायपूर्ण मानकर समाप्त की जानी चाहिए।

लेकिन इस बात का क्या किया जाये कि अब दुनिया लिव इन यानी सहजीवन की जिस मान्यता तक पहुंची है, उसमें हमारा संविधान भी सहायक है। तभी तो सर्वोच्च न्यायालय का फैसला है कि यदि कोई पुरुष व स्त्री विवाह नामक संस्था का उपयोग किये बिना पति-पत्नी की भांति रहते और तदनुकूल आचरण कर बच्चे पैदा करते हैं तो उनके बच्चों को उत्तराधिकार के वे सारे अधिकार मिलने चाहिए, जो शादीशुदा दम्पत्तियों के बच्चों को मिलते हैं। इसके फलस्वरूप विवाह नामक संस्था की अनिवार्य नहीं रह गयी और यह  स्थिति दोनों पक्षों की सहमति से स्वीकार की गयी है।

इसी तरह जब भी पुरातन आस्थाओं का प्रश्न उठेगा, यह सवाल अपनी जगह रहेगा कि क्या इस सम्बन्ध में दोनों पक्षों के विचार एक समान हैं?सबरीमाला प्रकरण पर लौटें तो 10 से 50 वर्ष तक की महिलाओं को रजस्वला अवधि वाली मानकर सम्बन्धित मन्दिर में उनके प्रवेश पर पाबन्दी लगाई गयी थी।

इसके विरुद्ध सुनवाई में सर्वोच्च न्यायालय ने माना है कि दैहिक स्थितियों के कारण इन महिलाओं को समानता के अधिकार से वंचित करने का प्रावधान नहीं है और इस खास मंदिर या देश के अन्य किसी मंदिर में भी इसे अपवाद के तौर पर लागू नहीं किया जा सकता। न्यायालय के अनुसार महिलाएं पुरुषों की ही भांति अपने इष्ट और पूज्य के दर्शन तथा पूजा-पाठ में सक्षम हैं।

दूसरी ओर सबरीमाला मंदिर के पुजारियों का कहना है कि उसमें जिन इष्ट देव की स्थापना की गयी है, वे अखण्ड ब्रह्मचारी हैं। इसलिए रजस्वला अवधि की महिलाओं का उनके मन्दिर  से दूर रहना ही श्रेयष्कर है। लेकिन वे इस प्रश्न का जवाब नहीं देते कि क्या यह अवधि ही ब्रह्मचर्य के खण्डन की विशेषताओं वाली है?

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कोई बच्चा अपनी मां की रजस्वला अवधि में भी उससे भेदभाव नहीं करता, बल्कि मातृत्व व्यवहार को ही अपना कर्तव्य मानता है। हिन्दुओं में एक वर्ग इस अवधि में महिलाओं को अपवित्र मानकर उन्हें भोजन पकाने के काम से मुक्त और चौके से बाहर रखा करता था। लेकिन यह मान्यता भी अब लगभग समाप्त हो गयी है और माना जाने लगा है कि महिलाएं इस स्थिति का सामना करने तथा इस दौरान खुद को अन्य कार्यो के उपयुक्त बनाये रखने की कला और व्यवहार की धनी होती हैं।

वे तदनुकूल इसकी व्यवस्था भी करती हैं। यही कारण है कि सबरीमाला को छोड़ इस अवधि में उनके मंदिरों या देवस्थानों में प्रवेश पर प्रतिबंध की कोई और मिसाल नहीं है।दूसरे पहलू पर जायें तो आस्था, विश्वास और धारणाओं का सवाल उठाने वालों को समझना चाहिए कि अपने असमानता और भेदभावजनित कारकों के कारण वे सभी की नहीं हो सकतीं। जैसे-जैसे लोकतांित्रक अपनी चेतनाएं जगह बना रही हैं, इनसे प्रभावित लोगों को इल्म होता जा रहा है कि जब तक वे प्रतिरोध नहीं करेंगे, उनके साथ व्यवहार में भेदभाव बरता जाता रहेगा। इसी प्रकार अखण्ड ब्रह्मचारी देव की अबधारणा और ईश्वर के सम्बन्ध में भी विभिन्न प्रकार की मान्यताएं हैं-सगुण और निर्गुण के भेदभाव तो हैं ही। जहां तक मंदिरों में मूर्तियों के पूजन की प्रथा की बात है, वह छठी शताब्दी के बाद आरम्भ हुई।

इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि वह सृष्टि के आरम्भ से चली आ रही है। युगपरिवर्तन की अनिवार्यता का सिद्धांत तो खैर अब दुनिया भर में स्वीकार हो रहा है। ऐसे में किसी का अपनी मान्यताओं के अनुकूल व्यवस्था का आग्रह हो, तो सवाल होगा कि उसमें एकरूपता कैसे होगी?यदि एकरूपता आवश्यक नहीं है तो क्यों लोग ईश्वर को समदर्शी व सर्वव्यापक मानते और कहते हैं कि जगत का कोई कण उससे मुक्त नहीं है और वह लैंगिक भेदभाव से भी मुक्त हैं? फिर कुछ लोगों की धारणाओं के अनुसार ऐसे प्रतिबन्धों को समान रूप से सभी पर लागू करना निष्पक्ष कैसे कहा जायेगा? अगर ईश्वर अखण्ड ब्रह्मचारी है, तो उसके जन्म का सवाल भी तो उठेगा क्योंकि जगत का संचालन पुरुष व स्त्री दोनों के सम्मिलन व सहयोग से ही संभव हो रहा है। जाहिर है कि जिस ईश्वर को हम सर्वशक्तिशाली और मनुष्यों से परे मानते हैं, उसमें भेदभाव की सीमा खींचना उचित नहीं है।

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आज के युग में तो किसी विश्वास का वैज्ञानिकता के आधार पर परीक्षण भी हो सकता है।सबरीमाला प्रकरण में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के समय उसकी संवैधानिकता के प्रश्न पर तो विचार हुआ ही, प्रवेश पर प्रतिबन्ध को खास आयुवर्ग की महिलाओं के साथ भेदभावपूर्ण मानकर उसको समाप्त करने का निर्णय दिया गया। अब संवैधानिक व्यवस्था में उक्त निर्णय का कार्यान्वयन राज्य को ही करना है। आगे देश में किसी भी पार्टी और विचार की सरकार सत्तारूढ़ हो, उसे अपनी इच्छा के अनुसार नहीं, सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को संवैधानिक मानकर उस पर अमल करना पड़घ्ेगा।

अगर यह प्रश्न कुछ केरलवासियों की मान्यताओं के विपरीत है, तो क्या केन्द्र सरकार उनको सर्वोच्च न्यायालय के  विपरीत आचरण की स्वीकृति दे सकती है?यहां समझना चाहिए कि संविधान में व्यक्ति के अधिकार तो गिनाये ही गये हैं लेकिन जिन्हें व्यवस्था के संचालन की जिम्मेदारी दी जाती है, उनका उतने से ही काम नहीं चलता।  उन्हें संविधान के प्रति निष्ठा की शपथ भी दिलायी जाती है। इस निष्ठा और वैयक्तिक भावना में अन्तर हो तो शपथ वाली निष्ठा को ही सर्वोच्च मानना होगा। और,जब प्रधानमंत्री जैसा व्यक्ति सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को संविधान में भावनाओं की रक्षा के प्रावधान के विपरीत माना जा रहा हो तो यह सवाल भी उठेगा कि संविधान का वास्तविक निर्णायक और व्याख्याकार कौन है और क्या वह संविधान के संरक्षक सर्वोच्च न्यायालय से बड़ा हो सकता है?

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अच्छा होता कि देश के सर्वशक्तिमान माने जाने वाले प्रधानमंत्री पद पर आसीन नरेन्द्र मोदी द्वारा चुनाव के दौरान इस विवाद को न उठाया जाता और ऐसी बात न कही जाती जो उनके द्वारा ली गई संविधान की शपथ में निष्ठा को संदिग्ध करार दे। वे व्यक्ति के रूप में किसी भी आग्रह के समर्थक या विरोधी हो सकते हैं, लेकिन प्रधानमंत्री के रूप में उन्हें अपनी संवैधानिक शपथ का खयालरखना ओर समझना ही होगा कि संविधान के वैयक्तिक अधिकार व्यक्तिपरक हैं, समूहपरक नहीं।

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