मरती संवेदनाओं के देश में राष्ट्रवाद की जय हो!

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जय प्रकाश पाण्डेय

अटल बिहारी वाजपेयी, निश्चय ही हमारे दौर के बेहद प्रभावशाली और महत्वपूर्ण नेता और पूर्व प्रधानमंत्री थे, लिहाजा उनकी मौत में देश सात दिन तक राष्ट्रीय शोक की घोषणा और उन्हें दिए गए राजकीय सम्मान से भला किसे गुरेज हो सकता है, ऐसे में उनकी मौत और केरल की बाढ़ से हो रही तबाही की तुलना ढेर सारे लोगों को नागवार लग सकती है, पर सभ्यता के विकास से उपजी संवेदना और लोकतंत्र की कसौटी यह कहती है कि इस पर बात जरूर होनी चाहिए। अटल जी 93 साल के थे और उन्होंने अपना जीवन भरपूर राजयोग के जिया था।

शानदार जीवन जिया, उतनी ही शानदार हुई अटल जी की विदाई  

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साल 2009 से वह बीमार थे, और डायमेंशिया का शिकार हो खुद को भी भूल से चुके थे। पिछले काफी सालों से वह किस हाल में थे, डॉक्टरों और उनके गोद लिए करीबी परिजनों को छोड़ किसी ने न देखा था, ऐसे में अटल जी का जाना तमाम दुखों के बावजूद उनके शारीरिक दुखों से मुक्ति भी थी। एक ऐसा व्यक्ति, जिसने शानदार जीवन जिया, उसकी विदाई भी उतनी ही शानदार हुई। पर जिस जनतंत्र ने अटल जी और बाद में उनकी पार्टी और उनके समर्थकों को सत्ता दे यह मुकाम दिया कि वे पूरे मुल्क पर राज कर सकें, उन्हीं के राज में उस जन का क्या? जो प्राकृतिक आपदा से तबाह हो रहा है।

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अटल जी के निधन से मॉरिशस में आयोजित विश्व हिंदी सम्मेलन नहीं रुका

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अटल जी के निधन से मॉरिशस में आयोजित विश्व हिंदी सम्मेलन नहीं रुका, तो केरल की तबाही को राष्ट्रीय आपदा घोषित करने से किसने रोका था? हमारे जनतंत्र की राष्ट्रीयता और राष्ट्र क्या केवल तथाकथित शासक वर्ग, विपक्ष या सांसद, विधायकों की दासी हो उन चंद राजनेताओं तक सिमट गई है, और उन्हें इस कदर आजादी हासिल है कि वे जनता की गाढ़ी कमाई का पैसा अपनी संतुष्टि वाले जश्न में खर्च करें, भले ही देश का एक हिस्सा तबाह हो? फिर यह आजादी ब्रिटिश काल की गुलामी से कितनी अलग है कि भयंकर अकाल वाले दौर में भी दिल्ली में ‘दिल्ली दरबार’ आयोजित हुआ था?

देव भूमि केरल भयंकर तबाही से जूझ रहा

केरल

केरल, जिसे देवताओं की भूमि का दर्जा हासिल है, सदी की सबसे बड़ी तबाही से जूझ रहा है।  पिछले सौ साल में केरल ने कभी ऐसी तबाही नहीं देखी। अब तक आई खबरों के अनुसार वहां 350 से ज्यादा लोग अपनी जान गंवा चुके हैं और 6 लाख से ज्यादा लोग अपना सबकुछ गंवा कर, अपने जीवनभर की कमाई, घर-बार तबाह हो कर राहत शिविरों में रह रहे हैं। यह लेख लिखे जाने तक राज्य के 14 में से 11 जिलों में रेड अलर्ट है और सबसे चिंताजनक बात है कि मौसम विभाग ने अभी भी भारी बारिश की आशंका जताई है जिससे आने वाले वक्त में हालात और बिगडऩे के आसार हैं।

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प्रधानमंत्री ने 500 करोड़ रुपए की तत्काल मदद का किया ऐलान 

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इडुक्की और एर्नाकुलम राज्य के बाकी हिस्सों से पूरी तरह कट गए हैं। बदतर होते हालात के बीच सैकड़ों राहत टीमें पूरी जी जान से लगी हुई हैं। सेना, नौसेना, वायु सेना, अद्र्धसैनिक बल, राष्ट्रीय आपदा फोर्स सभी राहत और बचाव के काम में पूरी तरह से मुस्तैद हैं, सिवाय हमारे राजनेताओं को छोड़, जो सियासत और सत्ता में लगे हैं। राज्य में बारिश और बाढ़ के चलते अब तक करीब 20 हजार करोड़ रुपए के नुकसान होने की बात मुख्यमंत्री पिनरई विजयन ने कही है, जबकि केंद्र सरकार ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हवाई सर्वेक्षण के बाद महज 500 करोड़ रुपए की तत्काल मदद का ऐलान किया।

“फिर सबका साथ, सबका विकास कहां हुआ”

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इससे पहले गृहमंत्री राजनाथ सिंह 100 करोड़ रुपए की सहायता राशि घोषित कर एहसान जता रहे थे। यह हाल तब है, जब कांग्रेस सहित विपक्षी पार्टियां ने मांग की थी कि केंद्र सरकार जल्द ही केरल की बाढ़ को राष्ट्रीय आपदा घोषित करे, क्योंकि इतनी भयंकर तबाही के बावजूद वहां अभी बादल हैं, और बारिश हो ही रही है। लाखों लोगों की जिंदगी, आजीविका और भविष्य दांव पर है। अगर इस आपदा को राष्ट्रीय आपदा घोषित किया जाता, तो बचाव कार्यों के लिए सामान, पुनर्वास कार्यों का सारा खर्चा केंद्र सरकार उठाती। पर केंद्र का तर्क था कि चूंकि पुरानी कई आपदाओं के समय ऐसी मांग नहीं मानी गई, इसलिए अब भी नहीं मानी जाएगी। फिर सबका साथ, सबका विकास कहां हुआ।

सरकार के पास अपने तर्क के पक्ष में काफी मजबूत आंकड़ा

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सरकार के पास अपने तर्क के पक्ष में काफी मजबूत आंकड़ा है कि आखिर उसने साल 2008 में बिहार की बाढ़ में जब 434 लोगों की मौत हुई और 23 लाख लोगों का जीवन प्रभावित हुआ, साल 2013 में उत्तराखंड में प्रलय में 5748 लोगों की मौत हुई और 4200गांव नष्ट हुए, साल 2014 में कश्मीर बाढ़ के दौरान 277 लोगों की मौत हुई और 2500 गांव नष्ट हुए या फिर साल  2015 में दक्षिण भारत में आई बाढ़ जिसमें 500 लोगों की मौत और 20 हजार करोड़ की संपत्ति नष्ट हुई थी, को जब राष्ट्रीय आपदा घोषित करने की मांग को अनदेखा किया, तो अभी की मांग को क्यों माने? तब सारे तर्क और दबाव के बावजूद केंद्र सरकार ने इन आपदाओं को गंभीर प्रकृति की आपदा ही माना था, राष्ट्रीय आपदा नहीं। तो अब क्यों माने? वैसे भी डिजास्टर मैनेजमेंट एक्ट 2005 के तहत किसी भी प्राकृतिक आपदा को श्राष्ट्रीय आपदाश् घोषित करने के लिए कोई प्रावधान है ही नहीं है।

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केरल के मुख्यमंत्री ने 2000 करोड़ की राहत राशि केंद्र से मांगी

24 जुलाई, 2018 में केंद्रीय गृह राज्यमंत्री किरन रिजिजू ने लोकसभा में बताया भी था कि अगर किसी राज्य में प्राकृतिक आपदा आती है तो आपदा प्रबंधन की पहली जिम्मेदारी राज्य सरकारों की बनती है। जरूरत पडऩे पर  राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया निधि (एनडीआरएफ) से अतिरिक्त सहायता प्रदान की जाती है। केंद्र का तर्क है कि गृह मंत्रालय की राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण की उच्चतम श्रेणी में गंभीर प्रकृति की आपदा का ही प्रावधान है तो सरकार राष्ट्रीय आपदा क्यों माने? संभव है, विधिक रूप से सरकार की बात सच हो, पर विधान तो शासकों का होता है, जन का नहीं। पीएम मोदी की समीक्षा बैठक में केरल के मुख्यमंत्री पी. विजयन ने राज्य के लिए 2000 करोड़ की राहत राशि केंद्र से मांगी, पर नहीं मिली। केरल में भयावह बाढ़ से हुए जानमाल के भारी नुकसान को देखते हुए कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने फैसला किया है कि पार्टी के सभी सांसद, विधायक और विधान परिषद सदस्य एक महीने का वेतन राज्य के बाढ़ पीडि़तों की मदद के लिए देंगे।

निजी स्तर पर देश और कंपनियां और सभी राज्य मदद को आगे आ रहे

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पार्टी के महासचिवों, राज्य प्रभारियों, प्रदेश अध्यक्षों और विधायक दल के नेताओं के साथ बैठक में कांग्रेस अध्यक्ष ने यह भी कहा कि पार्टी के नेता एवं कार्यकर्ता केरल एवं कुछ दूसरे राज्यों में आई बाढ़ से प्रभावित लोगों की हर संभव सहायता करें। निजी स्तर पर देश और कुछ कंपनियां, लगभग सभी राज्य मदद को आगे आ रहे हैं, पर आपदा की गंभीरता को देखते हुए यह काफी कम है। शर्मनाक तो यह कि इस देश से हजारों करोड़ का कारोबार करने वाले पेटीएम जैसी कंपनी के मालिक ने केवल दस हजार की सहायता दी। मरती संवेदनाओं के देश में राष्ट्रवाद की जय हो!

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