जानें क्या है इस्लामिक बैकिंग सिस्टम, देश को आर्थिक मंदी से निकाल सकता है?

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लखनऊ डेस्क। देश में चल रही आर्थिक मंदी से निबटने के लिए कुछ इस्लामिक स्कॉलर्स का कहना है कि यदि देश में इस्लामिक बैंकिग प्रणाली को लागू कर दिया जाए तो अर्थव्यवस्था अपने बुरे दौर से बाहर निकल सकती है। तो आइए जानते हैं क्या होती है इस्लामिक बैंकिंग प्रणाली और यह कैसे कार्य करती है।

दुनिया के 75 देशों में 350 इस्लामिक बैंक वर्तमान समय में संचालित हैं। आधुनिक इस्लामिक बैंकिंग की शुरुआत 1963 में अहमद अल नज़र ने मिस्त्र में की थी। जबकि इसका सिद्धांत 19वीं सदी के इस्लामिक विद्वान सैय्यद अबुल आला मौदूदी ने दिया था। भारत में पहला इस्लामिक बैंक कोच्चि में खुला था जिसमें राज्य की हिस्से दारी 11 प्रतिशत है।

इस्लामिक सिद्धांतों के अनुसार सूद यानि ब्याज लेना और देना हराम है। यानि कोई भी ऐसी प्रणाली जिसमें ब्याज पर काम होता हो वह इस्लाम मे ज़ायज़ नहीं समझा जाएगा। ऐसे में इस्लामिक बैकिंग प्रणाली ऐसी प्रणाली है जिसमें बैकिंग व्यवस्था बिना ब्याज के चलती है।

इस बैकिंग सिस्टम के अनुसार बैंक अपने ग्राहकों के जमा पैसे पर न तो ब्याज देता है और न ही ग्राहकों को दिए गये कर्ज पर ब्याज लेता है। अच्छे व्यवहार के आधार पर बैंक लोन देता है और कर्ज लेने वाले को केवल मूलधन यानी जितनी रकम ली है उतनी ही लौटानी पड़ती है।

इस बैकिंग सिस्टम के अनुसार बैंक फंड्स के ट्रस्टी की भूमिका निभाता है। यानि बैंक में जो लोग पैसा जमा करते हैं वह जब चाहें वहां से निकाल सकते हैं और बचत खाता पर ब्याज कमाने की अनुमति नहीं है किंतु जब बैंक आपके पैसे से कुछ मुनाफ़ा कमाती है तो वह इस मुनाफ़े का कुछ प्रतिशत खाताधारक को भी गिफ्ट के रुप में देती है।

यहां पर यह सवाल खड़ा होता है कि जब बैंक न ब्याज लेता है न देता है तो वह अपने कर्मचारियों को वेतन कहां से देता है और उसके खर्च कैसे पूरे होंगे। दरअसल इस्लामिक बैंकिग सिस्टम पिछले दरवाज़े से कमाई करते हैं। यानि इस्लामिक बैंक अपने यहां जमा धन से मुख्य रुप से अचल संपत्ति खरीदते हैं जैसे – मकान, दुकान, घर बनाने वाले भूखंड आदि। इस्लामिक मॉर्टगेज ट्रांजैक्शन में बैंक समान खरीदने के लिए खरीदार को कर्ज़ नहीं देते बल्कि बैंक खुद ही बेचनेवाले से वह समान खरीद लेता है और उसे खरीददार के पास लाभ के साथ बेच देता है। इसके लिए बैंक खरीददार को किश्तों में पेमेंट करने को कहता है। बैंक को जो निवेश से मुनाफा होता है उसे ग्राहकों के बीच बांटा जाता है और बैंक के अन्य खर्चे पूरे किये जाते हैं।

यह मुश्तरकाह (ज्वाइंट वेंचर) प्रणाली को बढ़ावा देता है। जैसे सही सहयोगी एक व्यावसायिक गतिविधि करने के लिए पूंजी का योगदान करते हैं और सभी साझेदार प्रॉफिट को पहले से तय अनुपात में बांट लेते हैं जबकि नुकसान में भी अंशदान के हिसाब से साझेदारी करनी पड़ती है।

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