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10वीं शताब्दी में चंद शासनकाल से खेली जा रही है कुमाउंनी शास्त्रीय होली

Desk by Desk
28/03/2021
in Main Slider, उत्तराखंड, फैशन/शैली, राष्ट्रीय
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Kumauni Classical Holi
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नैनीताल। देशभर में फाल्गुन पूर्णिमा पर मौज-मस्ती के साथ होली खेली जाती है, लेकिन कुमाऊं में परंपरागत कुमाउंनी बैठकी होली यानी अर्ध शास्त्रीय गायकी युक्त होली होती है। लगभग तीन महिने तक चलने वाली होली की शुरुआत पौष माह के पहले रविवार से ही विष्णुपदी होली गीतों के साथ हो जाती है।

कुमाऊं की शास्त्रीय होली की शुरुआत करीब 10वीं शताब्दी में चंद शासनकाल से मानी जाती है। कुछ विद्वानों के अनुसार चंद शासनकाल में बाहर से ब्याह कर आयीं राजकुमारियां अपनी परंपराओं व रीति-रिवाजों के साथ होली भी यहां साथ लेकर आयीं।

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वहीं अन्य विद्वानों के अनुसार प्राचीनकाल में यहां के राजदरबारों में बाहर के गायकों के आने से यह परंपरा आई है। कुमाऊं के प्रसिद्ध जनकवि स्वर्गीय गिरीश तिवारी ‘गिर्दा’ के अनुसार कुमाऊं की शास्त्रीय गायकी होली में बृज व अवध से लेकर दरभंगा तक की परंपराओं की छाप स्पष्ट रूप से नजर आती है तो नृत्य के पद संचालन में ठेठ पहाड़ी ठसक भी मौजूद रहती है।

इस प्रकार कुमाउंनी होली कमोबेश शास्त्र व लोक की कड़ी तथा एक-दूसरे से गले मिलने जैसे आपसी प्रेम बढ़ाने वाले त्यौहारों की झलक भी दिखाती है। साथ ही कुमाउंनी होली में प्रथम पूज्य गणेश से लेकर गोरखा शासनकाल से पड़ोसी देश नेपाल के पशुपतिनाथ शिव की आराधना और ब्रज के राधा-कृष्ण की हंसी-ठिठोली से लेकर स्वतंत्रता संग्राम और उत्तराखंड आंदोलन की झलक भी दिखती है, यानी यह अपने साथ तत्कालीन इतिहास की सांस्कृतिक विरासत को भी साथ लेकर चली हुई है।

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बॉलीवुड में भी प्रदेश के लोक संगीत को पहचान दिलाने वाले प्रभात साह गंगोला सहित अनेक विशेषज्ञों का मानना है कि इसका इतिहास प्रदेश की सांस्कृतिक राजधानी अल्मोड़ा की स्थापना से भी पूर्व से चार शताब्दियों से भी अधिक समय पुराना है।

इनके अनुसार कुमाउंनी होली का मूल स्वरूप काली कुमाऊं से खड़ी होली के स्वरूप में आया होगा, लेकिन चंद वंशीय शासकों की राजधानी अल्मोड़ा में उस दौर के प्रख्यात शास्त्रीय गायक अमानत अली खां और गम्मन खां की शागिर्द ठुमरी गायिका राम प्यारी जैसी गायिकाएं यहां आईं और स्थानीय शास्त्रीय संगीत के अच्छे जानकार शिव लाल वर्मा आदि उनसे संगीत सीखने लगे। वह 14 मात्रा में पूरी राग-रागिनियों के साथ होली गाते थे।

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ऐसे ही अन्य बाहरी लोगों के साथ कुमाउंनी होली में ब्रज, अवध व मगध के अष्टछाप कवियों के ईश्वर के प्रेम में लिखे गीत आए। कालांतर में होलियों का मूल शास्त्रीय स्वरूप वाचक परंपरा में एक से दूसरी पीढ़ी में आते हुए और शास्त्रीय संगीत की अधिक गहरी समझ न होने के साथ लोक यानी स्थानीय पुट से भी जुड़ता चला गया और कुमाउंनी होली कमोबेश शास्त्र व लोक की कड़ी सी बन गई।

कुमाउंनी होली की एक और खासियत यह भी है कि यह पौष माह के पहले रविवार से ही शुरू होकर फाल्गुन माह की पूर्णिमा तक सर्वाधिक लंबे अंतराल तक चलती है। इसके पीछे तर्क दिया जाता है कि (प्राचीन काल में) शीतकाल में पहाड़ों में कृषि व अन्य कार्य सीमित होते थे। ऐसे में लंबी रातों में मनोरंजन के साधन के तौर पर भी होली गायकी के रात-रात लंबे दौर चलते थे।

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यह परंपरा आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में देखी जाती है। कुमाउंनी होली में विभिन्न प्रहरों में अलग-अलग शास्त्रीय रागों पर आधारित होलियां गाई जाती हैं। शुरुआत बहुधा धमार राग से होती है, और फिर सर्वाधिक काफी व पीलू राग में तथा जंगला काफी, सहाना, बिहाग, जैजैवन्ती, जोगिया, झिंझोटी, भीम पलासी, खमाज व बागेश्वरी सहित अनेक रागों में भी बैठकी होलियां विभिन्न पारंपरिक वाद्य यंत्रों के साथ गाई जाती हैं।

Tags: Happuy HoliHoliholi 2021Kumauni Classical HoliUttrakhand News
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