लोकसभा चुनाव 2019 : मोदी की एक बार फिर जीत के ‘शाह’ हैं अमित

अमित शाहअमित शाह
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नई दिल्ली। ऐतिहासिक जीत के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भले इस समय तमाम आकर्षण के केंद्र में हैं लेकिन विरोधी भी इस बात को मान रहे हैं कि यह भाजपा अध्यक्ष अमित शाह हैं जो इस ऐतिहासिक समय के पीछे की मुख्य ताकत हैं।

भाजपा ने मास्टर रणनीतिकार अमित शाह की विजयी रणनीतियों  में लोकसभा चुनाव में एकतरफा जीत दर्ज की

जम्मू एवं कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री व पीडीपी नेता महबूबा मुफ्ती ने ट्वीट किया कि कांग्रेस के लिए समय एक अमित शाह की तलाश करने का आ गया है। जम्मू एवं कश्मीर के एक और पूर्व मुख्यमंत्री व भाजपा के कड़े आलोचक उमर अब्दुल्ला ने मोदी और शाह को एक विजयी गठबंधन बनाने और ‘बेहद पेशेवर अभियान’ चलाने पर बधाई दी। शाह का चुनाव प्रबंधन देश के राजनैतिक लोककथा का हिस्सा बन गया है, इस छवि का निर्माण मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में भाजपा की हार के छह महीने के अंदर ही दोबारा से कर लिया गया है। भाजपा ने अपने मास्टर रणनीतिकार अमित शाह की विजयी रणनीतियों की मदद से इन तीनों ही राज्यों में लोकसभा चुनाव में एकतरफा जीत दर्ज की है।

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अगर 2014 की मोदी की जीत आंखें खोलने वाली थी तो 2019 की जीत आंखें फाड़ देने वाली

अगर 2014 की मोदी की जीत आंखें खोलने वाली थी तो 2019 की जीत आंखें फाड़ देने वाली है। शाह इस बार पर्दे के पीछे के रणनीतिकार से कहीं अधिक रहे। वह गांधीनगर से प्रत्याशी भी थे और उनकी सार्वजनिक अपील प्रधानमंत्री के बाद दूसरे नंबर पर थी। अनुमान लगाए जा रहे हैं कि मोदी के दूसरे कार्यकाल में शाह केवल पार्टी के कामकाज को संभालने से कहीं अधिक बड़ी भूमिका निभाएंगे। अगर उन्हें मंत्री बनाया जाता है तो उन्हें विदेश, गृह, वित्त या रक्षा में किसी मंत्रालय का प्रभार मिल सकता है।

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शाह ने उन 120 सीटों के वैज्ञानिक आकलन का आदेश दिया जहां भाजपा 2014 में हारी थी

लोकसभा चुनाव प्रचार समाप्त होने के बाद नरेंद्र मोदी पहली बार प्रेस कांफ्रेंस में आए लेकिन उन्होंने सवालों के जवाब नहीं दिए। अमित शाह ने सभी सवालों के जवाब दिए जो भाजपा में कंट्रोल व कमान की व्यवस्था की तरफ इशारा करने के लिए काफी था। भाजपा ने 2019 के चुनाव की तैयारियां अन्य दलों से बहुत पहले से कर दी थी। शाह ने उन 120 सीटों के वैज्ञानिक आकलन का आदेश दिया जहां भाजपा 2014 में हारी थी। पूर्वोत्तर के साथ-साथ सात राज्यों आंध्र, केरल, असम, ओडिशा, तमिलनाडु, तेलंगाना और पश्चिम बंगाल पर विशेष जोर दिया गया जहां पार्टी अपेक्षाकृत मजबूत नहीं रही है। पूर्वोत्तर, पश्चिम बंगाल और ओडिशा में इसका नतीजा देखने को मिल रहा है।

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