नियुक्तियों में भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ रहा लखनऊ विश्वविद्यालय

लखनऊ विश्वविद्यालय
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लखनऊ। राष्ट्रीय भागीदारी आन्दोलन के अध्यक्ष पीसी कुरील ने 24 मई से लखनऊ विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर, एसोसिएट प्रफेसर, प्रवक्ता व प्रोफेसर के पद पर होने वाले साक्षात्कार पर आपत्ति जताई है। साथ ही तत्काल प्रभाव से साक्षात्कार पर रोक लगाने की मांग भी की है।

लखनऊ विश्वविद्यालय की चयन प्रक्रिया में दलितों व पिछड़ो का आरक्षण समाप्त कर दिया

श्री कुरील ने कहा कि इस चयन प्रक्रिया में दलितों व पिछड़ो का आरक्षण समाप्त कर दिया गया है और विश्वविद्यालय के कुलपति व कुलाधिपति इसमें न्याय नहीं कर रहे हैं। वर्षो से इस विभाग में एक पद एससी, एसटी के लिए आरक्षित था और उस पद पर एक एससी व्यक्ति अध्यापन का कार्य भी कर रहे थे। जो अब दूसरे विश्वविद्यालय में अध्यापन का कार्य कर रहे हैं। खली पद पर मौके की ताक में लगे लोगों ने रोस्टर प्रणाली का बहाना बनाकर आरक्षण खत्म कर दिया। अब उस पद पर 24 मई से साक्षात्कार होने जा रहा है। उन्होंने इस तरह से होने जा रही नियुक्ति को षड्यंत्र करार दिया है। साथ ही इसे संविधान की मूलभावना के विपरीत कार्य किया जाना भी बताया है।

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दलित प्रेम का ढिंढोरा रही है योगी  सरकार

उन्होंने कहा कि वर्तमान सरकार दलित प्रेम का ढिंढोरा पीट रही है, लेकिन दलितों के लिए काम नहीं कर रही है। उन्होंने कहा कि लखनऊ विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग की चयन प्रक्रिया में कई और भी कमियां निकल कर सामने आ रही हैं। प्रोफेसर व एसोसिएट प्रोफेसर के पद पर केवल दो-दो ही उम्मीदवारों को साक्षत्कार के लिए बुलाया गया है। यह विधिक रूप से गलत है। कम से कम प्रत्येक पद के सापेक्ष तीन-तीन योग्य उम्मीदवारों का होना अनिवार्य है। यह चयन प्रक्रिया तीन दिनों तक चलेगी जो गलत है। क्योंकि इतने दिन तक चयन प्रक्रिया चलने में भ्रष्टाचार होने की सम्भावना है।

खामियों को करें दूर करें लखनऊ विश्वविद्यालय के कुलपति व कुलाधिपति

साथ ही अभी से विषय विशेषज्ञ के नाम भी सामने आना भी गलत है। उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय के कुलपति व कुलाधिपति से मांग की है कि इस पर तत्काल प्रभाव से रोक लगायी जाये। प्रक्रिया की खामियों को दूर करने कि बाद ही इसे आगे बढाया जाये।

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