मिशन 2019 : क्या आप जानते हैं कौन है किस धर्म की पार्टी

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कहने को तो भारत एक लोकतान्त्रिक देश है पर अगर इसे धर्म तंत्र कहा जाये तो कुछ गलत नहीं होगा। क्योंकी यहां हर पार्टी किसी न किसी धर्म को लेकर चलती है और उस धर्म को लोगों से अपना वोट बैंक पक्का करती है। इधर बीजेपी कांग्रेस को मुस्लिमो का रहनुमा बताती है तो वहीं कांग्रेस, भाजपा को सिर्फ हिन्दुओं का हितुआ बताती है।

22 से अधिक राज्यों में हैं भाजपा या एनडीए का शासन

भाजपा बार-बार यह दावा करती है कि देश को वह कांग्रेस मुक्त कर रही है। जैसे-जैसे राज्यों में वह सत्ता हासिल करती गई या हथियाती गई, उसने अपने दावे को और पुरजोर तरीके से जनता के सामने रखना शुरु कर दिया कि देश में अब कांग्रेस का कोई नामलेवा नहीं है। 22 से अधिक राज्यों में भाजपा या एनडीए का शासन है। प्रशासन, पुलिस, जांच एजेंसियां यहां तक कि मीडिया का बड़ा हिस्सा भी भाजपा के प्रभाव में है, फिर भी भाजपा को लगता है कि कांग्रेस देश में सांप्रदायिक तनाव खड़ा कर सकती है। कम से कम रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण के बयान से तो ऐसा ही लगता है।

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निर्मला सीतारमण के कथन में कई विरोधाभास

वैसे देश के आंतरिक मामलों पर इस तरह की टिप्पणी या चेतावनी गृहमंत्री की ओर से आनी चाहिए थी, लेकिन मोदी राज में सब गड्ड-मड्ड नजर आता है। काम किसी का होता है, बयान कोई और देता है। बहरहाल, निर्मला सीतारमण ने कहा कि अगर कांग्रेस पार्टी 2019 के चुनाव धर्म के आधार पर लडऩा चाह रही है,तो हमें डर है कि अब से सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील इलाकों में अगर तनाव होता है तो जिम्मेदारी कांग्रेस की होगी।  उनके इस कथन में कई विरोधाभास हैं।

अभी तो कांग्रेस का घोषणा पत्र भी नहीं आया

पहली बात, 2019 के लिए कांग्रेस का कोई घोषणापत्र अभी सामने नहीं आया है, फिर न जाने कैसे भाजपा नेता ने मान लिया कि कांग्रेस धर्म के आधार पर चुनाव लडऩा चाह रही है। दूसरी बात, अगर ऐसा है भी तो भाजपा को इस बात पर आपत्ति कैसे जता सकती है? क्योंकि उसकी तो राजनीति का प्रस्थान बिंदु ही धर्म रहा है। राम मंदिर का मुद्दा लेकर भाजपा देश की राजनीति में आगे बढ़ी और आज सत्ता उसके पास है। अब भी रोजाना ही राम मंदिर की बात उसके नेता किसी न किसी मंच से करते ही हैं।

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क्या 2019 में साम्प्रदायिक हिंसा हो सकती है

तीसरी बात, अगर देश में सांप्रदायिक तनाव की स्थिति बनती है, तो भाजपा हाथ पर हाथ धरे क्यों बैठी है? क्यों वह सांप्रदायिक सद्भाव का माहौल कायम करने की कोशिश नहीं कर रही? क्या वह इस बात का इंतजार कर रही है कि कब सांप्रदायिक तनाव हो और कब वह कांग्रेस को इसका जिम्मेदार ठहराए? क्या निर्मला सीतारमण के इस बयान से ऐसा प्रतीत नहीं होता, मानो वह जानती है कि 2019 तक देश में सांप्रदायिक हिंसा होने वाली है और वह इसका ठीकरा कांग्रेस के सिर फोडक़र खुद लाभ लेने की जुगत में है। दरअसल कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की मुस्लिम बुद्धिजीवियों से मुलाकात की रणनीति भाजपा को बेचौन कर रही है।

राहुल के मुस्लिम बुद्धिजीवियों से मिलने पर मोदी ने उठाये सवाल

आम चुनाव के पहले मोदीजी भी सरकार के कार्यक्रमों के नाम पर उसके तथाकथित लाभार्थियों को संबोधित कर रहे हैं। उन्हें बता रहे हैं कि पिछले चार सालों में उनकी सरकार ने कितने काम किए हैं। शायद धार्मिक आधार पर विभिन्न समुदायों से मुलाकात की योजना उन्होंने चुनाव के वक्त बना कर रखी हो, लेकिन इसमें कांग्रेस आगे निकलती दिखी तो भाजपा को यह बात इतनी खटकी कि उसने कांग्रेस पर मुस्लिमों की पार्टी होने का ठप्पा ही लगा दिया।

राहुल गांधी ने कुछ मुस्लिम बुद्धिजीवियों से जो मुलाकात की, उसमें कई तरह की बातें हुई होंगी, लेकिन एक उर्दू अखबार में उनके हवाले से सुर्खी छपी कि- हां, कांग्रेस मुस्लिमों की पार्टी है। बस इस एक लाइन ने इस वक्त देश की राजनीति में कई सवाल और आशंकाएं खड़ी कर दीं।

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युवराज शब्द से शायद नहीं चल रहा मोदी का काम

आजमगढ़ से प्रधानमंत्री मोदी ने कांग्रेस पर तंज कसा कि श्रीमान नामदार ने कहा कांग्रेस मुस्लिमों की पार्टी है। मुझे आश्चर्य नहीं हो रहा है। पहले जब मनमोहन सिंह की सरकार थी तो स्वयं प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा था कि प्राकृतिक संसाधनों पर पहला अधिकार मुसलमानों का है। मोदीजी और भाजपा के लिए अब युवराज शब्द शायद काम का नहीं रहा, इसलिए राहुल गांधी के लिए नामदार शब्द इस्तेमाल हो रहा है। अभिनेता राजकुमार का मशहूर संवाद है कि जिनके घर शीशों के होते हैं, वो दूसरों पर पत्थर नहीं उछाला करते।पिछले चार सालों में भाजपा के कितने नेताओं ने यह कहा है कि भारत को हिंदू राष्ट्र बनाएंगे। यहां रहने वाले सभी हिंदू हैं। हिंदुत्व की

ज्वलंत मुद्दों की जगह खोखली चीजों पर हो रही राजनीति

राजनीति भाजपा का यूएसपी है, लेकिन मुस्लिमों की तरफदारी को अपराध की तरह पेश किया जा रहा है। राजनैतिक शुचिता और मर्यादा के मुताबिक तो न भाजपा, न कांग्रेस न किसी अन्य दल को किसी भी धर्म या जाति या संप्रदाय के आधार पर वोट मांगने चाहिए या राजनीति करनी चाहिए। लेकिन भारत की विडंबना है कि ये तमाम वर्गीकरण खत्म होने की जगह बढ़ते ही जा रहे हैं। इसके लिए राजनेताओं से ज्यादा जनता ही जिम्मेदार है, जो अपनी बुनियादी जरूरतों की पूर्ति से ज्यादा धर्म के सवाल पर भावुक हो जाती है और राजनीतिक दल उसकी भावुकता का फायदा उठाते हैं।

भाजपा हिंदुओं की पार्टी है या कांग्रेस मुस्लिमों की, इस सवाल का जवाब मिलने से क्या जनता को महंगाई, बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य, भोजन,आवास, बिजली, पानी, महिला सुरक्षा, आतंकवाद, नक्सलवाद जैसे सैकड़ों ज्वलंत मुद्दों के जवाब मिल जाएंगे? शायद नहीं, लेकिन इन जरूरी मुद्दों पर बात की जगह जनता का ध्यान खोखले सवालों में उलझाया जा रहा है। बेहतर है, हम अभी से संभल जाएं।

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