मोदी सरकार की कैशलेस और बैंकिंग व्यवस्था को लगा बड़ा झटका

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नई दिल्ली। पीएम मोदी की अति महत्वाकांक्षी योजना देश को कैशलेस बनाना था, लेकिन देश की अर्थव्यवस्था को कैशलेस बनाने के रास्ते पर चली  मोदी सरकार को झटका लगा है। सरकारी बैंकों में घोटाले और कुव्यवस्था से देश को 85.370 करोड़ का घाटा हुआ है। जो कि  कैशलेस और बैंकिंग व्यवस्था को बड़ा झटका माना जा रहा है।

बैंकिंग व्यवस्था को लेकर पीएम मोदी लोगों के भरोसे को बनाए रख पाएंगे?

ऐसे में  सवाल यह उठता  है कि  क्या बैंकिंग व्यवस्था को लेकर पीएम मोदी लोगों के भरोसे को बनाए रख पाएंगे?  दूसरा सवाल यह कि सदियों से धन दौलत और नकदी को सहेजने की आम आदमी की धारणा को पीएम मोदी और उनके खास सलाहकार अरूण जेटली समाप्त कर पाएगें ? ये दोनों ही प्रश्न विचारणीय और जबाबदेही से भरे है। पंजाब नेशनल बैंक के हाल में सामने आए घोटाले ने सरकारी बैंकों, बैंकों का ऑडिट करने वाली संस्थाओं और बैंकों के कामकाज पर निगरानी रखने वाले बैंकिंग नियामक भारतीय रिजर्व बैंक की क्षमता पर बड़ा प्रश्नचिन्ह लगा दिया है।

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21 सार्वजनिक बैंकों में 19 बैंकों को हुआ घाटा

मिली जानकारी के अनुसार सार्वजनिक बैंकों को इस वर्ष मार्च में खत्म हुए  वित्त वर्ष के दौरान कुल 87,300 करोड़ रुपये का घाटा हुआ है। जबकि पिछले वित्त वर्ष के दौरान 21 सार्वजनिक बैंकों में से सिर्फ इंडियन बैंक और विजया बैंक मुनाफे में रहे, जबकि बाकी 19 बैंकों को घाटे का सामना करना पड़ा। इनमें पीएनबी और आइडीबीआइ बैंक की हालत सबसे ज्यादा खराब रही। आंकड़ों के मुताबिक इंडियन बैंक के 1,258.99 करोड़ रुपये और विजया बैंक के 727.02 करोड़ रुपये मुनाफे को घटा दें, तो पिछले वित्त वर्ष में सार्वजनिक बैंकों का शुद्ध घाटा 85,370 करोड़ रुपये रहा।

एसबीआइ 12 एनपीए खातों की करेगा नीलामी

देश के सबसे बड़े सार्वजनिक कर्जदाता भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआइ) ने कहा है कि वह इस महीने 12 एनपीए खातों की नीलामी करेगा। इससे बैंक को 1,325 करोड़ रुपये रिकवरी की उम्मीद है। एक सूचना में एसबीआइ ने कहा कि नीलामी ऑनलाइन माध्यम से 25 जून को होगी।

जनता के हाथ में मुद्रा का स्तर 18.5 लाख करोड़ रुपए से ऊपर पहुंच गया है जो इसका अब तक अधिकतम स्तर

मोदी की अति महात्कांक्षी योजना देश को कैशलेस बनाना था,लेकिन इस समय देश में इस समय जनता के हाथ में मुद्रा का स्तर 18.5 लाख करोड़ रुपए से ऊपर पहुंच गया है जो इसका अब तक अधिकतम स्तर है। यह नोटबंदी के दौर की तुलना में दोगुने से अधिक है। नोटबंदी के बाद जनता के हाथ में मुद्रा सिमट कर करीब 7.8 लाख करोड़ रुपए रह गई थी। आरबीआई के मुताबिक, इस समय चलन में कुल मु्द्रा 19.3 लाख करोड़ रुपए से अधिक है जबकि नोटबंदी के बाद यह आंकड़ा लगभग 8.9 लाख करोड़ रुपए था। चलन में मौजूद कुल मुद्रा में से बैंकों के पास पड़ी नकदी को घटा देने पर पता चलता है कि चलन में कितनी मुद्रा लोगों के हाथ में पड़ी है।

मोदी सरकार के आने से पहले लोगों के पास लगभग 13 लाख करोड़ रुपए की थी मुद्रा

आरबीआई द्वारा जारी हालिया आंकड़ों के मुताबिक, कुल 15.44 लाख करोड़ रुपए की अमान्य मुद्रा में से 30 जून 2017 तक लोगों ने 15.28 लाख करोड़ रुपये की मुद्रा बैंकों में जमा करवाई। ताजा आंकड़ों के मुताबिक, मई 2018 तक लोगों के पास 18.5 लाख करोड़ रुपए से अधिक की मुद्रा थी, जो कि एक वर्ष पहले की तुलना में 31 प्रतिशत अधिक है। यह 9 दिसंबर 2016 के आंकड़े 7.8 लाख करोड़ रुपए के दोगुने से अधिक है। नोटबंदी से पहले, लोगों के पास करीब 17 लाख करोड़ रुपए की मुद्रा थी। चौंकाने वाली बॉत यह कि आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि मई 2014 में मोदी सरकार के आने से पहले लोगों के पास लगभग 13 लाख करोड़ रुपए की मुद्रा थी। एक वर्ष में यह बढक़र 14.5 लाख करोड़ से अधिक और मई 2016 में यह 16.7 लाख करोड़ हो गई। अक्तूबर 2016 में यह 17 लाख करोड़ से अधिक हो गई।

रोजगार देने की जगह नोटबंदी ने निगल लिये हजारों रोजगार

यानि सरकारी बैंको के घाटे और नोटबंदी के बाद कैशलेस की स्थिति इस बॉत का प्रमाण है कि मोदी सरकार बैंकिंग व्यवस्था और कैशलेस व्यवस्था में पूरी तरह फेल रही। इससे  एक बॉत साफ़  है कि मोदी सरकार ने जिन योजनाओं का भारी प्रचार-प्रसार किया वे यर्थाथ  के धरातल पर औंधे मुंह गिरी है हम चाहे स्वच्छता अभियान की बॉत करे या फिर बुलेट ट्रेन या फिर हर साल करोड़ों लोगों को रोजगार मुहैया कराने की बॉत करे। स्वच्छता अभियान फोटो खिचवाने तक सिमट गया। बुलेट ट्रेन आई नही और जो ट्रेन व्यवस्था है वह पटरी से उतर गई। रोजगार देने की जगह नोटबंदी ने हजारों रोजगार निगल लिये।

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