बैक्टीरिया खोलेंगे अब सीवर लाइन का चोक, जय सिंह नरवरिया का अद्भुत फार्मूला

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जय सिंह नरवरियाबैक्टीरिया खोलेगा अब सीवर लाइन का चोक, जय सिंह नरवरिया का अद्भुत फार्मूला

ग्वालियर। प्रोजेक्ट ऑफिसर जय सिंह नरवरिया ने सस्ते बायोटॉयलेट का फॉर्मूला दे कर देश में टॉइलेट की समसिया का समाधान करने की कोशिश करी थी। वहीं हमारे देश में सीवर लाइन चोक होने से फैलने वाली गंदगी से जूझ रहे देश के नगर निगमों को मुश्किलों का सामना अकसर करना पड़ता है। लेकिंग जय सिंह नरवरिया ने एक ऐसी बायोटॉयलेट वाले बैक्टीरिया को डेवलप किया है जिससे चोक पड़े सीवर को फिर से काम करने की हालत में लाया जा सकता है।

एक तरफ जहां भारत देश की आबादी दुनिया में दूसरे नंबर पे है तो वहीं यहाँ की आबादी के ज़रिये फैलाया गया कूड़ा और कचरा भी अधिकतम मात्र में होता है। जिसको ठिकाने लगाने के लिए भारतिय नगर निगम को काफी कड़ी मशक्कत का सामना करना पड़ता है। ऐसी ही परेशानियों से जूझना के लिए ग्वालियर जिला पंचायत के प्रोजेक्ट ऑफिसर जय सिंह नरवरिया पहले भी अपना महतेयपूर्ण योगदान देश को दे चूके हैं।

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इसमें 20 तरह के बैक्टीरिया हैं, जिनके एक सम्मिश्रण से इसको तैयार किया गया है। इस बैक्टीरिया को एनाबोरिक माइक्रोबिअल कंसोसिएशन नाम दिया गया है। चोक पड़े सीवर को एक तरह से काटते हुए यह लाइन क्लियर कर देगा। सीवर में डालने के 48 घंटे में ही बैक्टिीरिया अलर्ट हो जाता है और अपना काम शुरू कर देता है।

जय सिंह नरवरिया ने अपने घर और आसपास इस बैक्टीरिया को ट्रायल के तौर पर सीवर लाइन में डाला तो सैंमपल ट्रायल में यह सफल रहा। अब नगर निगम कमिश्नर विनोद शर्मा से बात कर इस फॉर्मूले को शेयर किया गया है। और शहर का एक ऐसा वार्ड मांगा गया है, जहां सीवर चोक की समस्या ज्यादा रहती हो। निगम निगम कमिश्नर ने सहमति दे दी है और जल्द इसका बड़े लेवल पर प्रयोग किया जाएगा।

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जय सिंह नरवरिया ने अपनी इस अद्भुत खोज को लेकर इंटरनेट फोन कॉल्स के जरिये वैज्ञानिकों और शोध संस्थानों से संपर्क किया और यह जानने की कोशिश करी की क्या यह कंसेप्ट कहीं इस्तिमाल में है या नहीं। विश्वभर के चुनिंदा विशेषज्ञों से जय सिंह नरवरिया ने खुद बात की, लेकिन कहीं भी यह बैक्टीरिया आधारित फॉर्मूले के इस्तिमाल की जानकारी नहीं मिली। गौरतलब बात यह है कि जय सिंह नरवारिया ने महज 10 से 12 हजार रुपये अधिकतम लागत में तैयार बायोटॉयलेट का फॉर्मूला देश को दिया था, जिसे प्रशासन सहित दूसरे राज्यों में भी बहुत पसंद किया गया था। अब देखना यह है की जय सिंह नरवरिया का यह नई खोज देश के लिए कितना काम आटी है और कहीं इसके कोई दुष्प्रभाव तो नहीं है।

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