सेना के हाथ में अप्रत्यक्ष ‘‘हथकड़ी’’ ठीक नहीं

रमज़ान
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प्रेम शर्मा

आतंकी का कोई धर्म नहीं होता। ऐसे में धर्म के नाम पर रमज़ान के मौके पर संघर्ष विराम की घटना के बाद दो आतंकी हमले होना इस बात का प्रमाण है कि केन्द्र सरकार ने दूसरों को खुश करने लिए देश की सेना के हाथों पर अप्रत्यक्ष हथकड़ी लगा दी है। जो देश हित में नही है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दौरे से पहले घाटी में स्थायी शांति की तलाश का संदेश देने के लिए केंद्र सरकार ने रमजान के दौरान आतंकियों के खिलाफ अभियान बंद करने का फैसला किया है। लेकिन साथ ही यह भी साफ कर दिया है कि यदि सुरक्षा बलों या आम नागरिक पर आतंकी हमला करते हैं, तो उसका मुंहतोड़ जबाव दिया जाएगा। यही नहीं, सीमा पर घुसपैठियों के खिलाफ कार्रवाई भी पहले की तरह जारी रहेगी। गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने जम्मू एवं कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती को केंद्र के फैसले के बारे में बता दिया है।

गृह मंत्रलय ने कहा है, ‘मुस्लिम समाज के लोगों को रमज़ान के दौरान शांति व्यवस्था में सहयोग देने के लिए घाटी में सुरक्षा बलों को कोई नया अभियान शुरू नहीं करने का निर्देश दिया गया है। वहीं अगले ट्वीट में मंत्रलय ने साफ कर दिया है कि सुरक्षा बलों के पास कश्मीर में लोगों की सुरक्षा करने और खुद पर हुए हमलों का जवाब देने के लिए किसी भी तरह का फैसला लेने का अधिकार है और वह इसके लिए पूरी तरह से स्वतंत्र हैं। केंद्र ने उम्मीद जताई है कि सभी लोग इसमें सहयोग करेंगे, ताकि मुस्लिम समाज के भाई-बहन बिना किसी व्यवधान के रमज़ान का पाक महीना मना सकें। वहीं केंद्र ने यह भी साफ कर दिया है कि यह सीजफायर नहीं है, बल्कि अभियान का निलंबन है। यानी रमज़ान के बाद आतंकियों के खिलाफ अभियान फिर से जारी रहेगा। गृह मंत्रलय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि रमजान के पवित्र महीने में अभियान बंद करने का फैसला केंद्र सरकार का अपना है और इसका महबूबा मुफ्ती की मांग से कोई लेना-देना नहीं है।

गौरतलब है कि महबूबा मुफ्ती ने इसी तरह की मांग की थी, लेकिन उनकी सरकार के उपमुख्यमंत्री और भाजपा नेता कवींद्र गुप्ता ने इसे खारिज कर दिया था। महबूबा मुफ्ती ने भी इस फैसले के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री राजनाथ सिंह को धन्यवाद दिया है। गृह मंत्रलय के वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, अभियान रोककर केंद्र घाटी के लोगों को यह संदेश चाहता है कि सरकार वहां स्थायी शांति के पक्ष में है, लेकिन चंद लोग इसके खिलाफ हैं। इसीलिए सुरक्षा बलों और आम नागरिकों पर हमला करने वाले आतंकियों के खिलाफ अभियान का विकल्प खुला रखा गया है। लेकिन केंद्र सरकार के रमज़ान माह में जम्मू-कश्मीर में एकतरफा संघर्ष विराम की घोषणाके बीच आतंकियोंने दक्षिण कश्मीर में दोजगह सेना पर हमले किए। दोनों हमलों में सुरक्षाबलों की जवाबी कार्रवाई के बाद आतंकी भाग निकले। वहीं, श्रीनगर के डाउन टाउन में हुए ग्रेनेड हमले में तीन लोग घायल हो गए।

सुरक्षा बलों को रमज़ान के दौरान जम्मू-कश्मीर में आतंकियों के खिलाफ कोई अभियान न चलाने के निर्देश देकर केंद्र सरकार ने एक तरह से मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती की संघर्ष विराम की मांग को ही स्वीकार करने का काम किया है। केंद्रीय गृह मंत्रलय भले ही संघर्ष विराम शब्द का उल्लेख करने से बचा हो, लेकिन यह तय है कि उसके फैसले को इसी तरह परिभाषित किया जाएगा। इसमें दोराय नहीं कि यह एक जोखिम भरा फैसला है। इसकी पुष्टि गृह मंत्रलय के फैसले के बाद कश्मीर में सेना की एक टुकड़ी पर आतंकियों के हमले से होती है। चूंकि मोदी सरकार इससे अनभिज्ञ नहीं हो सकती कि जब वाजपेयी सरकार के समय रमज़ान के महीने में सुरक्षा बलों को इसी तरह आतंकियों के खिलाफ अभियान चलाने से रोका गया था तो उससे कुछ हासिल नहीं हुआ था इसलिए यह उम्मीद की जाती है कि उसने कुछ सोच-समझ कर ही यह फैसला लिया होगा।

जो भी हो, केंद्र सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि कश्मीर में सक्रिय आतंकी और उपद्रवी गुट उसके फैसले का लाभ उठाकर खुद की ताकत बढ़ाने न पाएं। नि:संदेह इस फैसले से ऐसा कोई संदेश भी नहीं उभरना चाहिए कि भारत के पास कश्मीर मसले के समाधान की कोई ठोस नीति नहीं है या फिर उसे उन्हीं उपायों पर निर्भर रहना पड़ रहा है जो पहले भी आजमाए जा चुके हैं। मुश्किल यह है कि सुरक्षा बलों को उपदेश देने वाले पत्थरबाजों को हिदायत देने में संकोच बरतते हैं। केंद्र सरकार को इसके लिए भी तैयार रहना चाहिए कि यदि उसकी सदिच्छा के अनुकूल परिणाम सामने नहीं आते तो उसका अगला कदम क्या होगा?

यह तैयारी इसलिए रखनी होगी, क्योंकि जम्मू-कश्मीर के लिए विशेष वार्ताकार की नियुक्ति करने और पत्थरबाजों को माफी देने के फैसले के कोई सकारात्मक परिणाम सामने नहीं आए हैं। नि:संदेह इसका एक बड़ा कारण यह है कि कश्मीर में अलगाववादी एवं पाकिस्तान परस्त तत्वों पर कहीं कोई लगाम नहीं लग सकी है। यह ठीक है कि रमजान के दौरान आतंक विरोधी अभियान के स्थगन के बाद भी सुरक्षा बल आतंकी हमलों की स्थिति में आतंकियों का मुंहतोड़ जवाब देने के लिए स्वतंत्र होंगे, लेकिन उन्हें ऐसा करने के साथ ही सीमा पार से आतंकियों की घुसपैठ रोकने के लिए भी अतिरिक्त चौकसी बरतनी होगी। सीमा पार से पाकिस्तान प्रशिक्षित आतंकियों की घुसपैठ बढऩे का अंदेशा इसलिए है, क्योंकि पाकिस्तान यह बिल्कुल भी नहीं चाहेगा कि भारत सरकार की कश्मीर के हालात सुधारने वाली कोई पहल कामयाब हो।

केंद्र सरकार के रमज़ान माह में जम्मू-कश्मीर में एकतरफा संघर्ष विराम की घोषणा के बीच आतंकियों ने दक्षिण कश्मीर में दो जगह सेना पर हमले किए। दोनों हमलों में सुरक्षाबलों की जवाबी कार्रवाई के बाद आतंकी भाग निकले। संघर्ष विराम की घोषणा के तत्काल बाद इस तरह की घटनाएं इस बॉत का संकेत है कि पाकिस्तान अपनी हरकतों से बाज नही आएगा। वैसे भी पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के बयान के बाद पाकिस्तान सुलग रहा है ऐसे में रमज़ान के दौरान पत्थरबाजी या आतंकी घटनाएं नही होगी इसकी गारन्टी कौन लगा। सरकार को दूसरों खुश करने के चक्कर में ऐसा कोई फैसला नही करना चाहिए जिससे देश का अहित हो।

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