रक्षा बंधन पर ‘पत्थर युद्ध’ के लिए रणबांकुरे हैं तैयार

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बग्वाल मेला कमेटी के संरक्षक खीम सिंह लमगड़िया, भुवन चंद्र जोशी और कीर्ति वल्लभ जोशी ने यूनीवातार् को बताया कि यह अजीबो-गरीब पंरपरा है जिसमें एक पक्ष दूसरे पक्ष पर पत्थर फेंकर बग्वाल मनाता है और अपनी आराध्य देवी को खुश करने लिए खूनी खेल में हिस्सा लेता है। बग्वाल में रणबांकुरे परस्पर पत्थरों की बरसात करते हैं और इसमें कई लोग जख्मी हो जाते हैं। यह आयोजन हर साल होता है इसलिए घायलों को प्राथमिक उपचार मुहैया करने के लिये सरकारी अमला मुस्तैद रहता है।

उन्होंने बताया कि बग्वाल पर्व हर साल राखी के त्यौहार के अवसर पर आयोजित किया जाता है और इसे देखने के लिए आसपास के साथ ही बाहर से भी बड़ी संख्या में लोग आते हैं। यह खेल उत्तराखंड में कुमाऊं मंडल के चंपावत जिले के देवीधूरा  में आयोजित होता है। इस बग्वाल को असाड़ी कौथिक के नाम से  भी जाना जाता है। इसका आयोजन देवीधूरा के खोलीखांड मैदान में होता है और इस पत्थर युद्ध में चंपावत के चार खाम तथा सात थोक के लोग हिस्सा लेते हैं।

कमेटी के सदस्यों ने बताया कि प्रचलित मान्यताओं के अनुसार पौराणिक काल में चार खामों के लोग अपनी आराध्या बाराही देवी को मनाने के लिए हर साल नर बलि देते थे। एक साल एक खाम का नंबर आता था। एक बार नर बलि देने का नंबर चमियाल खाम का था। एक बार चमियाल खाम के एक परिवार को नर बलि देनी थी। परिवार में एक वृद्धा और उसका एक पौत्र था। वृद्धा ने अपने पौत्र की रक्षा के लिए मां बाराही की स्तुति की तो मां बाराही ने वृद्धा को मंदिर परिसर में स्थित खोलीखांड मैदान में बग्वाल (पत्थर युद्ध) खेलने को कहा। तब से नर बलि की जगह बग्वाल की परंपरा शुरू हो गयी।

परंपरा के अनुसार बग्वाल में चारों खामों के रणबांकुरे शामिल होते हैं। लमगड़िया तथा  बालिग खाम एक तरफ और गहड़वाल तथा चमियाल खाम के रणबांकुरे दूसरी तरफ होते हैं। दोनों पक्षों के रणबांकुरे सज धजकर और हाथों में पत्थर लेकर आते हैं। पुजारी के संकेत मिलते ही पत्थरों की वषार् शुरू हो जाती है। दोनों ओर के रणबांकुरे पूरी ताकत से एक दूसरे पर पत्थर फेंकते हैं और पुजारी का आदेश मिलने तक यह सिलसिल जारी रहता है। पत्थर वषार् से बचने के लिए रणबांकुरे छत्तड़े यानी बांस से बनी ढाल का इस्तेमाल करते हैं।

कमेटी के लोगों ने बताया कि सभी रणबांकुरे पहले ही मंदिर में आ जाते हैं और मां बाराही का आशीवार्द लेते हैं। बग्वाल के अगले दिन मंदिर में मां बाराही की भव्य पूजा अर्चना होती है। उसके अगले दिन मां की शोभायात्रा निकाली जाती है और इसके साथ ही ‘रणबांकुरों का खेल’ खत्म हो जाता है।

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