बढ़ते अपराध और नागरिकों के बीच असुरक्षा का बोध एक गंभीर समस्या

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देश की राजधानी दिल्ली में बढ़ते अपराध और नागरिकों के बीच असुरक्षा का बोध एक गंभीर समस्या है। यहां की बढ़ती आबादी और बढ़ते अपराध को देखते हुए सिटीजन फोरम फॉर सिविल राइट्स नामक एक गैर-सरकारी संगठन ने हाईकोर्ट में एक याचिका दायर की थी, जिसमें दिल्ली पुलिस में जवानों की स्वीकृत संख्या को बढ़ाने और अतिरिक्त पुलिसकर्मियों की नियुक्ति किए जाने का आदेश देने की मांग की गई। याचिका पर सुनवाई करते हुए दिल्ली हाईकोर्ट में चीफ जस्टिस डीएन पटेल और जस्टिस हरिशंकर की पीठ ने बड़ी मौजूं टिप्पणी की, उन्होंने हम अपने जजों के स्वीकृत पदों को तो भर नहीं पा रहे हैं। इनको कहां से आदेश दें।

हालांकि, पीठ ने आगे कहा कि पुलिसकर्मियों को पर्याप्त और उचित प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। इस याचिका से पुलिस बल की स्थिति में कितना सुधार आता है और अपराध पर किस हद तक अंकुश लग पाता है, यह तो बाद में ही पता चलेगा, लेकिन इस बहाने दो ज्वलंत प्रश्नों पर विचार करने और हालात सुधारने का मौका सरकार को जरूर मिल गया है।

कानून व्यवस्था का आईना दिखाती टिप्पणी

हिंदुस्तान जैसे महादेश में पुलिस कर्मियों और न्यायाधीशों की कमी बड़ी चिंता का विषय होना चाहिए, लेकिन इस पर कोई गंभीर पहल नहीं होती, अलबत्ता राजनीति जरूर होती है। अभी गृहमंत्रालय की ही एक रिपोर्ट आई कि देश में पुलिस के 5.28 लाख पद खाली पड़े हैं। यानि पद स्वीकृत होते हुए भी पुलिसकर्मियों की भर्ती नहीं हुई है।

एक ओर बेरोजगारी के बढ़ते आंकड़े हैं, दूसरी ओर स्वीकृत पद भी खाली पड़े हैं। पुलिस बल की कमी से सबसे ज्यादा जूझने वाले राज्यों में उप्र है, इस के बाद दूसरे नंबर पर बिहार, तीसरे नंबर पर पश्चिम बंगाल और चौथे नंबर पर तेलंगाना राज्य है। वैसे इन सबसे खराब स्थिति पूर्वोत्तर राज्य नगालैंड की है। यहां स्वीकृत पदों के मुकाबले मात्र 4.42 प्रतिशत पुलिस बल ही उपलब्ध है।

संयुक्त राष्ट्र के मानक के अनुसार प्रति लाख नागरिक पर 222 पुलिसकर्मी होने चाहिए, लेकिन भारत में यह आंकड़ा 144 ही है।  यह संख्या भी केवल कागजों पर है, हकीकत में तो यही नजर आता है कि पुलिसकर्मियों को अनावश्यक तौर पर वीआईपी ड्यूटी में लगाकर रखा जाता है, और आम जनता का सुरक्षित रहने का हक लगातार मारा जा रहा है।

यह कितनी विडंबना है कि हम अपने ही देश में बेखौफ, बेखटके नहीं घूम सकते हैं। रात या दिन की परवाह किए बिना बाहर नहीं निकल सकते हैं। लड़कियों के लिए स्थिति और खराब हैं, वे कहीं भी सुरक्षित महसूस नहीं करती हैं।

स्कूलों में, सार्वजनिक परिवहन साधनों में, सडक़ों में, घरों में हर जगह आप सीसीटीवी लगा लीजिए, फिर भी माहौल सुरक्षित नहीं बनेगा, क्योंकि कानून का राज कमजोर पड़ते जा रहा है। देश में केवल पुलिसबल की कमी नहीं है, अदालतों में जजों की संख्या में कमी भी भारी चिंता का विषय है। इस वजह से कई मुकदमे सालों साल चलते हैं, न्याय हांफने लगता है, शरीफ लोग थकने लगते हैं, लेकिन अपराध की दुनिया कुछ और जगमगा जाती है।

अभी पिछले गुरुवार संसद में वित्त वर्ष 2018-19 की आर्थिक समीक्षा में देश की अदालतों में जजों की कमी के कारण लंबित तीन करोड़ केसों पर चिंता जताई गई। समीक्षा में कहा गया कि पांच सालों में देश में केसों की प्रतीक्षा अवधि समाप्त करने के लिए 8,519 जजों की जरूरत है।

रिपोर्ट में बताया गया कि हाईकोर्ट और निचली अदालतों में जजों की 5,535 रिक्तियां हैं। हालांकि यह भी एक तथ्य है कि सुप्रीम कोर्ट में एक भी रिक्ति नहीं है और यहां जजों के सभी 31 पद भरे हुए हैं। लेकिन यह भी गौरतलब है कि यहां 58,000 से ज्यादा केस लंबित हैं।

पिछले साल सितंबर में कानून मंत्रालय का आंकड़ा आया था, जिसके मुताबिक भारत में प्रति दस लाख लोगों पर केवल 19 जज हैं और देश में 6000 से ज्यादा जजों की कमी है, जिनमें 5000 से ज्यादा जजों की निचली अदालतों में कमी है। एक साल बाद स्थिति सुधरी नहीं है, बल्कि चिंता कुछ और बढ़ गई है।

लोकसभा में एक सवाल का जवाब देते हुए केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा कि, सुप्रीम कोर्ट में जजों की कोई कमी नहीं है। साल 2009 के बाद पहली बार सुप्रीम कोर्ट में 31 जजों की पूरी संख्या है। हालांकि, 1 जुलाई, 2019 तक विभिन्न हाईकोर्ट में 403 पद खाली हैं।

उनके इस कथन में उपलब्धि हासिल करने का भाव तो नजर आ रहा है, लेकिन इससे कोई खास उम्मीद नहीं बंधती है, क्योंकि तारीख पर तारीख मिलने की प्रक्रिया जिन निचली अदालतों से शुरु होती है, वहां जजों की कुर्सियां खाली पड़ी हैं। दिल्ली हाईकोर्ट की टिप्पणी वास्तव में लचर कानून व्यवस्था का आईना दिखा रही है। सवाल ये है कि क्या सरकार इस आईने को देखना पसंद करेगी।

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