रायबरेली से राजनीति सीखने वाली संघमित्रा पहुंचीं संसद

संघमित्रा
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रायबरेली। कहने को सपा बदायूं को अपना गढ़ मानती है, लेकिन इस बार उनका यह दुर्ग भी ध्वस्त हो गया है। यह किला फतेह करने वाली और कोई नहीं बल्कि जिले की बेटी डॉ. संघमित्रा मौर्य हैं। कभी अपने पिता स्वामी प्रसाद मौर्य और भाई उत्कर्ष मौर्य के चुनाव की जिम्मेदारी संभालने वाली डा. संघमित्रा मौर्य इस बार खुद ही सांसद बन गई हैं। बदायूं में सपा का किला ध्वस्त करने वाली डॉ. संघमित्रा का रायबरेली से बहुत पुराना नाता  है। अपने पिता स्वामी प्रसाद मौर्य के प्रचार-प्रसार लेकर उन्होंने यहां के लोगों की समस्याओं को बखूबी सुना और जाना  है। अगर यह कहा जाए कि रायबरेली ही उनकी राजनीति की नर्सरी रही है, तो गलत नहीं होगा। रायबरेली की ऊंचाहार विधानसभा क्षेत्र में जनता उन्हें प्यार से दीदी कहकर बुुलाती है क्योंकि यहां पर वह और उनका परिवार वर्षों से जनता की सेवा करता चला आ रहा है। कभी उनके पिता स्वामी प्रसाद मौर्य यहां से विधायक रहे  इसके अलावा उनका परिवार लगातार रायबरेली की राजनीति में सक्रिय रहा है, जिसकी वजह से संघमित्रा भी रायबरेली में परिवार के लिए हमेशा  डटी रहती है।

शिक्षाविद् और लेखिका भी हैं संघमित्रा 

कैबिनेट मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य की बेटी शिक्षाविद् भी है । रायबरेली जिले में उन्होंने ग्रामीण क्षेत्र में बेहतर शिक्षा व्यवस्था उपलब्ध कराने की कोशिश की है। जिला मुख्यालय से 40 किमी की दूरी पर उन्होंने गौरा ब्लाक के चरूहार जियाक गांव में इंटर कॉलेज से लेकर डिग्री कॉलेज तक खुलवाया है, जहां पर हर विषय की पढ़ाई  होती  है। स्वयं पीएचडी होने की वजह से उन्होंने गरीब बच्चों के लिए स्कूल में बेहतर सुविधा भी उपलब्ध कराई है।  उन्होंने मोदी जी के कार्यों और नीति पर एक किताब भी लिखी है। 2017 में उन्होंने ‘मोदिज्म के मायने’ नाम से पुस्तक लिखी थी, जिसका विमोचन राज्यपाल राम नाइक ने किया था।

संघमित्रा का यह रहा है राजनीति सफर

संसद में जाकर महिलाओं और गरीबों की आवाज बनने के लिए वह शुरू से ही प्रयासरत रही हैं। 17वीं लोकसभा में आखिरकार उनका सपना साकार हुआ है और जनता ने उन्हें चुनकर संसद भेजा है।  संघमित्रा 2014 में भी सैफई परिवार के सामने चुनाव लड़ चुकी है। उस समय वहां पर उनका मुकाबला सैफई परिवार के मुखिया और सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव से हुआ था। बसपा के टिकट पर चुनाव लड़कर उन्होंने वहां पर अच्छी फाइट दी थी। इससे पहले उन्होंने राजनीति में पर्दापण 2012 के विधानसभा चुनाव के समय किया था। उस समय उन्होंने बसपा के टिकट पर एटा जिले की अलीगंज विधानसभा से चुनाव लड़ा था। उनके पिता स्वामी प्रसाद मौर्य 2016 में जब बसपा छोड़कर भाजपा में शामिल हुए थे, उसी दौरान वह भी भाजपा में शामिल हो गई थी। भाजपा नेतृत्व से उन्हें आश्वासन मिलने के बाद उन्होंने बदायूं से तैयारी शुरू कर दी थी। वहां की जनता की वह आवाज बनने लगी थी, आखिरकार जनता ने अब उन्हें संसद में आवाज उठाने के लिए भेज दिया है।

संघमित्रा की जीत में पिता का रहा अहम योगदान

सपा के गढ़ में वर्तमान सांसद धर्मेंद्र यादव को हराने में कहीं न कहीं कैबिनेट मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य की रणनीति काम आई। मोदी लहर में 2014 में इस सीट पर हारने वाली भाजपा ने इस बार कैबिनेट मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य की पुत्री डॉ. संघमित्रा मौर्य को मैदान में उतारा था। इस बार भी उनके सामने थे सैफई परिवार के सदस्य और यहां से वर्तमान सांसद धर्मेंद्र यादव, लेकिन इस बार मोदी और शाह का मार्गदर्षन और कैबिनेट मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य रणनीति ने सपा का गढ़ ध्वस्त कर दिया। इस बार सपा से 2009 और 2014 में लगातार दो बार से सांसद धर्मेंद्र यादव को हराने में कामयाब रहे। सबसे खास बात यह रही कि इस बार धर्मेंद्र को सपा-बसपा गठबंधन का साथ मिल रहा था, लेकिन इसके बाद वह अपनी सीट नहीं बचा सकें।

बदायूं में आसान नहीं थी संघमित्रा की राह

बदायूं की सीट से चुनाव लड़ने गई संघमित्रा के लिए राह आसान नहीं थी। यहां पर उनका मुकाबला सपा से वर्तमान सांसद धर्मेंद्र यादव और कांग्रेस ने बदायूं से पांच बार सांसद रहे सलीम इकबाल शेरवानी पर दांव खेला था। यहां पर त्रिकोणीय मुकाबला हो गया था, लेकिन इसके बाद भी राष्ट्रवाद की लहर, मोदी शाह की रणनीति और स्वामी प्रसाद मौर्य की मेहनत ने यहां पर 1991 के बाद भाजपा को जीत हासिल कराई। 1991 के बाद यहां जीत के लिए तरस रही भाजपा ने बदायूं की सीट पर कब्जा जमा लिया। भाजपा प्रत्याशी  डॉ. संघमित्रा मौर्य ने 5,11,228 वोट प्राप्त कर सपा के धर्मेंद्र यादव को 18,584 मतों से पराजित कर दिया। धर्मेंद्र यादव को 4,92,644 वोट मिले। कांग्रेस के सलीम इकबाल शेरवानी अपनी जमानत भी नहीं बचा सके। उन्हें 51,942 मतों से ही मिल सके।

 

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