विधवा को न्याय दिलाने के लिए एसडीएम से भीड़े डीएम

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सुल्तानपुर साहब! टोपी वाले शिक्षक एक ही विभाग तक सीमित नही है। उनका रसूख कई विभागों में  कायम है। अपनी कला और दक्षता में माहिर बड़े-बड़े अधिकारी नतमस्तक होते हैं। ऐसा ही एक मामला प्रकाश में  आया है। टोपी वाले ‘गुरूजी’ एक अधिकारी से ‘आंख मिचैली’ की तो पासा ही पलट गया। विधवा महिला के पुश्तैनी जमीन के बटवारे में  उप जिलाधिकारी के यहां चल रहे मुकदमे में साहब से ऐसी गलिबहियां की कि डीएम के आदेश पर एसडीएम हाबी हो गए और स्थगन आदेश को ही नियमों की अनदेखी कर खारिज कर दिया। अब इस कार्यशैली को लेकर टोपी वाले ‘गुरूजी’ शिक्षा विभाग मंे ही नही राजस्व विभाग में  भी सुर्खियों में  हैं।

सुल्तानपुर डीएम से गुहार लगाने पहुंची विधवा

 हुआ यूं कि तहसील सदर के दादूपुर गांव की विधवा आशा सिंह के पुश्तैनी जमीन के बटवारे का मुकदमा एसडीएम सदर के यहां लंबित चल रहा है। विपक्षी जब जमीन पर निर्माण कर कब्जा करने की कवायद की तो असहाय महिला की पीड़ा किसी भी अधिकारी ने सुनने की जुररत नही समझी। थक हारकर जब पीड़ित महिला ईमानदार जिलाधिकारी के पास पहुंची और अपनी पीड़ा की दास्तां सुनाई तो डीएम भी दंग रह गए। प्रार्थना पत्र पर क्षेत्राधिकारी, उप जिलाधिकारी सदर को मामले को गंभीरता से देखने का निर्देश ही नही दिया बल्कि तत्काल प्रभाव से स्थगन आदेश एवं निर्माण कार्य रोकने का आदेश पारित किया। महिला को लगा कि अब उसे न्याय मिल जाएगा।
उस दिशा में एसडीएम सदर ने एक कदम चलने की कोशिश की लेकिन इसी बीच शिक्षा विभाग में चर्चित एक टोपी वाले ‘गुरूजी’ ने विपक्षी की कमान संभाली। अपने कला और दक्षता में माहिर गुरूजी ने ऐसा पासा फेंका कि एसडीएम ने अपने जारी किए गए स्थगन आदेश को ही वापस ले लिया तो विपक्षी हाबी ही नही हुए बल्कि निर्माण कार्य शुरू करा दिया। अब महिला फिर अधिकारियों की चैखट की गणेश परिक्रमा कर रही है लेकिन टोपी वाले गुरूजी के रसूख के सामने उसे न्याय नही मिल रहा है। ऐसे कई मामले हैं जहां पर गुरूजी ने दस्तक दी तो ‘खेल’ विपक्ष का बिगड़ ही गया। बानगी के तौर पर 10 अक्टूबर 2017 को शिक्षक संतोष कुमार वर्मा को फोन पर धमकी दिया की रूपये दे दो नही तो तुम्हे निलंबित करवा दूँगा। जिसका ऑडियो भी सोशल मिडिया पर खूब वायरल हुआ था। शिक्षक ने जिसकी शिकायत जिले के आला अधिकारयों से किया। क्षेत्रीय विधायक और लोगों से दबाव बनवा कर सुर्खियों में रहने वाले टोपी वाले गुरूजी बाजी मार ही लिए। यानि कि एक अधिकारी के सामने बैठकर दोनों पक्षों में सुलह-समझौता करा दिया गया।
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