सियासी सुर्खियों में छाया अमेठी, ठेठ पहचान जस की तस

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अमेठी। गांधी-नेहरू परिवार का किला ध्वस्त होने और उत्तर प्रदेश ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी एक पहचान रखने वाले अमेठी जिले में कमल खिलने के बाद सियासी सरगर्मियां और पारा भले ही ऊपर-नीचे होता रहा हो लेकिन इन सब झंझावातों के बीच अमेठी अपनी ठेठ पहचान कायम रखे हुए है।भाजपा से नजदीकी रखने वाले और अमेठी की राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाने वाले प्रोफेसर विश्वनाथ मिश्र ने  कहा कि  सियासी धुन कोई भी बजी हो, इसके मुरीद हुए बिना अमेठी अपनी ही लोकधुन में पहले भी मस्त था और अब भी मस्त है।  वे  कहते हैं कि कोई जीता कोई हारा, इससे इतर अगर आप यहां के गांवों में किसी भी सामान्य व्यक्ति और संगीतप्रेमी से मिलेंगे तो यहां की परंपरा, लोक भाषा, लोक संगीत और लोक संस्कृति में कोई बदलाव आपको नहीं दिखेगा।

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अमेठी की यही खूबी जब ढूंढने निकले तो चुनावी मौसम में गांव गांव में अवधी के ठेठ अंदाज से सामना हुआ। कुंभी क्षेत्र के चौहान का पुरवा गांव में पुरुषों का समूह खेत किनारे पेड़ों के नीचे खटिया डाले बतिया रहा था। कुंवर बहादुर ने  कहा कि भइया बोलिया एक्कै अहै। अपने हियां के बोली मीठ लागत है।  जब लोक गायकी पर सवाल किया गया तो बगल में बैठे शिवा सिंह अवधी के लोक गायक राम कैलाश यादव का गीत सुनाने लगे –   राम लखन जब आये नगर में हो, पूछन लागीं सब नारी, सीता राम जी भजौ।    प्रतापगढ़, अमेठी और सुल्तानपुर बेल्ट में यादव का यह भजन बड़ी शिद्दत से गाया जाता है।प्रोफेसर मिश्रा बताते हैं कि अमेठी के गांवों की महिलाओं ने लोक संगीत, विविध आयोजनों पर होने वाले गीत, गौनई, सोहर, ठेसा, भजन, गारी, होरी और सोहाग को जीवित रखा है। फिल्मी संगीत विशेषकर भोजपुरी के आधुनिक गीत संगीत ने जगह जरूर बनायी है लेकिन दादीनानी के समय के पुराने गीत अभी यहां जिन्दा हैं।छोटी -मोटी बीमारियों के लिए घरेलू नुस्खे बताने वाली डक्टराइन के नाम से मशहूर दुर्गा चौहान कहती हैं,   अरे मोरे राजा, अरे मोरी माई। अब तू बतावा हम कहां जाईं।  आवाज बहुत सुरीली नहीं है लेकिन फरमाइश करने पर डक्टराइन ने एक लाजवाब गीत सुनाया,   हम गौने ना जइबै बलम रसिया … सास बेचै हरदी ननद बेचै धनिया … मैं ठाड़ी देखूं बलम भरें पनिया।   हम गौना नहीं कराएंगे बलम रसिया … सास हल्दी बेचती हैं और ननद धनिया बेचती हैं … मैं खड़ी होकर देख रही हूं कि बलम पानी भर रहे हैं।शिक्षक लखन पाल को देसी गीत गाने का शौक है।

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वह बताते हैं,   जुग जुग जिये मोर ललनवा, भवनवा के भाग जागल हो । मेरा लाल युगों तक जिये, उसके आने से मेरे घर का भाग्य जाग गया।  यह सोहर अभी भी अमेठी के गांवों में गाया जाता है।  वैवाहिक गालियों को आशीर्वाद स्वरूप अमेठी में  गारी  कहा जाता है। पाल का कहना है कि विवाह के समय अक्सर मांग आ जाती है …   हे बहिनी, हे अम्मा, हे दादी रचिके गारी गाय देतू ना।  हे बहन, हे मां, हे दादी जरा गारी गाकर सुना दें। गौरीगंज रेलवे स्टेशन के निकट रहने वाली उर्मिला देवी ने गारी का अदभुत स्वरूप दिखाया। वह गाती हैं,   दुलहा के माई बड़ी चुलबुल्ली, अरे रोज -रोज खोजैं भतार बरतिया जीया जीया।   अर्थात दूल्हे की मां बहुत चुलबुली हैं और हर रोज नया पति खोजती हैं । सभी बाराती खूब जियें। चुनावी राजनीति, हार -जीत से अलग यहां की परंपरा, लोक भाषा, लोक संगीत और लोक संस्कृति में कोई बदलाव नहीं है। कुल मिलाकर अमेठी का लोक संगीत यहां की लोक संस्कृति को जीवित रखे हुए है।

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