मशहूर गायिका जरीना बेगम ने ली लंबी बीमारी के बाद निधन

जरीना बेगम
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लखनऊ । मशहूर गायिका जरीना बेगम का शनिवार को लखनऊ में निधन हो गया। गजल, ठुमरी और दादरी को एक नई पहचान वाली जरीना बेगम का जन्म बहराइच के नानपारा में हुआ था। जरीना बेगम लंबे समय से बीमार चल रहीं थी और परिवार के लोगों की आर्थिक हालत दयनीय होने के कारण उनका समुचित इलाज नहीं हो पाया।

बहराइच के नानपारा से 1972 में लखनऊ आ गई थी जरीना बेगम

बहराइच के नानपारा से जरीना बेगम 1972 में लखनऊ आ गई थी। बेगम अख्तर की शिष्या बीमारी के कारण जीवन के अंतिम दिनों में आर्थिक तंगी की जूझती रहीं। उनके इलाज का खर्च पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने उठाया था। उन्होंने आज भी उनके अंतिम संस्कार के लिए 50 हजार रुपए की धनराशि भेजी थी।

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जरीना  के दामाद नावेद बोले सरकार की तरफ से कुछ भी नहीं मिली मदद

उनको गजल, ठुमरी और दादरी को एक नई पहचान देने के लिए आज भी याद किया जाता है। आखिरी फनकार जरीना बेगम पिछले काफी दिनों से लखनऊ स्थित केके अस्पताल में जिंदगी और मौत से जूझ रही थीं। आलम यह था कि इलाज तक के लिए पैसे नहीं थे। जरीना बेगम के दामाद नवेद ने सभी से गुहार लगाई, लेकिन सरकार की तरफ से कुछ भी नहीं किया गया। बतातें चलें कि डालीगंज के एक निजी केके अस्पताल के आईसीयू में जरीना बेगम भर्ती थीं।  मोहम्मद नावेद कहते हैं कि तीन साल पहले प्रदेश सरकार ने जरीना बेगम को पांच लाख रुपये की धनराशि वाला बेगम अख्तर अवॉर्ड दिया था। वह भी इलाज में खर्च हो गया था ।

छिप-छिपकर वे रेडियो स्टेशन तक पहुंचीं

गौरतलब है कि उनकी बेटी रूबीना, दामाद नावेद और दिव्यांग बेटा अयूब उनके साथ रहते हैं। गाने में उनकी दिलचस्पी बचपन में अपने आसपास के माहौल से हुई। उनके वालिद शहंशाह हुसैन नानपारे के स्थानीय कव्वाल थे। इसके बावजूद घर में लड़कियों के गाने को कोई प्रोत्साहन नहीं मिलता था। अम्मी ने छिप-छिपाकर गाने का रियाज शुरू किया। ऐसे ही छिप-छिपकर वे रेडियो स्टेशन तक पहुंचीं। उनके हुनर को असल मुकाम तब मिला, जब वे बेगम अख्तर के नजदीक आईं। बीमारी की हालत में भी उन्होंने दिल्ली के इंदिरा गांधी हॉल में गाना गाया था और यही उनकी आखिरी परफॉर्मेंस थी।

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बेगम अख्तर ने उनको बैठक गायिकी के आदाब और तौर-तरीके सिखाए

बेगम अख्तर ने उनको बैठक गायिकी के आदाब और तौर-तरीके सिखाए। इसके बाद जरीना ने शौहर तबला-नवाज कुरबान अली के साथ देशभर की महफिलों में अपनी गायिकी के जौहर बिखेरे। आकाशवाणी ने भी उनको ए ग्रेड आर्टिस्ट के रूप में स्वीकार किया। अम्मी न तो पढ़ी-लिखी थीं और न ही इतनी तेज कि बदलते वक्त से कदम मिला सकें। यही वजह है कि उन्हें अपनी दुनिया में एक वक्त के लिए शोहरत तो खूब मिली लेकिन वो उनकी जिंदगी को खुशहाली नहीं बख्श पाई।

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