आरव हत्याकांड: क्या मेरठ जेल में होगी फांसी? 30 दिन में हाईकोर्ट पहुंचेगा मामला
फिरोजाबाद/इलाहाबाद। उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद सत्र न्यायालय द्वारा मासूम बच्चे की निर्मम हत्या (Aarav Murder Case) के मामले में दोषी जितेंद्र पाठक उर्फ विराज को मौत की सजा (Capital Punishment) सुनाए जाने के बाद अब इस…

फिरोजाबाद/इलाहाबाद। उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद सत्र न्यायालय द्वारा मासूम बच्चे की निर्मम हत्या (Aarav Murder Case) के मामले में दोषी जितेंद्र पाठक उर्फ विराज को मौत की सजा (Capital Punishment) सुनाए जाने के बाद अब इस पूरे मामले की कानूनी फाइल इलाहाबाद उच्च न्यायालय (High Court) का रुख करेगी। भारतीय कानून के विशेषज्ञों के अनुसार, किसी भी सत्र न्यायालय द्वारा दी गई फांसी की सजा को तब तक अमल में नहीं लाया जा सकता, जब तक कि उच्च न्यायालय दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) के तहत उस पर अपनी अंतिम मुहर न लगा दे। इस विधिक प्रक्रिया के तहत नियमानुसार 30 दिनों के भीतर इलाहाबाद हाईकोर्ट में एक औपचारिक अपील दाखिल की जाएगी। यदि उच्च न्यायालय भी निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखता है, तो दोषी विराज को उत्तर प्रदेश की चुनिंदा जेलों में से एक, मेरठ जिला जेल में स्थित ऐतिहासिक फांसीघर में फंदे पर लटकाया जा सकता है।
जिला जेल में हाई-अलर्ट और आगरा सेंट्रल जेल ट्रांसफर की तैयारी
फिरोजाबाद जिला जेल के अधीक्षक अमित चौधरी ने आधिकारिक जानकारी देते हुए बताया कि कोर्ट से फांसी की सजा का एलान होते ही बंदी जितेंद्र उर्फ विराज को लेकर जेल प्रशासन पूरी तरह मुस्तैद हो गया है। जेल मैनुअल के कड़े सुरक्षा नियमों के तहत विराज को तुरंत सामान्य बंदियों से अलग एक 'कंडम्ड सेल' (फांसी की कोठरी) या सुरक्षित बैरक में शिफ्ट कर दिया गया है, जहां चौबीसों घंटे सशस्त्र सुरक्षाकर्मियों का पैनी पहरा रहेगा। इसके साथ ही, जेल अधीक्षक ने सुरक्षा कारणों और जेल प्रोटोकॉल का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि विराज को उच्च सुरक्षा वाली आगरा सेंट्रल जेल (Agra Central Jail) में ट्रांसफर करने की कागजी और प्रशासनिक प्रक्रिया भी तत्काल शुरू कर दी गई है।
उन्होंने बताया कि बृहस्पतिवार को कोर्ट द्वारा दोषी करार दिए जाने के बाद पुलिस ने उसे कड़ी सुरक्षा में जेल में दाखिल कराया था, जहां उसने नियमानुसार दिया गया भोजन किया। फांसी की सजा पाने वाले बंदियों में संभावित अवसाद या उग्रता को रोकने के लिए डॉक्टरों और वार्डनों की एक विशेष टीम उसकी मानसिक व शारीरिक स्थिति पर लगातार नजर रख रही है और उसका नियमित मेडिकल चेकअप कराया जा रहा है ताकि वह स्वयं को कोई नुकसान न पहुंचा सके।
मां की भावुक गवाही और फॉरेंसिक साक्ष्य बने सजा का मुख्य आधार
इस संवेदनशील मुकदमे की सुनवाई के दौरान अदालत में सबसे अहम, चश्मदीद और भावुक गवाही मृत मासूम आरव की अभागी मां रति की रही। रति ने कोर्टरूम में रोते हुए उस खौफनाक मंजर को बयां किया कि किस तरह जितेंद्र उसे हासिल करना चाहता था और इस रास्ते में उसने उसके महज डेढ़ साल के मासूम बच्चे को रोड़ा मान लिया। रति ने अदालत के सामने दोषी की अकाट्य शिनाख्त करते हुए बताया कि जितेंद्र ने उसके देखते ही देखते मासूम को बेरहमी से कंक्रीट पर पटकना शुरू कर दिया था। माननीय न्यायालय ने मां की इस गवाही को मामले का सबसे पुख्ता और जीवंत सबूत माना। इसके अतिरिक्त, तहेरे भाई आयुष व अन्य राहगीरों की गवाहियों ने घटना के तुरंत बाद मौके से जितेंद्र के भागने के प्रयास की पुष्टि की। वैज्ञानिक मोर्चे पर, फॉरेंसिक टीम (FSL) की रिपोर्ट सबसे निर्णायक साबित हुई; घटनास्थल से एकत्र किए गए मासूम के खून के नमूने और कंक्रीट के टुकड़ों पर मिले साक्ष्यों का मिलान सीधे दोषी जितेंद्र के कपड़ों से हुआ, जिसने वैज्ञानिक तौर पर अपराध को अकाट्य रूप से साबित कर दिया।
पुलिस टीम पर फायरिंग के दूसरे मामले में चार्ज फ्रेम, जल्द शुरू होगा ट्रायल
मासूम आरव की हत्या के मामले में फांसी की सजा पाने के बावजूद, दोषी जितेंद्र पाठक उर्फ विराज की कानूनी मुश्किलें यहीं खत्म नहीं हुई हैं। उसे अभी एक और गंभीर आपराधिक मुकदमे का सामना करना पड़ेगा, जो उस पर पुलिस टीम पर जानलेवा हमला करने के आरोप में शिकोहाबाद थाने में दर्ज हुआ था। ज्ञात हो कि 30 मई 2026 की रात को जब शिकोहाबाद पुलिस ने हत्या कर भाग रहे विराज की घेराबंदी की थी, तो उसने खुद को पुलिस से घिरा पाकर उन पर सीधे अवैध असलहे से अंधाधुंध फायरिंग कर दी थी। इस दुस्साहस पर दर्ज मामले की निष्पक्ष विवेचना मक्खनपुर थाना प्रभारी चमन शर्मा को सौंपी गई थी। इंस्पेक्टर चमन शर्मा के अनुसार, इस केस की कानूनी प्रक्रिया भी तेजी से पूरी की गई है और सभी वैज्ञानिक साक्ष्यों व पुलिसकर्मियों के बयानों के आधार पर कोर्ट में आरोप पत्र (चार्जशीट) दाखिल कर दिया गया है।
न्यायालय ने इस चार्जशीट का संज्ञान लेते हुए आरोपी विराज पर जानलेवा हमले की धाराओं के तहत 'चार्ज फ्रेम' (आरोप तय) कर दिए हैं। अब इस दूसरे मुकदमे का भी नियमित ट्रायल (सुनवाई) शुरू होने वाला है, जिसमें गवाहों के बयान दर्ज किए जाएंगे; कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि मुख्य मामले में फांसी की सजा होने के बाद भी इस दूसरे केस का ट्रायल अपनी तय प्रक्रिया के अनुसार पूरा किया जाना अनिवार्य है।
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