फैशन/शैली

कई मसालों का मिश्रण है कोल्हापुरी मसाले में जो व्यंजनों का जायका दोगुना कर देता हैं

लाइफस्टाइल डेस्क। बदलती लाइफस्टाइल में सब कुछ बदल रहा हैं। पहले लोग अपने घरों में मसाला खुद तैयार करते थे। लेकिन आज कल लोग पैकट का मसाला इस्तेमाल कर रहे हैं, जो हमारे सेहत के लिए बहुत  नुकसानदायक हैं। बता दूं की मराठा बहुल क्षेत्र कोल्हापुर कई मामलों में प्रसिद्ध है जिसमें एक नाम है स्वाद का। कई मसालों का मिश्रण है इस कोल्हापुरी मसाले में जो व्यंजनों का जायका दोगुना करने के लिए काफी है।

पुष्पेश पंत

कोल्हापुर का नामक सुनते ही अधिकतर लोगों को सबसे पहले याद आती हैं यहां की खूबसूरत चप्पलें जो कील नहीं वरन चमड़े के मोटे ‘धागे’ से बांधी जाती हैं। यह महाराष्ट्र का समुद्र तट से दूरस्थ हिस्सा है जो आजादी के पहले एक छोटी पर सम्मानित रियासत थी। यहां के शासक छत्रपति शिवाजी महाराज के वंशज थे और गुणी संगीतकारों के उदार आश्रयदाता समझे जाते थे। हिंदी फिल्मों के शौकीनों को यह याद दिलाने की जरूरत नहीं होनी चाहिए कि वी. शांताराम ने यहीं प्रभात टॉकीज की स्थापना की थी। इस सबके अलावा अपने खान-पान, खास कर सामिष व्यंजनों के लिए भी कोल्हापुर विख्यात है।

मराठी जायके का प्रतिबिंब

मुंबई अप्रवासियों की बस्ती है- यहां पारसी, गुजराती, सिंधी, गोमंतक तथा मूल निवासी मछुआरे कोली समुदाय के व्यंजनों का अनोखा घालमेल देखने को मिलता है। तब भी कोई ऐसा स्थानीय मसाला नहीं जिसे मुंबई का जायका कहा जा सके। पुणे के भोजन में ब्राह्मणों के मितव्ययी, सात्विक आहार की छाप झलकती है। यह सेहरा कोल्हापुर के सिर पर ही बंधता है जो खास मराठी जायके को प्रतिबिंबित करता है।

मिश्रण मसालों का

कोल्हापुरी मसाला एक असाधारण मिश्रण होता है। इसमें दो प्रकार की सूखी लाल मिर्चे- लवंगी (संकेश्वरी) तथा बड़गी- रंग और तीखेपन के लिए मिलाई जाती हैं। रंग निखारने के लिए जरा सा तेल छलकने के बाद इन्हें धूप में सुखाया जाता है। शाही जीरा, दालचीनी, लवंग, तेजपात, जावित्री-जायफल के साथ साथ इसमें चक्रफूल स्टार अनीस और पत्थरफूल लाइकन भी डाले जाते हैं। सौंठ तो रहती ही है। सबसे अधिक मात्रा में धनिया मौजूद रहती है, जिसके सूखे बीज पीसे जाने के पहले तवे पर भूने जाते हैं।

कुछ पारिवारिक नुस्खों में तिल तथा खसखस भी दर्ज हैं। महाराष्ट्र के इस अंचल में ‘तीफल’ का प्रयोग कई व्यंजनों में होता है। कबाबचीनी की तरह दिखने वाला यह दाना काली मिर्च जैसा तीखेपन का पुट खाने को देता है। इसे जानकार ‘सेजुआन पैपर’ की बिरादरी का मानते हैं। हमें यह पहेली चकराती रही है कि मसाला राजपथ से अलग-अलग यह क्षेत्र मसालों की इस मनमोहक रागमालिका को जन्म देने के लिए कैसे प्रेरित हुआ। मराठा बहुल आबादी वाला यह क्षेत्र बंजर खानदेश की सरहद से जुड़ा है और आमतौर पर यह धारणा है कि यहां के निवासियों का खान-पान बहुत परिष्कृत नहीं।

तेल में डूबा टिकाऊ मसाला

सबसे दिलचस्प बात यह है कि कोल्हापुरी मसाले में एक बड़ा हिस्सा सुनहरे तले प्याज का रहता है और इसी के बराबर सूखा कद्दूकस किया नारियल याने खोपरा भी रहता है। ये दोनों भी तेल मिलाकर अच्छी तरह भून लिए जाते हैं। महाराष्ट्र के इस अंचल में लहसुन का काफी चलन है सो, इसकी कुछ कलियां भी अनिवार्यत कोल्हापुरी मसाले में डाली जाती हैं। भुनने के बाद तेल के लेप से यह मसाला टिकाऊ बन जाता है और तीखेपन के साथ सुगंध का अनोखा संगम पा लेता है।

स्वाद का बुनियादी नुस्खा

राजस्थान के लाल मास से होड़ लेने वाला कोल्हापुरी मटन रंगत में सुर्ख और जायके में मुंह में झनझनाहट पैदा करता है, इसका यह जायका इस मसाले की ही मेहरबानी से मिलता है। तरी वाले बकरी के मांस का सबसे लोकप्रिय नुस्खा ‘लाल रस्सा’ है। यों पिवला, हरा, सफेद तथा काला रस्सा भी पकाए जाते हैं पर उनकी बुनियाद भी इसी कोल्हापुरी मसाला मिश्रण पर ही टिकी रहती है। हां रंग बदलने के लिए थोड़ा सा हेर-फेर किया जाता है। कुछ समय पहले तक घर-घर में यह पारंपरिक मसाला पीसा और तला जाता था। आज गरम मसाले की तरह ज्यादातर लोग इसे रेडीमेड खरीदने लगे हैं।

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