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दुनिया के ये देश कोरोना वैक्‍सीन बनाने के बहुत करीब पहुंचे

नई दिल्ली। कोरोना वायरस से पूरी दुनिया बेहाल हो चुकी है। दुनियाभर के वैज्ञानिक और शोधकर्ता वैश्विक महामारी को हराने के लिए वैक्‍सीन बनाने व कारगर इलाज ढूंढने में दिनरात मेहनत कर रहे हैं। सरकारें भी वैक्‍सीन बनाने के काम में जुटी कंपनियों को ज्‍यादातर मंजूरियां फास्‍ट-ट्रैक अंदाज में दे रही हैं।

वैज्ञानिक, शोधकर्ता, वैक्‍सीन निर्माता कंपनियां एकदूसरे का हरसंभव सहयोग कर रही हैं ताकि जल्‍द से जल्‍द कोरोना वायरस से निपटने की व्‍यवस्‍था की जा सके। कुल मिलाकर वैक्‍सीन बनाने का काम युद्धस्‍तर पर चल रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि फिर भी तैयार होने वाली वैक्‍सीन को लोगों तक पहुंचने में अच्‍छा खासा समय लग जाएगा। बता दें कि किसी भी वैक्‍सीन के बड़े पैमाने पर उत्‍पादन से पहले कई चरणों से गुजरना पड़ता है।

आखिरी चरण ह्यूमन ट्रायल के भी होते हैं तीन चरण

सबसे पहले वैक्‍सीन का परीक्षण लैब में किया जाता है। इसके बाद जानवरों पर टेस्‍ट किया जाता है। इसमें सफल होने और सुरक्षित पाए जाने के बाद वैक्‍सीन का ह्यूमन ट्रायल किया जाता है। किसी भी वैक्‍सीन के ह्यूमन ट्रायल के भी तीन चरण होते हैं। सबसे पहले कम संख्‍या में लोगों को परीक्षण में शामिल किया जाता है। इसमें सफल पाए जाने के बाद अगले चरण में लोगों की संख्या ज्‍यादा होती है।

इसमें कंट्रोल ग्रुप्स के जरिये ये देखा जाता है कि वैक्सीन सुरक्षित है या नहीं। तीसरे और आखिरी चरण में पता लगाया जाता है कि वैक्सीन की कितनी खुराक वायरस से बचाने में असरदार होगी। इस समय दुनियाभर में कोरोना वायरस की 115 वैक्‍सीन पर काम चल रहा है. इनमें छह ह्यूमन ट्रायल के चरण तक पहुंच चुकी हैं। इसे वैक्‍सीन बनाने की प्रक्रिया में बड़ा लक्ष्य माना जाता है।

नई शोध रणनीति से वैक्‍सीन बनाने में जुटा अमेरिका

अमेरिका में मैसाचुसेट्स की बॉयोटेक्नॉलॉजी कंपनी मॉडर्ना थेरेप्युटिक्स कोविड-19 की वैक्सीन के लिए नई शोध रणनीति पर काम कर रही है। कंपनी ऐसी वैक्सीन बनाने की कोशिश में जुटी है, जो किसी व्यक्ति की प्रतिरोधक क्षमता को कोरोना वायरस के खिलाफ लड़ने के लिए तैयार करें। इसके लिए वैज्ञानिक कमजोर और निष्क्रिय वायरस का इस्तेमाल करते हैं। हालांकि, मॉडर्ना थेरेप्युटिक्स की mRNA-1273 वैक्सीन में कोविड-19 के लिए जिम्मेदार वायरस का इस्तेमाल नहीं किया गया है। ये वैक्सीन मैसेंजर राइबोन्यूक्लिक एसिड (RNA) पर आधारित है। वैज्ञानिकों ने लैब में कोरोना वायरस का जेनेटिक कोड तैयार किया है। इसके बाद उसके छोटे हिस्से को व्यक्ति के शरीर में इंजेक्ट किए जाने की जरूरत होगी। वैज्ञानिक उम्मीद कर रहे हैं कि ऐसा करने से व्यक्ति की प्रतिरोधक क्षमता संक्रमण के खिलाफ लड़ने के लिए प्रतिक्रिया करेगी।

आरएनए आधारित वैक्‍सीन बनाने का लाइसेंस नहीं

अमेरिका में ही पेंसिल्वेनिया की बॉयोटेक्नॉलॉजी कंपनी इनोवियो फार्मास्युटिकल्स भी INO-4800 वैक्सीन बनाने के लिए रिसर्च की नई रणनीति पर काम कर रही है। कंपनी ऐसी वैक्सीन तैयार करना चाहती है, जिसमें मरीज के सेल्स में छोटी आनुवंशिक संरचना के जरिये डीएनए इंजेक्ट किया जाएगा। इससे मरीज के शरीर में संक्रमण से लड़ने के लिए एंटीबॉडीज का निर्माण शुरू होने की उम्मीद है। इनमें से किसी भी तकनीक के जरिये अभी तक कोई दवा या इलाज नहीं खोजा गया है। यही नहीं ऐसी किसी खोज को ह्यूमन इट्रायल की अनुमति भी नहीं मिली है। मॉडर्ना थेरेप्युटिक्स के वैज्ञानिकों का कहना है कि उनके सामने इस वैक्सीन को उत्पादन और मार्केटिंग की स्थिति में पहुंचाने की बड़ी चुनौती है। उनके पास मैसेंजर आरएनए आधारित वैक्सीन बनाने का लाइसेंस तक नहीं है।

चीन कोरोना वायरस वैक्‍सीन बनाने की दिशा में तेजी से बढ रहा है। चीन में इस समय तीन वैक्‍सीन का ह्यूमन ट्रायल चल रहा है। चीन कोरोना वायरस वैक्‍सीन बनाने की दिशा में तेजी से बढ रहा है। चीन में इस समय तीन वैक्‍सीन का ह्यूमन ट्रायल चल रहा है।

चीन में तीन वैक्‍सीन ह्यूमन ट्रायल तक पहुंचा

चीन में भी इस समय तीन वैक्सीन का ह्यूमन ट्रायल चल रहा है। चीन की बॉयोटेक कंपनी कैंसिनो बॉयोलॉजिक्स ने 16 मार्च को वैक्‍सीन के ट्रायल्स शुरू किए थे। इस प्रोजेक्ट में कैंसिनो बॉयोलॉजिक्स के साथ इंस्टीट्यूट ऑफ बॉयोटेक्नॉलॉजी और चाइनीज एकेडमी ऑफ मिलिट्री मेडिकल साइंसेस भी काम कर रहे हैं। चीन ने AD5-nCoV वैक्सीन में एडेनोवायरस के एक खास वर्जन का इस्तेमाल किया है। एडेनोवायरस इंसान की आंखों, श्वासनली, फेफड़े, आंतों और नर्वस सिस्टम में इंफेक्‍शन फैलाते हैं। इनके सामान्य लक्षण बुखार, सर्दी, गले में खराश, डायरिया और आंखों का गुलाबी हो जाना है। वैज्ञानिकों का कहना है कि ये वैक्‍सीन उस प्रोटीन को सक्रिय कर देगी, जो संक्रमण से लड़ने में प्रतिरोधक क्षमता के लिए मददगार हो सकती है।

निष्क्रिय वायरस से भी एक वैक्‍सीन बना रहा चीन

चीन के ही शेनजेन जीनोइम्यून मेडिकल इंस्टीट्यूट में वैक्सीन LV-SMENP-DC का परीक्षण चल रहा है। इसमें एचआईवी जैसी बीमारी के लिए जिम्मेदार लेंटीवायरस से तैयार की गई सहायक कोशिकाओं का इस्तेमाल किया जाता है। ये कोशिकाएं इंसान की प्रतिरोधक क्षमता को सक्रिय करती हैं। चीन में बनाई जा रही तीसरी वैक्सीन में निष्क्रिय वायरस दिए जाने का प्रस्ताव है। इस पर वुहान बॉयोलॉजिकल प्रोडक्ट्स इंस्टीट्यूट में काम चल रहा है। इस वैक्सीन के लिए निष्क्रिय वायरस में कुछ ऐसे बदलाव किए जाते हैं, जिनसे वो किसी को बीमार करने की क्षमता खो देते हैं। ये वैक्सीन तैयार करने की सबसे सामान्य तकनीक है। ज्‍यादातर वैक्सीन इसी प्रक्रिया से तैयार की जाती हैं। इसमें मंजूरी मिलने की समस्‍या कम रहती है।

ह्यूमन ट्रायल के दूसरे चरण में पहुंच गया है ब्रिटेन

ब्रिटेन की ऑक्‍सफोर्ड यूनिवर्सिटी के जेनर इंस्टीट्यूट में ChAdOx1 वैक्सीन के विकास का काम चल रहा है। भारत की सीरम इंस्‍टीट्यूट ऑफ इंडिया इसी वैक्‍सीन पर ऑक्‍सफोर्ड यूनिवर्सिटी के साथ काम कर रही है। ऑक्‍सफोर्ड की टीम चिम्‍पांजी से लिए गए एडेनोवायरस के कमजोर वर्जन का इस्तेमाल कर रही है। इसमें कुछ बदलाव किए गए ताकि इंसानों में ये खुद का विकास न करने लगे। बता दें कि ये वायरस लैब में तैयार किए जाने के कारण नुकसानदायक नहीं है। इसकी सतह पर कोरोना वायरस प्रोटीन है। उम्मीद की जा रही है कि इंसानों में ये प्रोटीन प्रतिरोधक क्षमता को सक्रिय कर देगी। इस वैक्सीन के क्लीनिकल ट्रायल्स के बाद पहले ह्यूमन ट्रायल में भी अच्‍छे नतीजे मिले हैं। अब जेन इंस्‍टीट्यूट वैक्‍सीन का 10 हजार से ज्‍यादा लोगों पर ह्यूमन ट्रायल करने की दिशा में बढ रहा है।

नीदरलैंड्स और इटली ने तैयार कर लीं एंटीबॉडी

नीदरलैंड्स में वैज्ञानिकों ने कोरोना वायरस से मुकाबला करने वाली एंटीबॉडी 47D11 की खोज कर ली है। यह एंटीबॉडी संक्रमण को फैलने से रोकती है। यह एंडीबॉडी कोरोना वायरस के स्पाइक प्रोटीन पर प्रहार करती है। इसके बाद उसके स्‍पाइक्‍स को नष्‍ट कर वायरस को ब्लॉक कर देती है। इससे कोरोना शरीर में संक्रमण नहीं फैला पाता है। इससे पहले इटली ने भी एंटीबॉडी विकसित करने का दावा किया था। इटली ने दावा किया कि उसकी बनाई वैक्‍सीन ने मानव कोशिका में मौजूद कोरोना वायरस को खत्म कर दिया। इटली ने पहले चूहे में एंटीबॉडीज तैयार किया। इसके बाद जेनेटिक इंजीनियरिंग के जरिये उन्‍हें इंसानों के प्रयोग के लायक बनायाय गया। फिर इस एंटीबॉडी का इंसान पर किया गया। परीक्षण में ये पूरी तरह सफल पाया गया।

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