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यूपी में जल्द घोषित होंगी नई बिजली दरें, 10% छूट पर सस्पेंस

Electricity

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यूपी में बिजली की नई दरों (Electricity Rates) को लेकर फैसला जल्द सामने आ सकता है। राज्य विद्युत नियामक आयोग ने बिजली दर निर्धारण की प्रक्रिया पूरी कर ली है और उम्मीद की जा रही है कि इस बार भी प्रदेश के उपभोक्ताओं पर बिजली का अतिरिक्त बोझ नहीं पड़ेगा। माना जा रहा है कि लगातार छठे साल भी उत्तर प्रदेश में बिजली की दरें यथावत रखी जा सकती हैं।

बिजली कंपनियों ने आयोग के सामने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए बिजली दरें (Electricity Rates) बढ़ाने का प्रस्ताव रखा है। कंपनियों का कहना है कि वर्ष 2024-25 के ट्रू-अप में करीब 3,995 करोड़ रुपये और वर्ष 2026-27 के लिए लगभग 12,453 करोड़ रुपये का राजस्व अंतर है। इस तरह कुल 16,448 करोड़ रुपये की भरपाई के लिए बिजली दरों में बढ़ोतरी की मांग की गई है।

हालांकि, राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद ने इस मांग का कड़ा विरोध किया है। परिषद के अध्यक्ष अवधेश कुमार वर्मा का कहना है कि बिजली कंपनियों पर उपभोक्ताओं का करीब 51 हजार करोड़ रुपये सरप्लस है। ऐसे में बिजली महंगी करने का कोई आधार नहीं बनता। उनका कहना है कि बिजली की दरें बढ़ाने की बजाय 10 से 20 प्रतिशत तक कम की जानी चाहिए।

अवधेश वर्मा ने यह भी कहा कि नोएडा पावर कंपनी (एनपीसीएल) के उपभोक्ताओं को मिल रही 10 प्रतिशत की छूट जारी रखने के लिए परिषद संघर्ष करेगी। उनका दावा है कि उत्तर प्रदेश लगातार छठे वर्ष भी बिजली दरें नहीं बढ़ाने वाला राज्य बन सकता है।

बिजली दरों को लेकर जनसुनवाई और राज्य सलाहकार समिति की बैठकें पूरी हो चुकी हैं। अब सभी की नजर राज्य विद्युत नियामक आयोग के अंतिम फैसले पर टिकी है, जो कभी भी नई दरों की घोषणा कर सकता है।

उधर, विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति ने बिजली कर्मचारियों की लगातार घटती संख्या पर चिंता जताई है। समिति का कहना है कि प्रदेश में बिजली की मांग लगातार बढ़ रही है, लेकिन कर्मचारियों की संख्या घटने से व्यवस्था प्रभावित हो रही है।

समिति के संयोजक शैलेंद्र दुबे ने बताया कि वर्ष 2000 में प्रदेश में करीब 60 लाख उपभोक्ता थे और 1.20 लाख कर्मचारी कार्यरत थे। अब उपभोक्ताओं की संख्या बढ़कर करीब 3.73 करोड़ हो गई है, जबकि कर्मचारियों की संख्या घटकर 30 हजार से भी कम रह गई है।

उन्होंने कहा कि वर्ष 2000 में प्रदेश में बिजली की मांग 6,500 से 7,000 मेगावाट के बीच थी, जो अब बढ़कर लगभग 33 हजार मेगावाट तक पहुंच गई है। इतने कम कर्मचारियों के सहारे बेहतर बिजली आपूर्ति बनाए रखना मुश्किल होता जा रहा है। इसी वजह से कई जगहों पर घोषित रोस्टर के अनुसार बिजली नहीं मिल पा रही है।

संघर्ष समिति ने मुख्यमंत्री से मांग की है कि हटाए गए सभी संविदा कर्मचारियों को तत्काल बहाल किया जाए। मार्च 2023 के बाद की सभी उत्पीड़नात्मक कार्रवाइयों को वापस लिया जाए, खाली पदों पर नियमित भर्ती की जाए और निजीकरण के नाम पर हुई संविदा कर्मचारियों की छंटनी पर रोक लगाई जाए।

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