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फर्क में भी फर्क होता है जनाब

Writer D by Writer D
19/12/2021
in Main Slider, उत्तर प्रदेश, ख़ास खबर, राजनीति, लखनऊ
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सियाराम पाण्डेय शांत

फर्क तलाशना जितना आसान दिखता है, उतना है नहीं। फर्क तलाशने के लिए अनुभव और विवेक की दो आंखें चाहिए। पूर्वाग्रह और स्वार्थ का चश्मा लगाकर तो फर्क तलाशा ही नहीं जा सकता।  इधर जिस तरह उपयोगी और अनुपयोगी ठहराने का चलन बढ़ रहा है, ऐसे में तो विवेक का चश्मा और भी अधिक प्रासंगिक हो जाता है।  हर आदमी का आंकलन अलग होता है। प्रतिद्वंद्वी में खोट और मित्र में सारे गुण  देखना तो मानव का मनोविज्ञान है। इसलिए तटस्थ रहना पड़ता है वर्ना फर्क में भी फर्क हो जाता है। यह बिल्कुल ग्रहों की महादशा में अंतर्दशा जैसा ही मामला है।  आजकल  जिसे देखिए, वही फर्क तलाश रहा है। न केवल तलाश रहा है बल्कि उसे नुमायां भी कर रहा है। पब्लिसिटी स्टंट भी बना रहा है। एक विज्ञापन आजकल सुर्खियों में है। फर्क साफ है।

इसमें एक दल का दावा है कि  उसकी सरकार बनने से पहले प्रदेश में कुछ भी अच्छा नहीं था, लेकिन उसके कार्यकाल में सब कुछ अच्छा हुआ है।  आत्मप्रशंसा का इससे बेहतरीन नमूना दूसरा कुछ हो भी नहीं सकता। जनता सरकार बदलती ही इसलिए है कि पहले से कुछ बेहतर हो। बदलाव प्रकृति का नियम है। प्रकृति में तो हर कुछ बदलता रहता है और वह बदलाव दिखता भी है। प्रकृति के लिए तो कहा जाता है कि वह हर क्षण नवीनता को प्राप्त होती है। आचार्य भवभूति ने उत्तररामचरितम में लिखा है कि  ‘क्षणे-क्षणे य: नवतामुपैति तदैव रूपं इति रम्यताया:।’ रोज सुबह होती है। दोपहर होती है। शाम होती है। फूल खिलते हैं। पक्षी बोलते हैं। नदी की हर लहर नई होती है। व्यक्ति हर सांस नई  लेता है। बांसुरी में फूंकी जाने वाली हर श्वांस नई होती है।  वह तो व्यक्ति ही है जो प्रकृति के संदेशों को समझ नहीं पाता।  वह बदलना नहीं चाहता। इस चराचर जगत में सब कुछ बदल रहा है। बदलता दिख रहा है। कुछ भी स्थिर नहीं है। स्थिर होता तो कबीरदास यह क्यों कहते कि ‘का मांगू कछु थिर न रहाई। देखत नैन चला जग जाई।’

आदि शंकराचार्य ने तो  ब्रह्म को सत्य और संसार को मिथ्या बता दिया। सर्वं खल्विदं ब्रह्म, ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या। सबसे बड़ी बात है कि बदलाव निश्चित है। जो बदलना न चाहे, उसे मजबूरन बदलना पड़ेगा। प्रकृति बदल देगी। ‘धरा को प्रमान यही तुलसी जो जो जरा सो बरा जो बरा सो बुताना। ’इसलिए अहंकार भाव से रहित होकर सिर्फ अपने हिस्से की जिम्मेदारी निभानी है, वह भी निष्काम भाव से। यही मोक्ष और कैवल्य का मार्ग है। समस्याओं से मुक्ति का मार्ग है। कर्मयोग में भगवान श्रीकृष्णने कहा कि व्यक्तिको आसक्तिरहित कर्म करना चाहिए।  कर्म करते हुए भी कर्मभाव से मुक्त रहना चाहिए। मैंने किया की अहमन्यता  दूसरों को कष्ट देती है। वे आलोचना को विवश होते हैं और जब आलोचना होती है तो कर्ताभाव को प्राप्त व्यक्ति को दुख होता है। भारतीय संस्कृति नेकी कर दरिया में डालने की बात करती है। उसमें अपने काम के प्रचार और मार्केटिंग का भाव कभी रहा ही नहीं। भारत को एक बार फिर जगद्गुरु बनाने के दावे किए जा रहे हैं  लेकिन भारत जब विश्वगुरु हुआ करता था तब उसकी कथनी और करनी में फर्क नहीं हुआ करता था। वह जो काम दूसरों  को करने के लिए कहता है, उसे खुद भी करता था। दुर्भाग्यवश आज देश में वह भाव नहीं रहा। हर व्यक्ति को अपनी क्षमता का शत-प्रतिशत अपने परिवार, समाज, नियोक्ता और देश को देना चाहिए। जो जहां है, जिस किसी पद  पर है, उसे वहीं से देश को आगे ले जाना है।  इसके लिए किसी को भी एक जगह एकत्र होने की जरूरत नहीं है। देश मेरा है। मैं  देश का हूं।  देश के प्रति मेरी जिम्मेदारी है कि मैं उसके लिए काम करूं।  यह भाव आते ही सारे फर्क स्वयमेव समाप्त हो जाते हैं। किसी छोटी रेखा को बड़ा नहीं करना पड़ता।

स्वामी रामानंद को काशी में एक विद्वान ब्राह्मण शास्त्रार्थ की चुनौती दे गया।  स्वामी रामानंद  यद्यपि कि असाधारण विद्वान थे लेकिन वे परेशान हो गए। परेशानी की  वजह यह थी कि यदि वे शास्त्रार्थ में हारते तो काशी की बदनामी होती और जीतते तो  उन्हें जीत का अहंकार होता और पराजित विद्वान को अपमानित होना पड़ता।  यह और बात है कि कबीरदास जी की हिकमत से वह शास्त्रार्थ नहीं हुआ और स्वामी रामानंद जी एक बड़े धर्मसंकट से बच गए? क्या इस तरह का भावबोध सत्ताशीर्ष पर बैठे राजनीतिक दलों में आ सकता है? जनता जिस किसी राजनीतिक दल को सत्ता सौंपती है, उससे उसकी अपनी आकांक्षाएं भी होती है। वह दिक्कत, किल्लत और जिल्लत से दूर रहना चाहती है।  किसने क्या किया,क्या नहीं किया, यह मायने नहीं रखता। मायने यह रखता है कि नागरिक सुविधाओं में इजाफा हुआ या नहीं हुआ। कानून का राज स्थापित हुआ या नहीं हुआ। किस योजनाका किसने शिलान्यास किया, किसने उद्घाटन किया, मायनेखेज यह भी नहीं। मायने तो यह रखता है कि काम समय पर ईमानदारी और गुणवत्तापूर्ण ढंग से हुआ या नहीं।

Tags: Lucknow Newspolitical newsup newUP Politics
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