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वट सावित्री पूर्णिमा कब? जानें इसका महत्व

Vat Savitri Vrat

Vat Savitri Vrat

वट सावित्री (Vat Savitri) व्रत दो बार रखा जाता है, एक ज्येष्ठ माह की अमावस्या पर जिसे वट सावित्री व्रत कहते हैं। वहीं, एक ज्येष्ठ माह की पूर्णिमा पर रखा जाता है, जिसे वट सावित्री पूर्णिमा के नाम से जाना जाता है। वट सावित्री पूर्णिमा व्रत का महिलाओं के लिए खास महत्व है। इस दिन सुहागिन महिलाएं व्रत रखती हैं और वट वृक्ष की पूजा-अर्चना करती हैं। धार्मिक मान्यता है कि इस व्रत का पालन करने से अखंड-सौभाग्य की प्राप्ति होती है। ऐसे में अगर आप भी वट पूर्णिमा का व्रत रखने जा रही हैं, तो चलिए आपको बताते हैं कि इस साल वट सावित्री पूर्णिमा का व्रत कब रखा जाएगा और पूजा की विधि क्या है।

2025 में वट सावित्री (Vat Savitri) पूर्णिमा कब है?

हिंदू पंचांग के अनुसार, ज्येष्ठ पूर्णिमा तिथि 10 जून को सुबह 11:35 मिनट पर शुरू होगी। वहीं, इस तिथि का समापन अगले दिन 11 जून को दोपहर 01:13 मिनट पर होगा। ऐसे में वट सावित्री पूर्णिमा 10 जून को मनाई जाएगी। हालांकि, वट पूर्णिमा का स्नान-दान 11 जून को किया जाएगा।

वट सावित्री (Vat Savitri) पूर्णिमा क्यों मनाई जाती है?

धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस दिन सावित्री ने अपने पति सत्यवान को यमराज के प्रकोप से जीवित कराया था। सत्यवान का शव वट वृक्ष के नीचे रखा गया और सावित्री ने वट वृक्ष की पूजा की, इसलिए इसे वट सावित्री कहा जाता है। इसमें विवाहित महिलाएं अपने पति के अच्छी सेहत और लंबी उम्र के लिए व्रत रखती हैं। साथ ही, बरगद के पेड़ की पूजा करती हैं।

व्रट सावित्री (Vat Savitri) पूर्णिमा की पूजा कैसे करें?

– इस पूर्णिमा के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें।
– फिर लाल रंग के कपड़े पहनें और महिलाएं 16 शृंगार करें।
– वट वृक्ष के पास जाकर पहले उसकी सफाई करें।
– फिर वृक्ष की जड़ में जल चढ़ाएं और उसकी पूजा करें।
– इसके बाद वट वृक्ष के चारों ओर 7 बार मौली का धागा लपेटें।
– हर परिक्रमा पर अपने पति की लंबी उम्र और स्वास्थ्य की कामना करें।
– फिर वट वृक्ष के नीचे बैठकर सावित्री और सत्यवान की कथा पढ़ें या सुनें।
– अंत में बरगद के पेड़ की आरती करें और व्रत पारण सात्विक भोजन से करें।

वट पूर्णिमा पूजा मंत्र

वट सिंचामि ते मूलं सलिलैरमृतोपमैः । यथा शाखाप्रशाखाभिर्वृद्धोऽसि त्वं महीतले। तथा पुत्रैश्च पौत्रैश्च सम्पन्नं कुरु मां सदा ॥

अवैधव्यं च सौभाग्यं देहि त्वं मम सुव्रते। पुत्रान् पौत्रांश्च सौख्यं च गृहाणार्घ्यं नमोऽस्तु ते॥

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