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कोई सरकार वास्तव में चुनाव सुधार नहीं चाहती

Writer D by Writer D
08/12/2020
in Main Slider, राजनीति, राष्ट्रीय
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election

election

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जे.एस.छोकर

वर्षों से मांग की जाती रही है कि दागी नेताओं के राजनीति में प्रवेश पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए। पर केंद्र सरकार ने हाल ही में सुप्रीम कोर्ट में आपराधिक छवि या अपराधों के लिए दोषी ठहराए जा चुके नेताओं के संसद या विधानसभा चुनाव लड़ने, राजनीतिक पार्टी में बने रहने पर आजीवन प्रतिबंध लगाए जाने की मांग का विरोध किया है। इससे फिर यह स्पष्ट होता है कि कोई सरकार वास्तव में चुनाव सुधार नहीं चाहती। छोटे-मोटे सुधारों की अनुमति सरकारें दे देती हैं, पर कोई महत्वपूर्ण सुधार करने के पक्ष में वे नहीं होतीं, क्योंकि किसी राजनीतिक पार्टी की इसमें दिलचस्पी नहीं है। बिहार विधानसभा चुनाव में बहुत से आपराधिक छवि के लोगों का चुनकर आना भी यही बताता है।

करीब बीस साल से एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) चुनाव सुधार की मांग कर रहा है। वर्ष 1999 में एडीआर ने जब दिल्ली हाई कोर्ट में जनहित याचिका दायर की थी कि उम्मीदवारों को अपने ऊपर चल रहे आपराधिक मामलों के बारे में शपथपत्र में बताना चाहिए, तो उसका केंद्र सरकार ने खूब विरोध किया था। जब हाई कोर्ट ने याचिका के पक्ष में फैसला दिया, तो इसके खिलाफ सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी। सरकार की अपील के पक्ष में तब लगभग सारी राजनीतिक पार्टियां एकजुट हो गई थीं। फिर भी सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राजनीति के अपराधीकरण को रोकने के लिए इसे लागू करना चाहिए।  फिर 22 दलों ने सर्वदलीय बैठक में सर्वसम्मति से फैसला लिया कि सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को लागू नहीं होने दिया जाएगा। सरकार ने जनप्रतिनिधित्व कानून में संशोधन के लिए एक विधेयक तैयार किया, ताकि सुप्रीम कोर्ट का फैसला लागू न हो सके।

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पर वह संशोधन विधेयक संसद में पेश करने से पहले संसद भंग हो गई। उसके बाद सरकार ने उस विधेयक को अध्यादेश की शक्ल में राष्ट्रपति को भेजा, जिसे राष्ट्रपति ने वापस कर दिया। सरकार ने उस अध्यादेश को फिर भेजा, नतीजतन राष्ट्रपति को उस पर हस्ताक्षर करने पड़े। इस तरह जनप्रतिनिधित्व कानून में संशोधन हो गया और सुप्रीम कोर्ट का फैसला रद्द हो गया। एडीआर ने फिर यह कहते हुए सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया, कि जनप्रतिनिधित्व कानून में जो संशोधन किया गया है, वह असांविधानिक है। इस पर सुनवाई के बाद मार्च, 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने जनप्रतिनिधित्व कानून में संशोधन को निरस्त कर दिया और कहा कि इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट ने पहले जो फैसला दिया था, वही अस्तित्व में रहेगा। उसके बाद उम्मीदवारों द्वारा आपराधिक मामलों से संबंधित शपथपत्र प्रस्तुत किए जाने लगे। यानी सरकारों और राजनीतिक दलों का पारदर्शिता में कोई विश्वास नहीं है।

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वर्ष 2003 से एडीआर उम्मीदवारों द्वारा पेश शपथपत्र में उल्लेखित आपराधिक मामलों की सूचना प्रकाशित करने लगा। 2004 में लोकसभा के 25 फीसदी सदस्य ऐसे थे, जिनके खिलाफ आपराधिक मामले चल रहे थे। 2009 में ऐसे सदस्यों की संख्या बढ़कर 30 फीसदी और 2014 में 36 फीसदी हो गई। मौजूदा लोकसभा में करीब 43 फीसदी सांसद आपराधिक छवि के हैं। चुनाव दर चुनाव दागी सांसदों की बढ़ती संख्या चिंता का विषय है।

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दागी नेताओं को टिकट देने के संबंध में राजनीतिक दल दलील देते हैं कि जनता ही इन्हें वोट देकर जिताती है। लेकिन एडीआर का मानना है कि अगर राजनीतिक दल ऐसे दागी नेताओं को टिकट न दें, तो मतदाता द्वारा इन्हें वोट देने का सवाल ही नहीं होगा। दूसरी बात एडीआर दागी या संवेदनशील निर्वाचन क्षेत्रों का भी विश्लेषण करता है। दागी या संवेदनशील निर्वाचन क्षेत्र वैसे क्षेत्र को माना जाता है, जहां तीन या तीन से ज्यादा उम्मीदवार के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज होते हैं, क्योंकि किसी भी निर्वाचन क्षेत्र में आम तौर पर तीन उम्मीदवारों के ही चुनाव जीतने की संभावना होती है। ऐसे में अगर तीनों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं, तो मतदाताओं के पास क्या विकल्प बचता है! दागी या संवेदनशील निर्वाचन क्षेत्रों की संख्या भी अब बढ़ती जा रही है। पिछले लोकसभा चुनाव में ऐसे क्षेत्रों की संख्या 45 फीसदी थी और अभी संपन्न हुए बिहार चुनाव में ऐसे क्षेत्रों की संख्या 89 फीसदी थी। चुनाव आयोग ने भी कहा है कि जिस व्यक्ति के खिलाफ चुनाव की घोषणा से कम से कम छह महीने पहले आपराधिक मामले दर्ज हों, तथा ऐसे मामले दर्ज हों, जिनमें कम से कम पांच साल की सजा हो, और अदालत ने चार्ज फ्रेम कर दिए हों, तो उन्हें चुनाव लड़ने की अनुमति नहीं मिलनी चाहिए। कोर्ट में कई बार यह मामला उठा है, पर अदालत कहती है कि कानून बनाना या बदलना तो विधायिका का काम है। यह मामला एडीआर के शपथपत्र वाली याचिका में भी उठा था, जिसमें एडीआर के वकील ने तर्क दिया था कि कानून में अगर कोई कमी है या खामी है (गैप इन लॉ), और उसे दूर करने या खामी को पाटने का संसद को समय नहीं मिला या किसी कारणवश वह ऐसा नहीं कर पाई, तथा इससे लोकहित का नुकसान होता है, तो न्यायपालिका को यह अधिकार है और यह उसका कर्तव्य भी है कि वह कानून में जो कमी है, उसे दूर करे। पर शीर्ष अदालत इस पर राजी नहीं है और बात यहीं अटकी हुई है।

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आपराधिक छवि के नेताओं के खिलाफ वोटरों को नोटा का विकल्प दिया गया है, लेकिन वह प्रभावी नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अगर ज्यादा से ज्यादा लोग नोटा को चुनेंगे, तो पार्टियां अच्छे लोगों को टिकट देने के लिए मजबूर होंगी। उसके लिए होना यह चाहिए कि अगर किसी चुनाव में सबसे ज्यादा वोट नोटा को मिले, तो वहां से किसी प्रत्याशी को निर्वाचित घोषित नहीं करना चाहिए। पर अभी जो कानून है, उसके मुताबिक, अगर किसी क्षेत्र में 2,000 वोटर हैं, जिनमें से 1,999 ने नोटा को वोट दिया और एक वोटर ने किसी उम्मीदवार को, तो एक वोट पाने वाला उम्मीदवार जीत जाएगा। फिर पार्टियां ही प्रचार करती हैं कि नोटा को चुनना वोट खराब करना है। साफ है कि राजनीतिक दल दागियों को टिकट देना बंद नहीं करेंगे, न ही वे ऐसा कोई कानून बनने देंगे। ऐसे में, राजनीति के अपराधीकरण को रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट को आगे आना होगा।

Tags: election commissionElection newsNational news
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