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 फर्जी एंकाउंटर में 34 पुलिसकर्मियों की जमानत अर्जी खारिज, 10 सिखों की हत्या का आरोप

Writer D by Writer D
27/05/2022
in Main Slider, उत्तर प्रदेश, क्राइम, पीलीभीत
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fake encounter

fake encounter

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पीलीभीत। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने गुरुवार को पीलीभीत में 1991 में दस सिखों के एनकाउंटर (fake encounter) में हत्या करने के मामले में 2016 में दोषी करार दिये गये 34 पुलिसकर्मियों की जमानत याचिका खारिज कर दी है।

कोर्ट ने कहा कि अपीलों के विचाराधीन रहने के दौरान उनको रिहा करने का कोई औचित्य नहीं है। कोर्ट ने उनकी अपीलों पर सुनवाई के लिए 25 जुलाई की तारीख तय की है।

यह आदेश जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस बृजराज सिंह की पीठ ने देवेंद्र पांडेय और अन्य की ओर से अपीलों के साथ अलग से दाखिल जमानत प्रार्थना पत्रों को खारिज करते हुए पारित किया।

21 साल पहले हुआ था 11 सिखों का फर्जी एनकाउंटर (Fake Encounter)

अभियोजन पक्ष के अनुसार कुछ सिख तीर्थयात्री 12 जुलाई 1991 को पीलीभीत से एक बस से तीर्थयात्रा के लिए जा रहे थे। इस बस में बच्चे और महिलाएं भी थीं। इस बस को रोक कर 11 लोगों को उतार लिया गया। इनमें से 10 की पीलीभीत के न्योरिया, बिलसांदा और पूरनपुर थानाक्षेत्रों के धमेला कुंआ, फगुनिया घाट व पट्टाभोजी इलाके में एनकाउंटर दिखाकर हत्या कर दी गई। आरोप है कि 11वां शख्स एक बच्चा था जिसका अब तक कोई पता नहीं चला।

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CBI ने की थी मामले की जांच

इस केस की जांच पहले पुलिस ने किया, लेकिन केस में फाइनल रिपोर्ट लगा दी। जिसके बाद एक अर्जी पर सुप्रीम कोर्ट ने जांच सीबीआई को सौंप दिया। सीबीआई ने विवेचना के बाद 57 अभियुक्तों को आरोपित किया। विचारण के दौरान दस अभियुक्तों की मौत हो गई। सीबीआई की लखनऊ स्थित विशेष अदालत ने 4 अप्रैल 2016 को केस में 47 अभियुक्तों को घटना में दोषी करार दिया और उम्र कैद की सजा सुनाई। जिसके खिलाफ सभी ने हाईकोर्ट में अलग-अलग अपीलें दाखिल किया। अपीलों के साथ सभी ने जमानत की अर्जियां भी दी ताकि उन्हें अपीलों के विचाराधीन रहने के दौरान जमानत मिल जाये।

आरोपी पुलिसवालों का दावा- मारे गए खालिस्तान लिब्रेशन फ्रंट के आतंकी

अपील करने वाले पुलिसवालों की ओर से दलील दी गई कि मारे गए दस सिखों में से बलजीत सिंह उर्फ पप्पू, जसवंत सिंह उर्फ ब्लिजी, हरमिंदर सिंह उर्फ मिंटा तथा सुरजान सिंह उर्फ बिट्टू खालिस्तान लिब्रेशन फ्रंट के आतंकी थे, इसके साथ ही उन पर हत्या, डकैती, अपहरण व पुलिस पर हमले जैसे जघन्य अपराध के मामले दर्ज थे। अपील करने वालों की ओर से आगे दलील दी गई थी कि मृतकों में कई का लम्बा आपराधिक इतिहास था। यही नहीं वे खालिस्तान लिब्रेशन फ्रंट नामक आतंकी संगठन के सदस्य थे।

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कोर्ट ने कहा- इनमें से कुछ का कोई आपराधिक इतिहास नहीं

कोर्ट ने अपने आदेश में कहा है कि मृतकों में से कुछ का कोई आपराधिक इतिहास नहीं था, ऐसे में सभी को आतंकी मानकर उन्हें उनकी पत्नियों और बच्चों से अलग कर के मार देना किसी भी तरह से जायज नहीं ठहराया जा सकता। कोर्ट ने आगे कहा कि मृतकों में से कुछ यदि असमाजिक गतिविधियों में शामिल भी थे और उनका आपराधिक इतिहास था, तब भी विधि की प्रक्रिया को अपनाना चाहिए था। इस प्रकार के बर्बर और अमानवीय हत्याएं उन्हें आतंकी बताकर नहीं करनी चाहिए थी।

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कोर्ट ने रमेश चंद्र भारती, वीरपाल सिंह, नत्थु सिंह, धनी राम, सुगम चंद, कलेक्टर सिंह, कुंवर पाल सिंह, श्याम बाबू, बनवारी लाल, दिनेश सिंह, सुनील कुमार दीक्षित, अरविंद सिंह, राम नगीना, विजय कुमार सिंह, उदय पाल सिंह, मुन्ना खान, दुर्विजय सिंह पुत्र टोडी लाल, महावीर सिंह, गयाराम, दुर्विजय सिंह पुत्र दिलाराम, हरपाल सिंह, रामचंद्र सिंह, राजेंद्र सिंह, ज्ञान गिरी, लखन सिंह, नाजिम खान, नारायन दास, कृष्णवीर, करन सिंह, राकेश सिंह, नेमचंद्र, शमशेर अहमद, सतिंदर सिंह और बदन सिंह के जमानत प्रार्थना पत्रों को खारिज किया है।

Tags: 1991 fake encountercrime newsFake Encounterpilibheet newsup news
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