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बेबस सरकार की मजबूरियां भी तो समझें आंदोलनकारी

Desk by Desk
27/12/2020
in Main Slider, नई दिल्ली, राजनीति, राष्ट्रीय
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बेबस सरकार helpless government

बेबस सरकार

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दिनेश दुबे

महीने भर से देश की राजधानी दिल्ली को घेरकर हाल ही में बनाये गए तीन किसान कानूनों के विरोध में आंदोलन कर रहे किसानों से शुक्रवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दो टूक कह दिया कि सरकार द्वारा लागू किये गए कानून वापस नहीं लिए जायेंगे। हां… सरकार किसानों के साथ खुले मन से बातचीत करने के लिए तैयार है।

पूर्व प्रधानमंत्री स्व.अटल बिहारी बाजपेयी की जयंती ‘सुशासन-दिवस’ पर आयोजित कार्यक्रम में देश के 9 करोड़ किसानों को ‘किसान-सम्मान निधि’ के दो-दो हजार रुपये की क़िस्त उनके खातों में भेजने की प्रकिया को शुरू करने के बाद प्रधानमंत्री ने जिस अंदाज में किसानों से बातचीत की उससे साफ हो गया है कि सरकार की जरूर कोई ऐसी मजबूरी है जिसकी वज़ह से सरकार ख़ुद के बनाये हुए कानून वापस नहीं ले पा रही है,जबकि पूर्व से ही बने कानून ध्वस्त करने और नए कानून बनाने में सरकार को महारथ हांसिल है।

फिर चाहे देश के सर्वोच्च न्यायालय की मंशा को ही नजरअंदाज क्यों न करना पड़े। ऐसे में यह जरूरी हो गया है कि आंदोलनकारी किसानों को सरकार की मजबूरी समझनी ही चाहिए। सरकार से भी मेरी गुज़ारिश है कि वह भी किसान आंदोलन में शामिल किसानों पर राजनैतिक हथकण्डे अपनाना छोंड़ दे और उनकी मांगों के मुताबिक अपनी मजबूरी व अंतर्राष्ट्रीय असलियत समझाकर उन्हें मनाए,यही एकमात्र रास्ता है और यही देशहित में है।

आंदोलनकारी किसानों के रूप में सिखों को खालिस्तानी और पश्चिमी यूपी के जाटों को पाकिस्तानी परस्त बताने में जुटी सरकार व सत्तारुढ़ दल के साथ ही उनके समर्थकों को चाहिए कि वो किसानों को शालीनता से उस अंतर्राष्ट्रीय संस्था विश्व व्यापार संगठन जिसे पूर्व में गैट के नाम से जाना जाता था उसके बारे में ककहरा की तरह समझाए। जिस संस्था के सन 1948 से संस्थापक सदस्य रहे भारत को सन 1995 में जब नए सिरे से समझौता करना था तब संसद में चर्चा क्यों नहीं करायी गई और पेटेंट कानून को देश पर क्यों थोप दिया गया।

वही अंतर्राष्ट्रीय कानून जो इस समय विश्व व्यापार संगठन के रूप में भारत पर लागू है और जिसके तहत विकाशसील देश भारत को कृषि पर अनुदान कम करने की विवशता है। जिस विवशता के कारण मौजूदा सरकार को ये तीनों कृषि कानून बनाने पड़े है! उसकी सच्चाई को खुले मन से स्वीकार करने और देश वासियों को बताने में दिक्कत क्या है ? जिस तरह सत्तारुढ़ दल के नेता गांव-गांव जाकर किसानों को समझाने के नाम पर जनता को ग़ुमराह कर रहे हैं।

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उसी तरह जनता को वैश्विक हालातों से रुबरु कराने में उन्हें समस्या क्या है ? उन्हें जनता को बताना चाहिए कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खास दोस्त व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ही चीन तथा भारत जैसे विकासशील देशों द्वारा “स्व-घोषित विकासशील देश के दर्जे” के तहत विश्व व्यापार संगठन से विशेष और विभेदक व्यवहार के रूप में प्राप्त विशेष लाभों पर आपत्ति जताई थी।

उनकी राय में ये देश जो वर्तमान में विश्व व्यापार संगठन में “विकासशील” देशों की श्रेणी में आते हैं अब वे विकास एवं उन्नति के कारण विशेषाधिकारों को प्राप्त करने के पात्र नहीं रहे हैं। जबकि इन देशों के लिए ये विशेषाधिकार मूल रूप से बहुपक्षीय व्यापार निकाय में विकासशील देशों की भागीदारी को प्रोत्साहित करने के लिए निर्धारित हैं। इस तरह अमेरिकी राष्ट्रपति ने विश्व व्यापार संगठन में एक पक्षीय माध्यम से उन प्रावधानों को निरस्त करने की घोषणा करा रखी है जिसके तहत विश्व व्यापार संगठन अपने कुछ सदस्य देशों को अनुदान देता चला आ रहा है।

ऐसे में सरकार और सत्तारुढ़ दल को चाहिए कि वो देश की जनता को साफ़तौर पर यह भी समझाए विश्व व्यापार संगठन के परिप्रेक्ष्य में भारत सरकार ने अमेरिका के साथ एक द्विपक्षीय समझौता 29 दिसंबर 1999 को भी किया था जिसकी शर्तों को पूरा करने के लिए हाल ही के वर्षों में भारत सरकार ने लगभग सभी उत्पादों के आयात से प्रतिबंध भी हटा दिए हैं जिसमें अधिकांशतः उपभोक्ता उत्पाद हैं। फिर भी भारत के गिरते निर्यात की वज़ह से स्थिति सम्भल नहीं पा रही है।

चूंकि डब्ल्यूटीओ मान चुका है कि भारत से अमेरिका में निर्यात होने वाले उत्पादों पर जो सब्सिडी दी जाती है वह तय नियमों का उल्लंघन है। डब्ल्यूटीओ का यह फ़ैसला भारत के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत अपने उत्पादों का सबसे अधिक निर्यात अमरीका में ही करता है। चूंकि बदले हुए परिवेश में भारत को विश्व व्यापार संगठन से मिलने वाले अनुदान के जारी रहने की आशा कम नज़र आ रही है।

इसलिए ऐसा लगता है कि भारत की मौजूदा सरकार के मुखिया नरेंद्र मोदी ने सत्ता की अति महत्वाकांक्षा में राजनीति और कूटनीति की सीमाएं तोड़कर विश्व व्यापार संगठन व अमेरिकी सरकार से रास्ता निकलवाने में कामयाबी हांसिल करने के बजाय देश के किसानों से ही उलझने का मन बना लिया है। इससे साफ है कि सत्ता में बने रहने के लिए जिस तरह की गलतियां पूर्ववर्ती सरकारों द्वारा की जातीं रहीं उसी तरह की गलतियां यह सरकार भी दोहराने जा रही है।

विश्व व्यापार संगठन के नियमों के मुताबिक भारत के पास अभी कुछ ऐसे रास्ते शेष बचे हैं जिनके जरिये भारत अपने उत्पादों के निर्यात में अनुदान पा सकता है। यह बात अलग है कि विश्व व्यापार संगठन के आलोचकों ने 1995 में ही इसके गठन और प्रांरभिक वार्ताओं के आधार पर इसके भविष्य को लेकर निराशा व्यक्त की थी। आलोचकों का तर्क था कि यह संगठन मुख्य रूप से विकसित देशों की विकासशील देशों के उभरते बाजारों पर कब्जा करने की सोची-समझी रणनीति होगी। जो इस समय परिलक्षित हो रही है। शायद यही वजह है कि हमारे प्रधानमंत्री पिछले छः माह से ‘लोकल को वोकल’ बनाने पर जोर तो दे रहे है लेकिन उसके परिणाम अभी तक तो निराशाजनक ही रहे हैं।

भारत और उसके साथ खड़े देश जिसमें चीन भी शामिल है वह भी चाहता है कि सार्वजनिक भंडारण, न्यूनतम समर्थन मूल्य तथा खाद्य सुरक्षा पर उन संकल्पों का पालन किया जाये जो विश्व व्यापार संगठन के मंत्री स्तरीय 2013 के बाली सम्मेलन तथा 2015 के नैरोबी सम्मेलन में व्यक्त किये गये थे। बाली सम्मेलन में शामिल किये गये ‘शांति अनुच्छेद’ के तहत यह प्रावधान था कि अगली बैठक तक इस अस्थायी अनुच्छेद पर यदि कोई आम राय नहीं बनती और कोई देश तय सीमा से ज्यादा भंडारण करता या सब्सिडी देता है तो उस पर कोई कार्रवाई नहीं की जा सकेगी।

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जबकि अफ्रीका महाद्वीप के कुछ देश तो ‘कृषि समझौते’ में खाद्यान्न के अलावा अन्य खाद्य पदार्थो की खरीद में छूट भी चाहते है। लेकिन भारत 2013 में लागू किये गए खाद्य सुरक्षा अधिनियम को ध्यान में रखकर कृषि समझौते का स्थायी समाधान चाहता रहा है और इस मुद्दे पर दूसरे विकासशील देश भी भारत से सहमत रहे हैं। लेकिन एक अन्य मसला आयात शुल्क को लेकर है जो ‘स्पेशल सेफगार्ड मैकन्जिम’ कहलाता है।

इसमें प्रावधान है कि अगर किसी विकसित देश की सब्सिडी के कारण किसी विकासशील देश में उसके कृषि उत्पादों का आयात बढ़ता है तो विकासशील देश की घरेलू बाजार में कीमतें ज्यादा गिर जायेगी। इससे बचने के लिए वह देश आयात शुल्क लगा सकता है। यह प्रावधान भी भारत के लिए महत्वपूर्ण है, लेकिन विकसित देश अपने किसानों को इतनी अधिक सब्सिडी देते है कि भारत द्वारा अधिकतम आयात शुल्क लगाकर भी उसका मकसद हल नहीं हो सका है। फलस्वरूप सरकार ने मजबूरी में ये तीनों कृषि कानून बनाये है ?
( लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं )

Tags: Food securityhelpless governmentMSPPublic storageSupreme CourtWorld Trade Organizationकृषि समझौतेखाद्य सुरक्षाघरेलू बाजारन्यूनतम समर्थन मूल्यप्रधानमंत्री नरेंद्र मोदीबेबस सरकारविश्व व्यापार संगठनसर्वोच्च न्यायालयसार्वजनिक भंडारण
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