(चन्द्रशेखर पण्डित भुवनेश्वर दयाल उपाध्याय..पण्डितजी के प्रपौत्र….)
……बरस 1968 की नौ फरवरी..मैं लगभग आठ वर्ष की थी… पिता श्री ईश्वरी प्रसाद शर्मा (अब दिवंगत) उन दिनों वेस्टर्न- रेलवे में एक वरिष्ठ-अधिकारी के पद पर तैनात थे.. हमारा परिवार मुंबई के माटुंगा-रोड रेलवे स्टेशन के सामने स्थित रेलवे के एक फ्लैट्स में रहता था..
उस उम्र में मुझे रिश्ते-नातों की बहुत अधिक समझ नहीं थी और न ही राजनीतिक दुनिया की कोई जानकारी..मेरा समूचा संसार बस मेरा घर..माता-पिता.. भाई-बहन.. स्कूल..खेल-खिलौने और आस-पास का परिवेश..यहीं तक सीमित था…
उस दिन पिताजी ने सुबह मां से कहा-
‘दीना-मामा घर आने वाले हैं’
मैंने सोचा कि पिताजी के मामाजी यानि कोई बहुत बड़े बुजुर्ग रिश्तेदार आने वाले हैं..जब शाम को वह घर आए तो पिताजी ऑफिस से घर नहीं लौटे थे..
दरवाजे की घंटी बजी.. माँ ने मुझसे कहा—
‘बेटा…जाओ देखो.. शायद मामाजी आ गए हैं?’
मैंने दरवाजे के पास एक स्टूल लगाया… उस पर चढ़कर झाँका और वापस आकर माँ से कहा—
‘नहीं माँ… पापा के मामा जी नहीं हैं.. कोई गाँव का आदमी है…धोती-कुर्ता पहने हुए है और कंधे पर झोला लटका रखा है’

माँ समझ गयीं और उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा—
‘अरे, वो तो दीना मामा हैं..’ जा.. दरवाजा खोलकर आ..मां उनसे परदा करती थीं..मैंने मां की बात मानी..दौड़कर दरवाजा खोला…
सामने एक बहुत ही साधारण से व्यक्ति खड़े थे—धोती-कुर्ता.. आँखों पर चश्मा.. पैरों में साधारण-सी चप्पल और कंधे पर एक सादा-सा खादी का झोला..
मुझे आज भी उस झोले की छवि याद है.. शायद उसमें कुछ पुस्तकें और कपड़े रहे होंगे ?
उस समय मैं कहाँ समझती थी कि उस साधारण-से दिखने वाले व्यक्ति का व्यक्तित्व कितना असाधारण है ?
वो और कोई नहीं, हमारे परम आदरणीय पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी थे… जिन्हें हमारे परिवार में स्नेह और आदर से “दीना मामा” कहा जाता था।
वे घर के अंदर आए और बैठ गए…परदा करने के कारण मां उनसे साधे बातचीत नहीं कर रहीं थीं..उस समप जो भी बातचीत हो रही थी.. वह मेरे माध्यम से ही हो रही थी..
दीना मामा ने मुझसे मेरा नाम पूछा??मैं किस कक्षा में पढ़ती हूँ??क्या पढ़ती हूँ?? और ऐसी ही न जाने कितनी छोटी-छोटी बातें पूछीं!!!
मैं मुंबई के वातावरण में पली-बढ़ी थी…इसलिए उस समय मेरी बातचीत अधिकतर अंग्रेज़ी में होती थी.. वह मुझसे हिंदी में प्रश्न पूछ रहे थे और मैं उनके उत्तर अंग्रेज़ी में दे रही थी..थोड़ी-देर में
पिताजी ऑफिस से लौटे तो उन्होंने हँसते हुए कहा—
‘इसरी यानी ईश्वरी प्रसाद.. तुमने तो अपनी बेटी को बड़ा होशियार बना रखा है’ यह तो हिन्दी में बात ही नहीं करती है..फिर खिलखिलाकर हंसे..!!!
उस समय मुझे उनके व्यक्तित्व..उनके विचारों अथवा उनके राजनीतिक- जीवन के बारे में कुछ भी पता नहीं था…मेरे लिए तो वे बस पिताजी के ‘मामाजी’ थे..
बालपन और बालमन का अपना एक अनूठा संसार होता है..
मैं उन्हें देखकर सोचती रही—ये पापा के मामा कैसे हो सकते हैं? उम्र में तो वह पिताजी के आसपास ही लगते हैं.. मैं उस समय सोच रही थी कि वह तो पापा के बड़े भाई यानि मेरे ताऊ-चाचा जैसे ही हैं..बड़ा होने पर समझ में आया कि
वास्तव में वह मेरे पिताजी के मामा ही थे पर वह मेरे लिए हमेशा दीना मामा ही रहे…

अगले दिन भी वह हमारे घर पर ही रहे.. माँ उनके सामने परदे में ही रहीं.. भोजन-पानी और घर की अन्य व्यवस्थाएँ उन्होंने ही कीं..लेकिन बातचीत मैंने और पिताजी ने….मैंने व पिताजी दोनों दिन उनसे खूब गपशप की..उन्होंने मेरी पढ़ाई..खेल-कूद और शरारतों को भी खूब चाव से सुना. उनकी यह एकमात्र और सबसे अनूठी स्मृति आज भी मेरे मानस-पटल पर स्पष्ट अंकित है..
अगले दिन उन्हें रवाना होना था… पिताजी सुबह ऑफिस चले गए. उन्हें विदा करने जब स्टेशन पहुँचे लेकिन विलम्ब हो गया जब पिताजी स्टेशन पहुंचे ट्रेन प्लेटफॉर्म पर रेंग रही थी.. दोनों के बीच केवल हाथ हिलाकर अभिवादन ही हो पाया.. पिताजी उन्हें उस दिन ठीक से विदा भी नहीं कर पाए ना ही कुछ कह सके..!!!
और फिर अगले ही दिन लखनऊ से कामेश्वर मामाजी (मेरे ममेरे दादाजी) का फोन आया..
उन्होंने वह दुःखद समाचार पिताजी को सुनाया, जिसकी हमने स्वप्न में भी कल्पना नहीं की थी—
दीना अब नहीं रहा!!उसकी नृशंस-हत्या कर दी गयी है..
मुगलसराय स्टेशन के यार्ड में उसका शव मिला है.!!! निर्मम-हत्या से मात्र एक दिन पहले हमारे घर में आखिरी बार भोजन करने वाले देश के पण्डित दीनदयाल उपाध्याय और हमारे परिवार के दीना-मामा अब एक चिरन्तन-स्मृति थे..
पिताजी बहुत दुःखी हुए.. उस दिन हमारे घर में ना तो भोजन बना और ना ही किसी ने भोजन किया..पिताजी को ताउम्र इस बात का अफसोस रहा कि वह उनसे अंतिम-बार ठीक से मिल नहीं पाए..उन्हें विदा नहीं कर पाए..!!! उन्हें उनकी पसन्दीदा मिठाई और नमकीन नहीं दे पाए..!!!उन दोनो का
रिश्ता मामा-भांजे का था.. लेकिन दोनों एक शानदार-जानदार दोस्त थे.. एक दूसरे के राजदार थे.. पंडितजी जब भी कोई महत्वपूर्ण निर्णय लेते..उसे पिताजी से साझा करते..वह पिताजी को पत्र भी लिखा करते थे और अपने मन की बात उनसे साझा करते थे..
पिताजी के सेवानिवृत्त होने के बाद हम अजमेर में बस गए थे..प्रेम-भवन क्षेत्र में हमारा घर था.. एक बार अजमेर में बहुत भयंकर बाढ़ आई..उस समय हमारा परिवार दक्षिण- भारत की यात्रा पर गया हुआ था..घर में लगभग चार-पाँच फीट तक पानी भर गया था
पिताजी द्वारा अनेक वर्षों से सुरक्षित रखीं उनकी अनेक महत्वपूर्ण फाइलें..कागजात.. पत्र और दस्तावेज..उस बाढ़ में नष्ट हो गए..
उन्हीं में पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी का एक बहुत महत्वपूर्ण पत्र भी था.. जिसका उल्लेख पिताजी अक्सर किया करते थे…
उस पत्र का सम्बन्ध आगरा से था..
आगरा में हमारा एक अन्य परिवार अर्थात मेरी मौसी स्वर्गीय श्रीमती पुष्पलता उपाध्याय एवं मेरे मौसाजी स्वर्गीय प्रोफेसर के.सी.उपाध्याय..एडवोकेट का बेलनगंज के कचौरा-बाजार में तिमंजिला आवास था. जो पण्डितजी के रक्त और वंश से आते हैं..मौसाजी सुप्रसिद्ध अधिवक्ता थे और स्वयं भी संघ के स्वयंसेवक थे…पण्डितजी के परामर्श व निर्देश पर संघ के प्रचारकों और स्वयंसेवकों की बैठकें तथा उनके ठहरने की व्यवस्था अक्सर उसी घर में हुआ करती थी.. पंडित जी संघ-कार्यालय के अलावा उसी घर में संघ के खास स्वयंसेवकों व जनसंघ के कार्यकर्ताओं से मिला करते थे..
पिताजी बताया करते थे कि तेरह मार्च 1942 को आगरा के उसी घर में पंडितजी ने भाऊदेवरस की उपस्थिति में संघ-प्रचारक बनने का अन्तिम-निर्णय लिया था.. पण्डितजी के निकट-परिजन पण्डित रामशरण उपाध्याय ‘वैद्य-शास्त्री’ के प्रपौत्र
मेरी उन्हीं मौसी और मौसाजी के सुपुत्र.. मेरे छोटे भाई चंद्रशेखर पण्डित भुवनेश्वर दयाल उपाध्याय न्यायविद.. ने आगरा के घर में संरक्षित एवम् सुरक्षित पण्डितजी द्वारा अपने जीवनकाल में प्रयुक्त की गई अनेक वस्तुओं को सरकार को सौंपा है..जिसे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 25 दिसम्बर 2025 को राष्ट्र को समर्पित किया है…..
किशोरावस्था में पण्डितजी मेरी स्वर्गीय दादी श्रीमती अशर्फी देवी और स्वर्गीय दादाजी शंकर लाल शर्मा के पास रेवाड़ी में भी रहे…. मेरे पिताजी भी उस समय वहीं पढ़ते थे….दोनों साथ-साथ अध्ययन किया करते थे..
रेवाड़ी में रेलवे के बंगलों में एक प्रकार का आउटहाउस कमरा हुआ करता था.. वही कमरा पिताजी के अध्ययन के लिए था और वहीं दीनदयाल जी भी बैठकर पढ़ा करते थे..
मेरी दूसरी मौसी..श्रीमती कमलेश मिश्रा..उस समय लगभग आठ-नौ वर्ष की थीं.. वह अपनी बड़ी बहन यानि मेरी माँ श्रीमती पार्वती देवी
के पास रहा करती थीं.. उनकी भी दीना मामा से जुड़ी अनेक बाल-स्मृतियाँ हैं..
वे बताया करती थीं कि वे दीना मामा को खाना खिलाने जाती थी..आउट -हाऊस के दरवाजे पर आवाज लगाकर भाग आती थीं..’दीना-मामा खाना रखा है..खा लेना..मौसी बताती थीं कि वह हमेशा शान्त रहते थे और हमेशा कुछ ना कुछ पढ़ते रहते थे..छोटे-छोटे कामों के लिए वह उन्हीं को पुकारते थे… बचपन के यह छोटे-छोटे प्रसंग आज बहुत बड़े लगते हैं, क्योंकि तब हमें यह कल्पना भी नहीं थी कि जिनके साथ हम इतने सहज रूप से घर-परिवार की तरह व्यवहार कर रहे हैं..रह रहे हैं.. वह भविष्य में इतिहास में इतनी महत्वपूर्ण जगह बनाने वाले हैं..
मेरे लिए पंडित दीनदयाल उपाध्यायजी की सबसे बड़ी पहचान हमेशा “दीना मामा” ही रही है और रहेगी..
बड़ा होने पर जब उनके जीवन-विचारों और कार्यों के बारे में जाना.. तब समझ में आया कि बचपन में हमारे घर आए वह साधारण से दिखने वाले दीना-मामा कितने असाधारण थे..









