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..तो क्यों न बन जाए एक दल मुसलमानों का भी

Desk by Desk
24/11/2020
in Main Slider, नई दिल्ली, बिहार, राजनीति, राष्ट्रीय
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एक दल मुसलमानों का A group of Muslims

एक दल मुसलमानों का

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आर.के. सिन्हा

बिहार विधानसभा के चुनाव पर न जाने क्यों देश के कथित सेक्युलरवादियों की खास नजरें थीं। वे महागठबंधन के हक में लगातार हर प्रकार से लिख-बोल रहे थे। उनका अफसोस यह रहा कि नतीजे उनके मनमाफिक नहीं आए। अब वे मांग करने लगे हैं कि जब देश में जाति/धर्म के आधार पर शिवसेना, बहुजन समाज पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, समाजवादी पार्टी जैसे दल खड़े हो सकते हैं तो फिर एक दल मुसलमानों का भी बन जाए। ये मुसलमानों का दल अखिल भारतीय स्तर पर बने। इनका मानना है कि यह दल मुसलमानों के हकों के लिए सक्रिय हो सकता है।

इस तरह की मांग करता एक लेख, देश के वरिष्ठ माने जानेवाले अंग्रेजी के लेखक स्वामीनाथन अय्यर ने लिखा है। यहां पाठकों को यह जानना जरूरी होगा कि वे कांग्रेस के पूर्व विवादास्पद सांसद मणिशंकर अय्यर जी के अनुज हैं। कहना न होगा कि एक पृथक मुस्लिम दल की मांग करना बेहद गॅंभीर मामला है। इस तरह की मांग करने वाले भूल रहे हैं कि आल इंडिया मुस्लिम लीग नाम की भी एक पार्टी थी, जिसने देश को धर्म के नाम पर 73 साल पहले बांट दिया था। वे यह भी भूल रहे हैं या भूलने का नाटक कर रहे हैं कि अब भी इस देश में मजलिसे इत्तेहादुल मुस्लेमीन (एमआईएम), इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग और ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (एआईयूडीएफ) जैसे मुस्लिम हितों के लिए लड़ने वाले कई मुस्लिम दल पहले से सक्रिय हैं और जहरीली राजनीति करने से बाज नहीं आ रहे हैं।

ओवैसी की पृष्ठभूमि

जिस ओवैसी की एमआईएम को बिहार में 5 सीटों पर सफलता मिली और उससे पहले लोकसभा चुनावों में दो सीटों पर विजयी मिली थी, उसने हैदराबाद के भारत में विलय का कड़ा विरोध किया था। सन 1927 में मजलिसे इत्तेहादुल मुस्लेमीन नाम की पार्टी बनी। इसपर शुरू से ही ओवैसी खानदान का कब्ज़ा रहा। पहले ओवैसी के दादा अब्दुल वाहिद ओवैसी का, उसके बाद उनके पिता सलाहुद्दीन ओवैसी का। अब असद्दुदीन ओवैसी और उसके भाई अकबरुद्दीन ओवैसी इसे चलाते हैं। एमआईएम हैदराबाद के गद्दार निजाम की कट्टर समर्थक थी।

यही वजह है कि जब 1947 में देश आजाद हुआ तो हैदराबाद रियासत के भारत में विलय का एमआईएम ने जमकर विरोध किया था। इसके हजारों समर्थक हैदराबाद को पाकिस्तान में शामिल करना चाहते थे। निज़ाम के राज्य में 95 प्रतिशत सरकारी नौकरियों पर उस समय मुसलमानों का ही कब्ज़ा था। सरदार पटेल ने हैदराबाद में देशद्रोही गतिविधियों से तंग आकर 10 सितंबर 1948 को हैदराबाद के निजाम को खत लिखा जिसमें उन्होंने हैदराबाद को भारत में शामिल होने का मौका दिया था। लेकिन हैदराबाद के धूर्त निजाम ने सरदार पटेल की अपील ठुकरा दी। तब एमआईएम ने भारत सरकार को खुलेआम धमकी दी कि यदि सेना ने हमला किया तो उन्हें रियासत में रह रहे करोड़ों हिन्दुओं की लाशें मिलेंगी। इस धमकी से बेपरवाह सरदार पटेल ने सितम्बर 1948 में मिलिट्री एक्शन लिया और हैदराबाद का भारत में बिना किसी खूनखराबे के विलय करवाया।

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अब बात करेंगे असम में जहर फैलाने वाले ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (एआईयूडीएफ) की। इसके प्रमुख बदरुद्दीन अजमल हैं। वे इत्र के बड़े कारोबारी हैं। धुबरी से सांसद भी रहे हैं। असम में इस समय 35 प्रतिशत मुसलमान हैं।अजमल की पार्टी भी मुसलमानों को गोलबंद करने की भरसक कोशिश करती रहती है। कुछ समय पहले एआईयूडीएफ के विधायक अमीनुल इस्लाम को गिरफ्तार कर लिया गया था। अमीनुल इस्लाम पर सांप्रदायिक ऑडियो क्लिप शेयर करने का आरोप है। दरअसल पुलिस को एक ऑडियो क्लिप मिली थी, जिसमें अमीनुल इस्लाम ने निजामुद्दीन मरकज में शामिल होनेवालों के कोरोना पॉजिटिव होने पर मामले को सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश की थी। देवबंद से पढ़ाई करने वाले अजमल की सारी राजनीति घोर सांप्रदायिक रही है।

दिल्ली में लापरवाही से बढ़ रहे कोरोना संक्रमित

यह सच में भारत जैसे उदार देश में ही संभव है कि जिस मोहम्मद अली जिन्ना की आल इंडिया मुस्लिम लीग ने भारत को तोड़ा था, उससे मिलते-जुलते नाम से इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग भारत के विभाजन के कुछ माह बाद ही राजनीतिक पार्टी के रूप में सामने आई। इसका गठन 10 मार्च 1948 को हुआ। ये मुख्य रूप से केरल में है। कभी-कभी तमिलनाडू में भी चुनाव लड़ती रही है। जरा देखिए कि जो पार्टी केरल में सक्रिय है वह मुसलमानों के लिए अंग्रेजी, अरबी और उर्दू शिक्षा की पक्षधर है। ये केरल के मुसलमानों के लिए मलयालम या राष्ट्रभाषा हिन्दी के महत्व को कत्तई तवज्जो नहीं देती। यह पार्टी भी जम्मू-कश्मीर में धारा 370 को बनाए रखने के पक्ष में थी।

इस पार्टी का एक घोषित लक्ष्य भारत को हिन्दू राष्ट्र बनने से रोकना और भारत को धर्मनिरपेक्ष बनाये रखना भी है। यहीं पर इसकी पोल खुलती है। यह भारत को तो एक तरफ धर्मनिरपेक्ष रखना चाहती है पर दूसरी तरफ मुसलमानों से इस्लाम के अनुसार जीवन जीने की अपेक्षा रखती है। यानि इसका कहना है मुसलमान भारत के सॅंविधान और कानून की जगह इस्लाम की जो व्याख्या मुल्ला करते हैं उसे ही मानें। यह है इसका दोहरा मापदंड।

जो तथाकथित सेक्युलरवादी एक अखिल भारतीय मुस्लिम दल बनाने का सपना देख रहे हैं, वे इतिहास के कड़वे सत्य से रूबरू होना नहीं चाहते। उन्हें कौन बताए कि आल इंडिया मुस्लिम लीग भी शुरू में पृथक राष्ट्र की मांग के साथ स्थापित नहीं हुई थी। आगे चलकर उसने अलग पाकिस्तान की मांग चालू कर दी और भीषण नरसॅंहार के बाद उनकी मांग मानी भी गई। हमारे ये ही सेक्युलरवादी जिन्ना जैसे घोर सांप्रदायिक इंसान को भी बेशर्मी से सेक्युलर बता देते हैं।
दरअसल ये जिन्ना के 11 अगस्त, 1947 को दिए भाषण का हवाला देकर उन्हें (जिन्ना) सेक्युलर साबित करते हैं। अंग्रेजी में दिए उस भाषण में जिन्ना कहते हैं “पाकिस्तान में अब सभी को अपने धर्म को मानने की स्वतंत्रता होगी। अब हिन्दू मंदिर में पूजा करने के लिए स्वतंत्र हैं, मुसलमान अपने इबादतगाहों में जाने को आजाद हैं।” लगता है, इन खान मार्किट गैंग के सदस्यों ने जिन्ना के 11 अगस्त,1947 के भाषण से पहले दिए किसी भाषण को जाना ही नहीं।

दरअसल, जिन्ना का 23 मार्च,1940 को दिया भाषण उनकी घनघोर सांप्रदायिक सोच और पर्सनेल्टी को रेखांकित करता है। उस दिन आल इंडिया मुस्लिम लीग ने पृथक मुस्लिम राष्ट्र की मांग करते हुए प्रस्ताव पारित किया था। यह प्रस्ताव मशहूर हुआ था ‘पाकिस्तान प्रस्ताव’ के नाम से। इसमें कहा गया था कि आल इंडिया मुस्लिम लीग भारत के मुसलमानों के लिए पृथक राष्ट्र का ख्वाब देखती है। वह इसे पूरा करके ही रहेगी। प्रस्ताव के पारित होने से पहले मोहम्मद अली जिन्ना ने अपने दो घंटे लंबे बेहद आक्रामक भाषण में हिन्दुओं को कसकर कोसा था। कहा था- “हिन्दू-मुसलमान दो अलग धर्म हैं। दो अलग विचार हैं। दोनों की परम्पराएं और इतिहास अलग हैं। दोनों के नायक अलग हैं। इसलिए दोनों कतई साथ नहीं रह सकते।”
तो जिन्ना को सेक्युलर बताने वाले और भारत में एक अखिल भारतीय मुस्लिम दल वाले आंखें खोल लें। समझ लें कि उनकी मांग कितनी खतरनाक है। इसे देश की जनता किसी भी सूरत में नहीं मानेगी।

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