मुंबई/बारामती। महाराष्ट्र की सियासत में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) के दोनों धड़ों—अजीत पवार गुट और शरद पवार गुट—के बीच संभावित विलय की राजनीतिक अटकलों ने एक बार फिर हलचल तेज कर दी है। उच्च पदस्थ सूत्रों के हवाले से यह बेहद महत्वपूर्ण खबर सामने आ रही है कि भारतीय जनता पार्टी (BJP) के केंद्रीय नेतृत्व ने इस संवेदनशील मामले में अपना विधिक व रणनीतिक रुख पूरी तरह स्पष्ट कर दिया है। बीजेपी ने दोनों पक्षों को साफ संदेश दिया है कि यदि एनसीपी के दोनों धड़े राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) का हिस्सा बने रहना या उसमें शामिल होना चाहते हैं, तो सबसे पहले उन्हें संगठनात्मक रूप से आपस में विलय (Merge) करना होगा, क्योंकि बीजेपी शरद पवार गुट को एक अलग राजनीतिक इकाई के रूप में एनडीए में शामिल करने के पक्ष में बिल्कुल नहीं है। इसके साथ ही बीजेपी ने इन चर्चाओं को भी सिरे से खारिज कर दिया है कि एनसीपी का विलय भारतीय जनता पार्टी के भीतर होने जा रहा है।
अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक, महाराष्ट्र की इस पूरी नई राजनीतिक बिसात के पीछे केंद्र सरकार द्वारा आगामी सत्र में लाए जाने वाले अत्यंत महत्वपूर्ण परिसीमन बिल को माना जा रहा है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) का इस प्रस्तावित विधेयक पर रुख तुलनात्मक रूप से काफी नरम है और यह गुट संसद में इस बिल का विधिक समर्थन कर सकता है। वर्तमान संसदीय गणित के अनुसार, शरद पवार गुट के पास लोकसभा में 8 निर्वाचित सांसद और राज्यसभा में 1 सांसद को मिलाकर कुल 9 सांसदों का एक मजबूत संख्या बल मौजूद है। राष्ट्रीय स्तर पर इस बड़े संवैधानिक विधेयक को बिना किसी विधायी अड़चन के पास कराने के लिए इन 9 सांसदों का समर्थन बीजेपी के रणनीतिक समीकरणों के लिए बेहद जरूरी माना जा रहा है। सूत्रों का दावा है कि यदि दोनों धड़ों का आपस में विधिक विलय हो जाता है, तो एनडीए सरकार द्वारा भविष्य में दोनों ही पक्षों को संतुष्ट करने के लिए केंद्रीय मंत्रिमंडल में एक-एक मंत्री पद (Cabinet Berth) देने का राजनीतिक फॉर्मूला भी तैयार किया जा सकता है।
हालांकि, एनसीपी के इन दोनों धड़ों के एक साथ आने और एनडीए को समर्थन देने की बढ़ती अटकलों के बीच अजीत पवार की पत्नी व राज्यसभा सांसद सुनेत्रा पवार काफी असहज बताई जा रही हैं, क्योंकि बारामती के चुनावी संग्राम के बाद राजनीतिक दूरियां काफी बढ़ चुकी थीं। इस बीच, हाल ही में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे और वरिष्ठ नेता शरद पवार के बीच हुई एक औपचारिकता से भरी मुलाकात के बाद इन अटकलों को राजनीतिक हलकों में और अधिक बल मिल गया है। दूसरी ओर, महाविकास अघाड़ी (MVA) के प्रमुख सहयोगी दल शिवसेना (UBT) के राज्यसभा सांसद संजय राउत ने इन खबरों पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने मुंबई में मीडिया से बात करते हुए कहा कि दोनों धड़ों के विलय की बातें पिछले दो साल से लगातार चल रही हैं, लेकिन एनसीपी (एसपी) की कार्यकारी अध्यक्ष सुप्रिया सुले और प्रदेश अध्यक्ष जयंत पाटिल हमेशा इन दावों का पुरजोर खंडन करते रहे हैं। संजय राउत ने गठबंधन धर्म पर जोर देते हुए कहा कि उन्हें इन दोनों शीर्ष नेताओं की राजनीतिक निष्ठा पर पूरा भरोसा है और महाविकास अघाड़ी पूरी तरह एकजुट है।
इसी सियासी घमासान के बीच, बारामती पहुंचे एनसीपी (एसपी) के राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद पवार ने मीडिया से मुखातिब होते हुए राज्य के किसानों की कर्ज माफी (Farmers Loan Waiver) के मुद्दे पर शिंदे-फडणवीस-पवार सरकार को आड़े हाथों लिया। उन्होंने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि महायुति सरकार ने किसानों की कर्ज माफी को लागू करने के लिए एक बार फिर नई तारीख दे दी है, जबकि विधिक रूप से राज्य सरकार को पहले से घोषित की गई आधिकारिक समयसीमा का पूरी तरह पालन करना चाहिए था ताकि किसानों को समय पर राहत मिल पाती। शरद पवार ने स्पष्ट किया कि चूंकि अब सरकार ने एक नई डेडलाइन तय की है, इसलिए वे अभी इस तय समयसीमा का इंतजार करेंगे क्योंकि किसानों को पूरी तरह कर्ज से मुक्त कराना ही उनकी राजनीति की सर्वोच्च प्राथमिकता है।
उन्होंने सरकार को स्पष्ट शब्दों में विधिक चेतावनी देते हुए कहा कि यदि राज्य सरकार इस बार बिना किसी टालमटोल के कर्ज माफी को धरातल पर पूरी तरह लागू कर देती है, तो उन्हें सरकार के फैसले से कोई शिकायत नहीं होगी; परंतु यदि इस बार भी किसानों के साथ वादाखिलाफी की गई, तो उनकी पार्टी पूरे महाराष्ट्र में एक बहुत बड़ा और व्यापक राज्यव्यापी आंदोलन (State-wide Agitation) शुरू करने के लिए विधिक रूप से मजबूर होगी। जब पत्रकारों ने उनसे एनसीपी के दोनों गुटों के बीच चल रही विलय की सुगबुगाहटों और संभावित फूट के दावों पर सीधा सवाल पूछा, तो उन्होंने बेहद सधे हुए अंदाज में बात को टालते हुए केवल इतना कहा कि फिलहाल इस राजनीतिक विषय पर सार्वजनिक रूप से बात करने का सही समय नहीं है। बहरहाल, आगामी विधानसभा चुनाव से ठीक पहले बदलते इन घटनाक्रमों ने महाराष्ट्र की समूची राजनीति को बेहद दिलचस्प मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है।









