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पूर्वांचल की राजनीति में नया मोड़, चुनाव मैदान में उतरेंगे बृजेश सिंह

Writer D by Writer D
29/06/2026
in Main Slider, उत्तर प्रदेश, राजनीति, वाराणसी
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Brijesh Singh

Brijesh Singh

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उत्तर प्रदेश की सियासत में पूर्वांचल का इलाका हमेशा से बाहुबल और वर्चस्व की राजनीति का केंद्र रहा है। कभी ‘अंडरवर्ल्ड’ और ठेकेदारी के सिंडिकेट पर राज करने वाले पूर्व एमएलसी बृजेश सिंह (Brijesh Singh) ने सीधे तौर पर उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया है, जिससे पूर्वांचल की सियासी तपिश अचानक बढ़ गई है। वाराणसी के अस्सी घाट पर प्रसिद्ध पप्पू की चाय दुकान पर बनारसी अंदाज में उन्होंने सार्वजनिक रूप से घोषणा की कि वे आगामी विधानसभा चुनाव में अपनी किस्मत आजमाएंगे। हालांकि, उन्होंने इस बात का पत्ता अभी नहीं खोला है कि वे किस पार्टी के सिंबल पर और किस सीट से मैदान में उतरेंगे, लेकिन उनके बयानों ने इसके साफ संकेत दे दिए हैं।

खुद को रघुवंशी बताते हुए बृजेश सिंह (Brijesh Singh) ने पहली बार सीधे जनता के बीच बैठकर उनकी सेवा करने का वादा किया और कहा कि वे राजनीति सिर्फ जनसेवा के लिए कर रहे हैं, न कि धन-दौलत के लिए। भले ही उनकी सीट और दल का फैसला भविष्य के गर्भ में हो, लेकिन जिस तरह उन्होंने राष्ट्रवाद और धर्म की रक्षा की बात कही है, उससे राजनीतिक गलियारों में कयास लगाए जा रहे हैं कि वे भाजपा या एनडीए के किसी सहयोगी दल के टिकट पर मैदान में आ सकते हैं। अब तक केवल पर्दे के पीछे से बिसात बिछाने वाले और खुद को एमएलसी चुनाव तक सीमित रखने वाले बृजेश सिंह का यह ‘किंगमेकर’ से सीधे ‘किंग’ बनने का दांव गाजीपुर, वाराणसी, मऊ, जौनपुर और चंदौली सहित पूरे पूर्वांचल के सियासी समीकरणों को पूरी तरह से बदलने की ताकत रखता है।

पारिवारिक सियासी रसूख और नए गढ़ की तलाश

बृजेश सिंह (Brijesh Singh) के परिवार का वाराणसी और आसपास की सीटों पर दशकों से मजबूत दबदबा रहा है। उनके बड़े भाई चुलबुल सिंह और वे खुद निर्दलीय एमएलसी रह चुके हैं, जबकि मौजूदा समय में उनकी पत्नी अन्नपूर्णा सिंह वाराणसी सीट से निर्दलीय एमएलसी हैं और उनके भतीजे सुशील सिंह चंदौली की सैयदराजा सीट से भाजपा के विधायक हैं। खुद सीधे विधानसभा चुनाव में उतरने का फैसला दिखाता है कि वे अपनी ताकत का सीधा प्रदर्शन करना चाहते हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि वे भाजपा से सीधे चुनाव लड़ने के बजाय सवर्ण बाहुल्य चंदौली, वाराणसी या जौनपुर की किसी सीट पर एनडीए के किसी सहयोगी दल के बैनर तले उतर सकते हैं।

बदलेगा पूर्वांचल का मिजाज, विपक्ष के चक्रव्यूह को तोड़ने की तैयारी

पिछले तीन दशकों से पूर्वांचल की राजनीति ‘मुख्तार बनाम बृजेश’ के इर्द-गिर्द घूमती रही है। मुख्तार अंसारी के निधन के बाद उपजे ‘पॉवर वैक्यूम’ के बीच बृजेश सिंह का सीधे मैदान में आना ठाकुर (क्षत्रिय) लॉबी को एक बड़ा राजनीतिक चेहरा दे सकता है, जिसका प्रभाव भदोही, गाजीपुर और जौनपुर तक दिखेगा। इसके अलावा, पूर्वांचल की जमीनी राजनीति में राजपूत, भूमिहार और ब्राह्मण मतों का समीकरण बेहद निर्णायक होता है। बनारस और गाजीपुर बेल्ट के सवर्ण युवाओं में उनकी मजबूत पकड़ के कारण उनके आने से सवर्ण मतों का एकतरफा ध्रुवीकरण हो सकता है, जो समाजवादी पार्टी के ‘पीडीए’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले के खिलाफ एनडीए के लिए एक मजबूत सुरक्षा कवच का काम करेगा।

बृजेश सिंह (Brijesh Singh) के इस सीधे ऐलान ने निश्चित तौर पर सपा-कांग्रेस गठबंधन की टेंशन बढ़ा दी है। पिछले चुनावों में गैर-यादव ओबीसी और दलितों को जोड़कर पूर्वांचल में मजबूत बढ़त बनाने वाले विपक्षी गठबंधन के लिए अब चुनौती बड़ी होगी। चुनावी राजनीति में बाहुबलियों का अपना एक बूथ मैनेजमेंट और स्थानीय नेटवर्क होता है, जो ब्लॉक प्रमुखी और जिला पंचायत स्तर पर खासा सक्रिय रहता है। पूर्वांचल के ग्रामीण इलाकों में पारंपरिक रूप से चलने वाली सवर्ण बनाम यादव-मुस्लिम की राजनीतिक लड़ाई इस सीधे दांव से दोबारा सतह पर आ सकती है। अब देखना दिलचस्प होगा कि कानून और सियासत के बदले दौर के बीच, अस्सी घाट से शुरू हुआ बृजेश सिंह का यह सीधा सफर उन्हें विधानसभा की कुर्सी तक पहुंचाता है या विपक्ष उनके अतीत को मुद्दा बनाकर इस चक्रव्यूह को भेदने में सफल रहता है।

Tags: brijesh singhElectionup news
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